सोमवार, 1 जून 2009

दर्द

१)

सुर्ख पगडंडी पर
तैरता लावा
रिसते हुवे खून से बनी
तेरे माथे की वो लकीर
जिसके उस पार
उतरने की जद्दोजहद
जिस्म के आखरी कतरे तक
जगनू सी चमकती रहेगी
तेरी मांग

२)

तम्हारे पावँ के छाले
अपनी पलकों में सहेज लूँगा
तेरे दिल पर पढ़े ज़ख्म
दस्ते-नाज़ुकी से उठा लूँगा
तेरे दर्द का सहारा लेकर
तुझी से.................
एक रिश्ता जोड़ लूँगा

३)

तेरे माथे पर उभर आयी
पसीने की बूंदें
तेरी आँखों में उभरता
आंसुओं का सैलाब
हल्के हल्के से आती
सिसकियों की आवाज़
तू चुपके से
मेरी बाहों में सो जाना
धीरे धीरे
मीठे सपनों में खो जाना

40 टिप्‍पणियां:

  1. मुक्त छन्द लेकिन दर्द की गिरफ़्त में कैद..कवि मन उसी दर्द से मुक्ति की राह दिखाता हुआ... !

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  2. Hamesha ki tarah LLLLLLlAAAAAAJJJJJJWWWWWWWWAAAAAABBBB !!!!

    Iske aage kya kahun,kuchh samajh nahi aa raha...

    Sadaiv aise hi likhte rahiye...Anant shubhkaamnayen...

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  3. बहुत ही बढि़या लिखा है आपने

    बधाई ।

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  4. बहुत मार्मिक सुन्दर अभिव्यक्ति है आभार्

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  5. दर्द पढने पर भी अच्छा लग रहा है .......क्यों ..........क्योकि दर्द को शब्दों में उतारा ही इतनी खूबसूरती से है

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  6. tareef ke liye shabd kam hain
    bahut bahut bahut achchha laga padhkar

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  9. सुर्ख पगडंडी पर
    तैरता लावा
    रिसते हुवे खून से बनी
    तेरे माथे की वो लकीर
    जिसके उस पार
    उतरने की जद्दोजहद
    जिस्म के आखरी कतरे तक
    जगनू सी चमकती रहेगी
    तेरी मांग

    बहुत मार्मिक ........अतिऊतम ........ क्या बात

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  10. dard ke bhi teen alag alag roop aur teenon hi lajawaab.
    kabil-e-tarif.
    ek aah si nikalti huyi.
    dil ko choo gayi.

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  11. बहुत ही लाजवाब अभिव्यक्ति.

    रामराम.

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  12. सुर्ख पगडंडी पर
    तैरता लावा
    रिसते हुवे खून से बनी
    तेरे माथे की वो लकीर
    जिसके उस पार
    उतरने की जद्दोजहद
    जिस्म के आखरी कतरे तक
    जगनू सी चमकती रहेगी
    तेरी मांग

    दिगम्बर जी, आपने तो दर्द को सचमुच शब्दों में उढेल कर रख दिया गया है......अति उत्तम

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  13. अम्मा मियाँ जान लेके रहोगे ... मुआफी चाहूंगा दिगम्बर जी इस तरह से पुकारने के लिए मगर जब ये तीनो क्षणिकाएं पढा तो बरबस ही जबान से ऐसे बोल निकल पड़े... बहोत खूब कही है आपने... ढेरो बधाई साहिब...

    अर्श

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  14. तू चुपके से
    मेरी बाहों में सो जाना
    धीरे धीरे
    मीठे सपनों में खो जाना
    ... behad khoobasoorat abhivyakti !!!

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  15. अच्छा लिखा है आपने । भाव और विचार के स्तर पर अभिव्यक्ति प्रखर है ।
    मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-फेल हो जाने पर खत्म नहीं हो जाती जिंदगी । समय हो तो पढ़ें और अपना कमेंट भी दें-

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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  16. सुर्ख पगडंडी पर
    तैरता लावा
    रिसते हुवे खून से बनी
    तेरे माथे की वो लकीर
    जिसके उस पार
    उतरने की जद्दोजहद
    जिस्म के आखरी कतरे तक
    जगनू सी चमकती रहेगी
    तेरी मांग

    वाह.....!!
    २)

    तम्हारे पावँ के छाले
    अपनी पलकों में सहेज लूँगा

    प्रेम की इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति....??
    अगर दिल से निकले उदगार हैं तो नमन है आपको ....!!

    ३)

    तेरे माथे पर उभर आयी
    पसीने की बूंदें
    तेरी आँखों में उभरता
    आंसुओं का सैलाब
    हल्के हल्के से आती
    सिसकियों की आवाज़
    तू चुपके से
    मेरी बाहों में सो जाना
    धीरे धीरे
    मीठे सपनों में खो जाना

    लाजवाब ....ये पंक्तियाँ तो छू गयीं ....बेहतरीन.....मेरा रात गए जाग कर ये कमेन्ट देना सार्थक हुआ शायद .....!!

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  17. आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
    बहुत ही सुंदर लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है!

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  18. ये जो आपका अनूठा अंदाज़ है ना दिगम्बर जी तीन अलग-अलग किंतु फिर भी मिले से रंगों को नज़्म में उतारने का, वो बेमिसाल है...

    पहली वाली तो निहायत ही खूबसूरत बनी है।

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  19. हर छद्म की अपनी एक मौलिक पहचान है और खूबसूरत अभिव्यक्ति.....

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  20. तू चुपके से
    मेरी बाहों में सो जाना
    धीरे धीरे
    मीठे सपनो में खो जाना

    एक भावपूर्ण ,,दिल को छू लेने वाली ,,
    सच्ची और पाकीज़गी से भरपूर प्रस्तुति
    पर अभिवादन स्वीकारें

    ---मुफलिस---

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  21. aap jaise bade bade logo ko padhkar hame bhi likhne me bahut prerna milti hai naswa ji.bahut khubsurat likha hai aapne.jitni tareef ki jaye kam hai.

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  22. बहुत दर्द है रचना में लेकिन मिठास के साथ। वाह दिगम्बर भाई। कहते हैं कि-

    दर्द के टीस को संगीत समझ लेते हैं।
    मेरी हर हार को जीत समझ लेते हैं।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  23. पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ की आपको मेरी शायरी पसंद आई!
    आपके नए पोस्ट का इंतज़ार कर रही हूँ!

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  24. shayad sneh aatmdaan kaa hee dusra naam hai. kavita ko shukriya aur kavi ko bhee...

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  25. तेरे दर्द का सहारा लेकर
    तुझी से.................
    एक रिश्ता जोड़ लूँगा
    दर्द के धागों से बंधे रिश्ते भी अनोखे होते हैं.

    'सुर्ख पगडंडी पर
    तैरता लावा ..'
    -बहुत खूब!
    -गज़ब की कल्पना शक्ति दिखती है!
    दर्द में भीगी हुई ,तीनो भावपूर्ण रचनाएँ बहुत अच्छी लगीं.

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  26. तेरे दर्द का सहारा लेकर
    तुझी से.................
    एक रिश्ता जोड़ लूँगा।

    जवाब देंहटाएं
  27. दर्द किसी भी रूप में हो, दुख तो देता ही है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  28. सुर्ख पगडंडी पर
    तैरता लावा
    रिसते हुवे खून से बनी
    तेरे माथे की वो लकीर
    जिसके उस पार
    उतरने की जद्दोजहद
    जिस्म के आखरी कतरे तक
    जगनू सी चमकती रहेगी
    अति सुन्दर ।

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  29. तम्हारे पावँ के छाले
    अपनी पलकों में सहेज लूँगा
    तेरे दिल पर पढ़े ज़ख्म
    दस्ते-नाज़ुकी से उठा लूँगा
    तेरे दर्द का सहारा लेकर
    तुझी से.................
    एक रिश्ता जोड़ लूँगा

    ...ye rishat bada khushgawaar hoga...

    ..kai dino se apki nai post ke intzaar main hoon...

    aajkar "kshanikaoon " main to aap qutil hote ja rahe hain...


    main bhi kai dino se blog jagat se door raha aur aap logon ko miss karta raha...

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  30. तम्हारे पावँ के छाले
    अपनी पलकों में सहेज लूँगा
    तेरे दिल पर पढ़े ज़ख्म
    दस्ते-नाज़ुकी से उठा लूँगा
    तेरे दर्द का सहारा लेकर
    तुझी से.................
    एक रिश्ता जोड़ लूँगा
    क्या बात है भाई.. एक सच्चे आशिक के दिल की बात लिख दी...

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  31. digambarji,,pichhle kuchh dino se jo aap kavita ke maadhyam se rang bikher rahe he , vo bemisaal he//
    itna adhik prem..prem ki sabse naazuk kism jisme sirf hraday bolta he, uski hi aavaaz aati he/ apne komal, makhmali andaaz me///
    bahut khoob//

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  32. bahut khoob digambar ji, teenon hi rachnayen jaise gagar men sagar,

    behad umda, badhai sweekaren.

    जवाब देंहटाएं
  33. bahut khoob digambar ji, teenon hi rachnayen jaise gagar men sagar,

    behad umda, badhai sweekaren.

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  34. प्रीत की अनन्त बगिया में अनगिनत फूल है, आपकी यह कविता- "तुम' की तो महक ही कुछ और है। इस फूल को प्रेम-भाव के कोई समर्थ कवि ही चून सकते हैं । हम तो सिर्फ इसकी आदिम-आकर्षण ही महसूस कर पाते हैं। आप लिखते रहें, हम महसूसते रहें....

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  35. सुर्ख पगडंडी पर
    तैरता लावा
    रिसते हुवे खून से बनी
    तेरे माथे की वो लकीर

    क्या गज़ब लिखते हो भाई तुम तो छा गए!

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है