रविवार, 26 जुलाई 2009

भोर का स्पंदन....

आलिंगन को व्याकुल
अलसाई सी रात
सिन्दूरी कम्बल ओढे
आ रहा प्रभात ........
प्रकाश में समां जाने का उन्माद
अस्तित्व खो देने की चाह
छाने लगे हैं देखो
प्रकृति के अद्भुद रंग
प्रारंभ होता है
साँसों का इक प्रवाह ......
चिडियों का चहचहाना
भंवरों का गुनगुनाना
लहरों का ठहर जाना
बेताब तितलियों का
आँगन में खिलखिलाना ......
चलने लगी है श्रृष्टि
सुबह की पगली किरण
उतर आई है तेरे सिरहाने
आ मिल कर करें
नव रश्मि का अभिनंदन
वो आ रहा है देखो
भोर का स्पंदन.........

46 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति के अदभुत रंग हैं इस कविता में...

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  2. सुबह की पगली किरण
    उतर आई है तेरे सिरहाने
    आ मिल कर करें
    नव रश्मि का अभिनंदन
    वो आ रहा है देखो
    भोर का स्पंदन......... sunder kavita...ekdum sajeev chiteran...

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  3. kudrat ke tevar ko aapne apne rangeele andaaz me kavita ka zevar bana kar itne komalkaant swaroop me prastut kar diya hai ki aapki lekhnee ko choomne ki hasarat ho rahi hai

    badhaai shreeman
    badhaai !

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  4. बहुत ही सुन्दर गीत है ......
    प्रकाश में समां जाने का उन्माद
    अस्तित्व खो देने की चाह
    छाने लगे हैं देखो
    प्रकृति के अद्भुद रंग
    प्रारंभ होता है
    साँसों का इक प्रवाह ......

    इन पंक्तियो मे एक गजब की कशिश है जिसमे
    प्रकृति मे समा जाने का उन्माद है प्यारा चाहत दिखता है .........बेहद खुबसूरत .....आपके लेखनी को सलाम.....बधाई

    ओम

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  5. मैं खास तौर से इस रचना को करिश्माई कहूँगा
    क्या बात है क्या बात है... कमाल की बातें
    कमाल के भाव से सम्मिलित और सराबोर
    बहोत खूब... उफ्फ्फ्फ्फ़ बस मजा आगया

    बहोत बहोत बधाई इस खुबसूरत रचना कके लिए

    अर्श

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  6. क्या कविता इतनी सुन्दर होती है?

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  7. आपकी रचना बहुत सुन्दर होती है...बहुत पसंद आई

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  8. prakriti ka adbhut varnan..........lajawaab.........nehtreen.........amazing.
    ek alag hi nazariya.
    rachna dil ko choo gayi

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  9. आलिंगन को व्याकुल
    अलसाई सी रात
    सिन्दूरी कम्बल ओढे
    आ रहा प्रभात ........

    सुन्दरतम प्रस्तुति।
    आभार।

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  10. आलिंगन को व्याकुल
    अलसाई सी रात
    सिन्दूरी कम्बल ओढे
    आ रहा प्रभात ..

    बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना बधाई.

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  11. आलिंगन को व्याकुल
    अलसाई सी रात
    सिन्दूरी कम्बल ओढे
    आ रहा प्रभात ........
    प्रकाश में समां जाने का उन्माद
    अस्तित्व खो देने की चाह
    छाने लगे हैं देखो
    प्रकृति के अद्भुद रंग
    प्रारंभ होता है
    साँसों का इक प्रवाह ......



    wah badi gehri nazm hai digambar ji....

    ...koi samjhe ise!!

    wakai badi gehari main utarti hai ye nazm...
    ...poori ki poori...

    ..chayavaadi kaviyoon ke aas paas kahin pahunchte se lagte hain aap...


    aapki mukt chand kavita hamesha se hi meri priya hain...

    ...badhai

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  12. आलिंगन को व्याकुल
    अलसाई सी रात
    सिन्दूरी कम्बल ओढे
    आ रहा प्रभात ........
    प्रकाश में समां जाने का उन्माद
    अस्तित्व खो देने की चाह
    छाने लगे हैं देखो
    प्रकृति के अद्भुद रंग
    प्रारंभ होता है

    फिर एक अच्छी रचना ....पर ये गर्मी में कम्बल का ज़िक्र कुछ और गर्मी लाय दे रहा है ....!

    की कमी के कारण मैं आ नहीं पाई ...अन्यथा न लें ....!!

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  13. बेहद सुंदर और भावपुर्ण रचना, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  14. भोर का अति मनोहारी चित्रण !!!
    मन को मदमस्त करती....
    सुबह की ताजगी लिए हुवे
    बेहद खूबसूरत रचना !!

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  15. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

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  16. आलिंगन को व्याकुल
    अलसाई सी रात
    सिन्दूरी कम्बल ओढे
    आ रहा प्रभात ........
    प्रकाश में समां जाने का उन्माद
    अस्तित्व खो देने की चाह
    छाने लगे हैं देखो
    प्रकृति के अद्भुद रंग
    प्रारंभ होता है
    साँसों का इक प्रवाह ......
    आपकी इस रचना ने तो साँसों का प्रवाह तब तक रोके रखा जब तक इसे तीन बार नहीं पढ लिया सच ही आप जागती आँखों से भी सपने देखते हैं इतनी संवेदनायें --- कमाल है ापकी भावनायेम शब्द नहीं है अद्भुत लाजवाब बधाई

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  17. चलने लगी है श्रृष्टि
    सुबह की पगली किरण
    उतर आई है तेरे सिरहाने
    आ मिल कर करें
    नव रश्मि का अभिनंदन
    वो आ रहा है देखो
    भोर का स्पंदन.........

    बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

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  18. 'अस्तित्व खो देने की चाह
    छाने लगे हैं देखो
    प्रकृति के अद्भुद रंग
    प्रारंभ होता है
    साँसों का इक प्रवाह ......'

    -बहुत khoob! adbhut abhivyakti..
    -sundar saral shbd और
    prakirit के रंग लिए sundar कविता.

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  19. चिडियों का चहचहाना
    भंवरों का गुनगुनाना
    लहरों का ठहर जाना
    बेताब तितलियों का
    आँगन में खिलखिलाना ......

    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द हर पंक्ति लाजवाब, बधाई ।

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  20. दिगम्बर जी,

    सृष्टी की सुन्दरता को बहुत ही खूबसूरती से अल्फाजों में ढाला है।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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  21. prakarti ka varnan ho aour aapki kalam chale to jese prakarti se ras bahata hua sa lagataa he/ bhour ka spandan..sirf bhour tak simit nahi rahataa..hamaare dilo me bhi ehasaas karata he/ alsubah ka aalam hi apane aap me manmohak ho jataa he aour jab aapki kalam se vo vistaar pataa he to lagataa he mano bas yahi he vo subah jise apane haatho se mahsoos kar sakate he/
    aapki is vidhaa ka me kaayal hu/

    जवाब देंहटाएं
  22. प्रकाश में समां जाने का उन्माद
    अस्तित्व खो देने की चाह
    छाने लगे हैं देखो
    प्रकृति के अद्भुद रंग
    प्रारंभ होता है
    साँसों का इक प्रवाह ......

    सुन्दर शब्द संयोजन और गहरे भाव समेटे बढिया रचना!!!!!

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  23. भोर होने को है हर कोई मचलने को है
    नव रश्मि का अभिनंदन करने को है
    आपके शब्दो मे आलोक बिखरने को है
    साँसों का इक प्रवाह महकने को है

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  24. आलिंगन को व्याकुल
    अलसाई सी रात
    सिन्दूरी कम्बल ओढे
    आ रहा प्रभात ........
    रचना बहुत अच्छी लगी....

    जवाब देंहटाएं
  25. प्रकृति के अदभुत रंग में आपने इस कविता को समेटा है । पूरी कविता प्रकृति को समपिॆत है ।
    आलिंगन को व्याकुल
    अलसाई सी रात
    सिन्दूरी कम्बल ओढे
    आ रहा प्रभात ........
    शानदार लेखनी । आभार

    जवाब देंहटाएं
  26. सुबह की पगली किरण
    उतर आई है तेरे सिरहाने
    आ मिल कर करें
    नव रश्मि का अभिनंदन
    वो आ रहा है देखो
    भोर का स्पंदन........
    पूरी कविता प्रकृति को समपिॆत है.....
    बेहतरीन रचना के लिए बधाई.....

    जवाब देंहटाएं
  27. नमस्कार दिगम्बर जी,
    सुन्दर गीत है, पड़कर एक स्फूर्ति सी तन-मन में दौड़ जाती है.

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  28. वाह सुंदर रचना के लिये साधुवाद स्वीकारें...

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  29. प्रभात का बड़ा सुन्दर वर्णन किया है | अच्छा लगा |

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  30. sabhi ne sundar tasvire khichi hai aur main bhi sab vicharo se sahamat hoon .mujhe bahut hi achhi lagi kavita .aapke sundar man se pragat hui kavita jo hai .

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  31. इंसानी जज़्बात और क़ुदरत के करिश्में ...दोनोका विलक्षण संगम बन बहता कविता का प्रवाह ...!

    'बिखरे सितारे' ,पे टिप्पणी के तहे दिलसे शुक्रिया...

    आगेके सफर के बारे में अभी कुछ भी न कहना बेहतर !के सफर में इतने अधिक उतर चढाव आते रहेंगे,कि, शायद लिखनेवाली गश खा जाय..!

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  32. आ मिल कर करें
    नव रश्मि का अभिनंदन
    वो आ रहा है देखो
    भोर का स्पंदन.........
    ... बेहद रोचक व प्रभावशाली रचना !!!!

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  33. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुती....पढ्कर बहुत ही अच्छा लगा. अभार.

    गुलमोहर का फूल

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  34. WAH DIGAMBER JI,

    सुबह की पगली किरण
    उतर आई है तेरे सिरहाने
    आ मिल कर करें
    नव रश्मि का अभिनंदन
    वो आ रहा है देखो
    भोर का स्पंदन.........

    BAHUT GAHRE BHAV LIYE ANUPAM RACHNA. BAHUT KHOOB.

    जवाब देंहटाएं
  35. सुबह की पगली किरण
    उतर आई है तेरे सिरहाने
    आ मिल कर करें
    नव रश्मि का अभिनंदन
    वो आ रहा है देखो
    भोर का स्पंदन.........
    बेहतरीन रचना ,बधाई

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  36. सुबह-सुबह पढ़ना काफी सकूँ भरा लगा। सुंदर कोमल काव्‍य।

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  37. उछाह और उमंग से ओतप्रोत प्रयाण गीत !

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  38. aapki kavita ne jeewan ka sanchaar kar diya hai dhamniyon mein...
    bahut hi sundar..

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  39. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है