रविवार, 8 फ़रवरी 2009

ज़ख्म हमेशा खिले हुवे

टूटी चप्पल, चिथड़े कपड़े, हाथ पैर हैं छिले हुवे
खिचडी दाड़ी, रीति आँखें, ज़ख्म हमेशा खिले हुवे

रोटी पानी, कपड़े लत्ते, बिखरा घर बिखरा आँगन
बिखरा जीवन, टूटे सपने, होठों सभी के सिले हुवे

झूठे रिश्ते, लोग पराये, मैं सच्चा झूठी दुनिया
ख़त्म हुवे सब शिकवे सारे, ख़त्म ये सारे गिले हुवे

नियम खोखले, बातें कोरी, कोरा मत, कोरा गर्जन
कोरी वाणी, कोरा दर्शन, नींव सभी के हिले हुवे

गुंडा गर्दी गली मोहल्ले,जिसकी लाठी उसकी भैंस
लूट मची है प्रजा तंत्र में, मानुस सारे पिले हुवे

मार पड़ी कमजोरों पर, चाहे कोई मज़हब हो
मंदिर मस्जिद गिरजे लगता आपस में हैं मिले हुवे

28 टिप्‍पणियां:

  1. आपने जिस तरह से हालातों और अपने मन के भावों को व्यक्त किया है वो काबिले तारीफ़ है ....

    अनिल कान्त
    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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  2. बहुत ख़ूब साहब, पर हुवे नहीं हुए

    गुलाबी कोंपलें

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  3. kiski main tareef karun
    kisko karun nazarandaz
    ek se badhkar ek sher hai
    lajawaab jinka andaaz

    bahut saleeke se piroye hain
    ek ek shabdon ke ratn
    bhavnaon ke pankh pakheru
    hriday chura kar le gaye aaz

    ati uttam rachna. badhai

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  4. नियम खोखले, बातें कोरी, कोरा मत, कोरा गर्जन
    कोरी वाणी, कोरा दर्शन, नींव सभी के हिले हुवे
    मार पड़ी कमजोरों पर, चाहे कोई मज़हब हो
    मंदिर मस्जिद गिरजे लगता आपस में हैं मिले हुवे

    वाह्! क्या खूब कहा है.भाई दिगम्बर जी, आपकी संगत करते करते मुझे तो अब ये मलाल हो रहा है कि काश हम भी कविता कर पाते.

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  5. सर जी आप और आपकी रचना दोनो प्रणम्य हैं प्रणाम आपकी विचार शक्ति को आपकी लेखनी को

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  6. बहुत खूब...एक-एक शेर में जो दर्द की तस्वीर आपने खींच दी...और आखरी शेर...मंदिर मस्जिद गिरजे लगता...बेहतरीन!

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  7. बहुत ही उम्दा लिखा है।


    मार पड़ी कमजोरों पर, चाहे कोई मज़हब हो
    मंदिर मस्जिद गिरजे लगता आपस में हैं मिले हुवे

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  8. नियम खोखले, बातें कोरी, कोरा मत, कोरा गर्जन
    कोरी वाणी, कोरा दर्शन, नींव सभी के हिले हुवे

    sahee kahaa hai.........

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  9. दिगंबर जी देर से आने के लिए क्षमा चाहूँगा महफ़िल में ,क्या गज़ब कर डाला आपने किस शे'र पे दाद दूँ किस को महरूम रखूं समझ नही आता इतनी बेमिशाल की सारी की सारी रचनाएँ है बहोत ही शानदार लिखा है आपने बेहद उम्दा साहब... सारी राचानाएं मौलिकता को लिए है .. सच्ची लेकिन कड़वी ....लोगों के लिए ..
    ढेरो बधाई आपको

    अर्श

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  10. वाह दिगम्बर जी...क्या खूब है
    दिल से निकली है ये वाह
    और आखिरी शेर तो बस जबरदस्त है

    मिलना है एकदम से....फोन का इंतजार रहेगा

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  11. रोटी पानी, कपड़े लत्ते, बिखरा घर बिखरा आँगन
    बिखरा जीवन, टूटे सपने, होठों सभी के सिले हुवे

    बहुत अच्छी बात। हर बंद मौलिक और पूरा।

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  12. दिगम्बर भाई,

    आपकी रचना पढ़ी अच्छा लगा। मेरी टिप्पणी को अपने एक भाई की टिप्पणी की तरह ही लें। अगर आपको ऐसा लगे कि मेरी टिप्पणी ठीक नहीं है तो इसे ख़ारिज कर दें। मुझे लगता है कि आपने एक रचना जल्दबाज़ी में लिख दी है। अगर आप इस पर थोड़ा और ध्यान देकर दोबारा सोचें तो रचना एक अल्हड़ यौवना सी निख़र कर आएगी

    दूसरे शेर में बिखरा अगर एक ही बार प्रयोग हो तो शायद और भी अच्छा लगे।

    और ज़रा इन पंक्तियों पर ग़ौर करें
    "कोरी वाणी, कोरा दर्शन, नींव सभी के हिले हुवे"
    ध्यान से पढ़ेंगे तो आपको ख़ुद ही अहसास हो जाएगा कुछ व्याकरण की त्रुति है।
    अगर कोई बात बुरी लगी हो तो नज़रंदाज कर दें और अच्छी लगी हो तो दोस्ती और भी पक्की।

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  13. bahut sundar shriman,bahut hi sundar,seedhe hriday men utarne wali evam barambar padhne yogya rachna.
    badhayee.

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  14. मार पड़ी कमजोरों पर, चाहे कोई मज़हब हो
    मंदिर मस्जिद गिरजे लगता आपस में हैं मिले हुवे
    bahut hi sundar sher hain..khubsurat alfaz --

    *har baar ek nayi tarah ki prastuti!!maulikta liye hue.

    *aap apni soch ko ek naye ruup mein naya rang le kar prastut kartey hain.

    bahut achcee rachna hai..badhayee.

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  15. काबिले तारीफ अभिव्यक्ति..

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  16. प्रकाश जी
    दोस्ती पक्की..........
    आप ने ठीक लिखा है, मुझे भी ये लगा था पर काफिये के चक्कर में ऐसा कर गया. दरअसल "मिले", "हिले"....ये काफिये ढूँढने पर भी नही मिल रहे थे तो मैंने सोचा चलो जो ठीक लग रहा है,लिख लें
    पर आपकी पारखी नज़र कमाल की है, शुक्रिया जनाब

    आप ऐसे ही मुझे मार्गदर्शन देते रहें, दोस्ती मजबूत रहेगी, मैं आपका आभारी रहूंगा

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  17. आप सभी का अनिल जी, विनय जी, स्वप्न जी, वत्स जी, प्रदीप जी, विवेक जी, परमजीत जी, मोदगिल साहब, महेंद्र जी, अर्श जी, विशाल जी, गौतम जी, अजित जी, प्रकाश जी, संजीव जी, अल्पना जी, और उन सब का जो अक्सर मेरे ब्लॉग पर अपनी अनमोल टिप्पणी देते रहते हैं आभार है जो आपने इसे पसंद किया..........

    मेरा सोभाग्य और खुशी है की आज आशीष खंडेलवाल जी मेरे ब्लॉग पर आए और उन्हें भी यह रचना पसंद आयी

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  18. टूटी चप्पल, चिथड़े कपड़े, हाथ पैर हैं छिले हुवे
    खिचडी दाड़ी, रीति आँखें, ज़ख्म हमेशा खिले हुवे

    Wah...Digamber ji bhot khoob...! Dil se...!!

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  19. सटीक और खूबसूरत अभिव्यक्ति.

    रामराम.

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  20. sach kaha apne. niyam khokhle.... ye sach hai or jb tk rahne wala hai. jb tk hamare man mein niyamo ka palan karne ka bhav nahi aayega.
    apke vichar kavita ke roop ne ek bahti nadi ki tarah hai.....

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  21. मार पड़ी कमजोरों पर, चाहे कोई मज़हब हो
    मंदिर मस्जिद गिरजे लगता आपस में हैं मिले हुवे

    ye panktiya etni achhi hai ki mai ese baar -baar padh raha hu

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  22. दिंगबर नासवा जी
    बहुत सुंदर रचना। बहुत बहुत बधाई।

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  23. सुंदर और यथार्थ आपकी लेखनी मैं जादू है

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  24. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है