शनिवार, 20 जून 2009

रिसने लगी रोशनी है आफताब से

बहुत दिनों तक प्रेम के उन्मुक्त सागर में डुबकियां लगाते छंद-मुक्त रचनाओं में खो गया था......लीजिये आज फिर से पेश है ग़ज़ल आप सब की नज़र जो आदरणीय पंकज जी के आर्शीवाद से सजी, संवरी है.........


गंध सी झरने लगी है माहताब से,
पंखुरी क्या तोड़ ली तुमने गुलाब से

शाम का सिंदूर राह पर बिखर गया
रिसने लगी रोशनी है आफताब से

कौन ये जाने के दर्द कितना है छुपा
मंडियां झिलमिल हैं हो रहीं शबाब से

फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
फूल है सूखा हुआ मिला किताब से

बांध के अश्कों को रोक तो लिया गया
झांक रहा दर्द किन्तु है नकाब से

47 टिप्‍पणियां:

  1. गंध सी झरने लगी है माहताब से,
    पंखुरी क्या तोड़ ली तुमने गुलाब से

    अच्छी लगी आपकी गज़ल।

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  2. BAHOT HI KHUBSURAT GAZAL KAHI HAI AAPNE... AUR KHAS TAUR SE YE SHE'R TO KAMAAL KA HAI ...

    फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
    फूल है सूखा हुआ मिला किताब से

    DHERO BADHAAYEE SAHIB... UPAR GURU DEV KA NAAM SUDHAAR LEN.. TYPING ME KOI TRUTI LAG RAHI HAI ..


    ARSH

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  3. कौन ये जाने के दर्द कितना है छुपा
    मंडियां झिलमिल हैं हो रहीं शबाब से
    दिगंबर जी ,
    बहुत बढ़िया पंक्तियाँ ....खासकर इन लाइनों ने तो
    बांध ही लिया .
    हेमंत कुमार

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  4. आपकी जितनी भी तारिफ की जाये वो कम है ..........उसपर गज़ल
    बांध के अश्कों को रोक तो लिया गया
    झांक रहा दर्द किन्तु है नकाब से .
    खासकर के ये पंक्तियाँ मेरे दिल के करीब है ......
    एक एक शेर नायाब है जैसे सीप की मोतियाँ हो ...
    आप ऐसे ही लिखते रहे ............बहुत ही सुन्दर

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  5. भाई नासवा जी

    आपको यह बता दूँकि आप जो भी लिखते हो उसमे सादगी तो होती है साथ ही भावनाओ की खुबसूरती कुट-कुटकर भरी रहती है.मेरे पास शब्द नही है कि बयान कर पाऊ...........बहुत ही सुन्दर शेर है एक एक पंक्तियाँ नगीने है ......बधाई

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  6. बांध के अश्कों को रोक तो लिया गया
    झांक रहा दर्द किन्तु है नकाब से

    wah digamber ji, benazeer rachna ke liye badhai.

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  7. Waah ! Waah ! Waah !!! Lajawaab !!

    Socha koi ek sher jo sabse khoobsoorat ho chun kar use tippani me tankun....par jab sabhi ek se badhkar ek hain to kis ek ko chunun......

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल है

    ---
    नासवा जी मेरे नये प्रयास चर्चा । Discuss INDIA पर आपकी एक नज़र की चाह है

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  10. दिगम्बर जी,

    गज़ल में जान फूंकी है इस शेर ने, क्या खूब कहा है चमकती मंडियों में दफ्न दर्द को बड़ी शिद्दत से नुमायां करता हुआ शेर :-

    कौन ये जाने के दर्द कितना है छुपा
    मंडियां झिलमिल हैं हो रहीं शबाब से

    हालांकि पूरी की पूरी गज़ल ही बहुत अच्छी है। इस शेर में भी दर्द को बहुत ही करीब से मह्सूस किया जा सकता है, क्या नज़र है और क्या खूब अंदाज :-

    बांध के अश्कों को रोक तो लिया गया
    झांक रहा दर्द किन्तु है नकाब से

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  11. बढिया दिगम्बर जी लेकिन इसकी बहर कौन सी है?
    अगर ऊपर लिख देते तो और अच्छा रहता. पढने में आसानी रह्ती....पवन गुप्ता

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  12. गंध सी झरने लगी है माहताब से,
    पंखुरी क्या तोड़ ली तुमने गुलाब से

    शाम का सिंदूर राह पर बिखर गया
    रिसने लगी रोशनी है आफताब से

    वाह्! वाह्! बहुत खूब.....गजल का हर शेर उम्दा,बेहतरीन।

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  13. har sher bahut hi khoobsoorat.......jitni tarif ki jaye kam hai.

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  14. पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुकियादा करना चाहती हूँ आपकी सुंदर टिपण्णी के लिए!
    वाह वाह क्या बात है! बहुत ही ख़ूबसूरत और उम्दा ग़ज़ल लिखा है आपने जो काबिले तारीफ है! आपकी लेखनी को सलाम!

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  15. फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
    फूल है सूखा हुआ मिला किताब से

    -अह्ह!! वाह!! सुनाओ वो नया फसाना भी. बेहतरीन गज़ल कही है भाई, बधाई.

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  16. बहुत लाजवाब और खूबसूरत रचना.

    रामराम.

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  17. शानदार ग़ज़ल के हर शेर लाजवाब.

    बधाई स्वीकारें.

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  18. फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
    फूल है सूखा हुआ मिला किताब से

    behatareen soch....aapka ye naya andaaz bhi pasan daaya


    www.pyasasajal.blogspot.com

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  19. जी चाहता है चूम लूं,कलम आपकी।

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  20. फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
    फूल है सूखा हुआ मिला किताब से
    bahut khoob kamal ke sher. wah wah.

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  21. बांध के अश्कों को रोक तो लिया गया
    झांक रहा दर्द किन्तु है नकाब से .

    बहुत खूब !

    ग़ज़ल अच्छी लगी,सभी शेर पसंद आये.

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  22. फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
    फूल है सूखा हुआ मिला किताब से


    wah digambar ji....

    ...hamesha ki tarah behteerin !!

    pankaj ji ki kripa drishti se aapki ghazal ka vyakarna bhi sudhar gaya !!
    is hetu badhai swwekarein !!

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  23. गंध सी झरने लगी है माहताब से,
    पंखुरी क्या तोड़ ली तुमने गुलाब से
    what a thinking...jindagi ko janane ka jariya hai yah...

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  24. बहुत ही मनमोहक भावाभिव्यक्ति है...फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
    फूल है सूखा हुआ मिला किताब से....

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  25. फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
    फूल है सूखा हुआ मिला किताब से

    वाह दिगंबर भाई वाह...बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने...हर शेर असरदार...बहुत बहुत बधाई...
    नीरज

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  26. कौन ये जाने के दर्द कितना है छुपा
    मंडियां झिलमिल हैं हो रहीं शबाब से

    फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
    फूल है सूखा हुआ मिला किताब से

    बांध के अश्कों को रोक तो लिया गया
    झांक रहा दर्द किन्तु है नकाब से
    laazwaab ,shaandar behatreen kya kahoon bahut hi badhiya .

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  27. man ki gehraaiyon ko chute huye shabd..
    ehsaason ka khubsurat sangam......

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  28. prem ke unmukt saagar se is gazal me bhi aap ubar nahee paaye he digambarji, aour behtreen sundar shabdo ki gazal se man lubhaa liya he aapne/
    शाम का सिंदूर राह पर बिखर गया
    रिसने लगी रोशनी है आफताब से

    कौन ये जाने के दर्द कितना है छुपा
    मंडियां झिलमिल हैं हो रहीं शबाब से..
    khoobsoorat andaaz/

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  29. बांध के अश्कों को रोक तो लिया गया
    झांक रहा दर्द किन्तु है नकाब से
    ghre bhavo ko drshati ak khubsurat gajal.

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  30. बांध के अश्कों को रोक तो लिया गया
    झांक रहा दर्द किन्तु है नकाब से
    "एक सुंदर प्रस्तुती...हर शेर लाजवाब.... मगर आखिर के इस शेर ने कुछ ख़ास असर छोडा है....मन को छु गयी.."

    regards

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  31. और मैं आपसे फरमाइश करने ही वाला था ग़ज़ल के लिये....फ्रिक्वेंसी खूब मिल रही है।

    लाजवाब ग़ज़ल दिगम्बर जी
    ये शेर "फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
    फूल है सूखा हुआ मिला किताब से " अहमद फ़राज़ साब की याद दिला गया।
    बहुत खूब !

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  32. कौन ये जाने के दर्द कितना है छुपा
    मंडियां झिलमिल हैं हो रहीं शबाब से
    बहुत मार्मिक पंक्तियाँ हैं आपकी इस लाज़बाब रचना की

    धन्यवाद

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  33. क्‍या गजब का इमैजिनेशन है दिगम्‍बर जी, सलाम करता हूं आपकी सोच को।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  34. बांध के अश्कों को रोक तो लिया गया
    झांक रहा दर्द किन्तु है नकाब से
    bahut sundar!

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  35. फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
    फूल है सूखा हुआ मिला किताब से

    बांध के अश्कों को रोक तो लिया गया
    झांक रहा दर्द किन्तु है नकाब से

    उम्दा ,खूबसूरत ग़ज़ल !!!!
    सभी शेर कमाल बोलते हैं !!

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  36. bahut hi kabiletareef gajal likhi hai aapane. vakai bhut umda tarike se aapane shabdon ko piroya hai.
    bahut-bahut shukriya

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  37. बहुत अच्छा लगा आपकी कविता का सार

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  38. आपके लिए मेरे ब्लॉग मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति की नयी पोस्ट पर एक अवार्ड है. कृपया आप अपना अवार्ड लें और उसके बारे में जाने.

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  39. फिर कोई ताजा फसाना ढूंढ लेंगें वो
    फूल है सूखा हुआ मिला किताब से

    be-hadd khoobsurat sher..
    accha laga padh kar..

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