शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

क्‍यों नहीं

गुरु देव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद से तैयार ग़ज़ल......प्रस्तुत है आप सब के सामने

ठंडक का चांदनी में है एहसास क्‍यों नहीं,
सूरज में भी तपिश का है आभास क्‍यों नहीं,

गूंगे हैं शब्‍द, मौन है छन्‍दों की रागिनी,
हैं गीत भी मगर कोइ विन्‍यास क्‍यों नहीं,

जब साथ में जीवन सखी भी तेरे है वो फिर,
चहूं ओर महकता हुआ मधुमास क्‍यों नहीं,

अगनित यहां वो अग्नि परीक्षाएं दे चुकी,
सीता का खत्‍म हो रहा वनवास क्‍यों नहीं,

बचपन को गिरवी रख के समय की दुकान पर,
तुम पूछते हो शहर में उल्‍लास क्‍यों नहीं,

पशु पक्षी, पेड़ पौधे सभी पूछते हैं ये,
इस आदमी की बुझ रही है प्‍यास क्‍यों नहीं,

पत्‍थर के देवता ने कहा आदमी से ये,
तुझको है धर्म पे भला विश्‍वास क्‍यों नहीं,

29 टिप्‍पणियां:

  1. गूंगे हैं शब्‍द, मौन है छन्‍दों की रागिनी,
    हैं गीत भी मगर कोइ विन्‍यास क्‍यों नहीं,

    बेहद ही खूबसूरत लगा!

    पशु पक्षी, पेड़ पौधे सभी पूछते हैं ये,
    इस आदमी की बुझ रही है प्‍यास क्‍यों नहीं,

    उम्दा ख्याल हैं.सभी शेर तारीफ के काबिल हैं दिगाम्बर जी.
    ...बहुत ही अच्छी ग़ज़ल है.

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  2. aap ke blog par samay dubai ka nahin hai...yah samay bharat ka dikh raha hai..aap chahen to setting mein set kar saktey hain.
    :)

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  3. पशु पक्षी, पेड़ पौधे सभी पूछते हैं ये,
    इस आदमी की बुझ रही है प्‍यास क्‍यों नहीं,

    -बहुत खूब!! गुरुदेव पर ढ़ेर प्रेशर है भाई. :)

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  4. गजल इस मायने में भी अच्छी है कि इसमे हिंदी के आम बोलचाल वाले शब्द हैं। उर्दू के कठिन शब्दों का मोह नहीं है।

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  5. बहुत प्रसंशनीय अभिव्यक्ति है।

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  6. पशु पक्षी, पेड़ पौधे सभी पूछते हैं ये,
    इस आदमी की बुझ रही है प्‍यास क्‍यों नहीं,

    पत्‍थर के देवता ने कहा आदमी से ये,
    तुझको है धर्म पे भला विश्‍वास क्‍यों नहीं,

    sabhi sher lajawaab, sarahniya abhivyakti, digambar ji , dheron badhai.

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  7. बचपन को गिरवी रख के समय की दुकान पर,
    तुम पूछते हो शहर में उल्‍लास क्‍यों नहीं,

    पशु पक्षी, पेड़ पौधे सभी पूछते हैं ये,
    इस आदमी की बुझ रही है प्‍यास क्‍यों नहीं,
    waah har sher lajawab bahut badhai

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  8. बहुत सुन्दर
    गूंगे हैं शब्‍द, मौन है छन्‍दों की रागिनी,
    हैं गीत भी मगर कोइ विन्‍यास क्‍यों नहीं,
    एक एक लाइन मोह लेने वाली है .

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  9. शे'र के कहन में आम बोल-चाल की भाषा का प्रयोग आपने जिसतरह से गुरु जी के सहायत से किया है उल्लेखनीय और सराहनीय है ,हर शे'र जमीनी तौर पे जुडी हुई है .... बहोत ही बढिए असा'र बने है ... एक शेर मुनावर साहिब की है देखे किस बेहतरी से उन्होंने ये शेर कहे है ..
    ऐसा नहीं के शहर में कमसिन नहीं रहे ...
    गुडियों से खेलने के मगर दिन नहीं रहे ...
    शायद हमारे पावों में तिल है की आज तक ..
    घर में कभी सुकून से दो दिन नहीं रहे...

    बहोत बहोत बधाई आपको ... इस खुबसूरत ग़ज़ल पे ...


    अर्श

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  10. बचपन को गिरवी रख के समय की दुकान पर,
    तुम पूछते हो शहर में उल्‍लास क्‍यों नहीं,

    क्या लाजवाब बात कही है? बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  11. पत्‍थर के देवता ने कहा आदमी से ये,
    तुझको है धर्म पे भला विश्‍वास क्‍यों नहीं,

    sabse pahle raamnavmi ki badhaai, shubhkamnaye.

    ab gazal par-
    bahut sundar gazal he, hindi ki gazalo me aksar dekha gaya he ki usme ras nahi mil pata kintu jis uddeshya se aapke dvara yeh likhi gai he hindi ke tamaam ras isme mouzu he..bahut badhiya likhi he aapne..vese jab aadarniya gurudev ki paarkhi nazar kisi rachna par padhti he to khud b khud rachna me jaan aa jaati he...aapki is rachna ke liye to unhone kalam bhi chalai he so atisundar hona svabhavik hi he..

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  12. sabhi sher babbar sher hain...
    khoobsurat gazal...
    is sher ne to jaise dil ke ahssason ko jubaan de di ho....

    बचपन को गिरवी रख के समय की दुकान पर,
    तुम पूछते हो शहर में उल्‍लास क्‍यों नहीं,

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  13. पशु पक्षी, पेड़ पौधे सभी पूछते हैं ये,
    इस आदमी की बुझ रही है प्‍यास क्‍यों नहीं,
    वाह क्या बात है जबाब नही.... बहुत ही सुंदर भाव लिये आप की यह कविता. धन्यवाद

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  14. एक - एक शेर सुन्दर है. साधुवाद.

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  15. आदरणीय दिगंबर जी ,
    वैसे तो पूरी गजल ही अच्छी है पर ये पंक्तियाँ मन को छूने वाली हैं.....
    अगनित यहां वो अग्नि परीक्षाएं दे चुकी,
    सीता का खत्‍म हो रहा वनवास क्‍यों नहीं,
    पूनम

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  16. दिगंबर जी,
    बहुत अच्छी गजल और ये पंक्तियाँ तो मौन रह कर भी बहुत कुछ कह रही हैं ..
    गूंगे हैं शब्‍द, मौन है छन्‍दों की रागिनी,
    हैं गीत भी मगर कोइ विन्‍यास क्‍यों नहीं,
    आपकी गजलों का जवाब नहीं .
    हेमंत कुमार

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  17. वाह क्या बात है दिगम्बर जी....

    सलाम सर

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  18. वाह ! वाह ! वाह ! इस bhaavpoorn सुन्दर रचना ने तो मन mugdh कर दिया......बहुत बहुत सुन्दर और prawaahmayi gazal...

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. गूंगे हैं शब्‍द, मौन है छन्‍दों की रागिनी,
    हैं गीत भी मगर कोइ विन्‍यास क्‍यों नहीं,
    बेहद नपे तुले शब्द गहरे भावः बहुत सुन्दर धन्यबाद
    विगत एक माह से ब्लॉग जगत से अपनी अनुपस्तिथि के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ

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  21. बचपन को गिरवी रख के समय की दुकान पर,
    तुम पूछते हो शहर में उल्‍लास क्‍यों नहीं,

    पशु पक्षी, पेड़ पौधे सभी पूछते हैं ये,
    इस आदमी की बुझ रही है प्‍यास क्‍यों नहीं,...
    बहुत सुंदर भाव और रचना दोनों ही .

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  22. अगनित यहां वो अग्नि परीक्षाएं दे चुकी,
    सीता का खत्‍म हो रहा वनवास क्‍यों नहीं,

    वाह...वाह.....!! दिगंबर जी क्या खूब कहा मेरी भी अग्नि परीक्षा ली जा रही है....!!

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  23. गूंगे हैं शब्‍द, मौन है छन्‍दों की रागिनी,
    हैं गीत भी मगर कोइ विन्‍यास क्‍यों नहीं,

    जब साथ में जीवन सखी भी तेरे है वो फिर,
    चहूं ओर महकता हुआ मधुमास क्‍यों नहीं,

    अगनित यहां वो अग्नि परीक्षाएं दे चुकी,
    सीता का खत्‍म हो रहा वनवास क्‍यों नहीं,


    wah naswa ji....
    ..der se aane par apna hi nuksaan kiya !!

    aap bahut ,bahut accha likhte hain aur utna hi acche insaan hain !!

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  24. अगनित यहां वो अग्नि परीक्षाएं दे चुकी,
    सीता का खत्‍म हो रहा वनवास क्‍यों नहीं,
    " जीवन के हर पहलु से जुड़े हर एक शेर का जवाब नहीं......सीता के वनवास का प्रश्न तो अनंत काल से यूँ ही अनुतरित ही चला आ रहा है.........जाने क्यों इस शेर ने कुछ अजीब सा एहसास करा दिया ........जैसे बेडियों में जकड़ी हुई कोई आक्रति......छटपटाती सी हुई....."

    Regards

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