रविवार, 6 दिसंबर 2009

हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं

आस्था विशवास का विस्तार क्यों नहीं
आदमी को आदमी से प्यार क्यों नहीं

भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं

पा लिया दुनिया को मैंने हार कर दिल
हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं

दिल के बदले दिल मिले, आंसू नहीं
इस तरह से प्यार का व्यापार क्यों नहीं

सत्य ही कहता है आईना हमेशा
आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं

60 टिप्‍पणियां:

  1. आदमी को आदमी से प्यार जरूर हो

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  2. दिल के बदले दिल मिले, आंसू नहीं
    इस तरह से प्यार का व्यापार क्यों नहीं

    सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं


    बहुत सुंदर पंक्तियाँ....... बेहतरीन शब्दों के साथ ....बहुत ही खूबसूरत कविता......

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  3. लिया दुनिया को मैंने हार कर दिल
    हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं

    दिल के बदले दिल मिले, आंसू नहीं
    इस तरह से प्यार का व्यापार क्यों नहीं

    waah behtarin.har sher ajawab hai,ye bahut pasand aaye.

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  4. सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं nice

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  5. आस्था विश्वास का विस्तार क्यों नहीं
    आदमी को आदमी से प्यार क्यों नहीं
    --बेहतरीन है जी वाह! वाह! वाह!
    भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी यहाँ
    पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं
    -इसमें यहाँ जोड़ दिया जाय तो कैसा रहेगा?
    -मर्जी आपकी सामान आपका ।

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  6. दिल के बदले दिल मिले, आंसू नहीं
    इस तरह से प्यार का व्यापार क्यों नहीं

    khoobsurat panktiyaan..

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  7. भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
    पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं.
    ye sawal aaj bhi apni jagah kayam hai.

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  8. भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
    पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं
    Nasva ji,
    bahut hi sundar.

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  9. आपकी ग़ज़ल हमेशा दुनियाँ से जुड़ी हुई होती हैं. कुछ ना कुछ कहती हुईं.

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  10. पा लिया दुनिया को मैंने हार कर दिल
    हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं

    एक और सुन्दर रचना दिगम्बर जी, चर्चा में भी आपकी कविताओ का उलेख देख रहा था अच्छा लगा बधाई !

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  11. भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
    पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं

    आज कल हर चीज़ नकली जो मिलने लगी है।

    अच्छी रचना।

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  12. वाह नासवा जी..बेहतरीन..!
    सरल सब्द..सहज शिल्प और सुन्दर भाव...!
    इसे कहते हैं गुनगुना कर बड़ी बात कह देना...!!

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  13. हार के आगे ही जीत होती है...

    जय हिंद...

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  14. सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं

    bahut hi sundar panktiyan........satya ko satya ka aaina dikhati huyi.

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  15. 'सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं '
    'भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
    पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं.

    bahut umda!

    sabhi prashn bahut sateek hain.
    bahut achchhee rahcna hai.

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  16. भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
    पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं

    बहुत सुन्दर गज़ल है जी!
    लेकिन इस छन्द को समझ नही पाया हू।
    पुष्प में तो गन्ध भी होती है और श्रंगार भी!
    मगर कवि की सोच की उड़ान क्या होगी यह तो कवि ही वता सकता है!
    बाबा नागार्जुन को जब सुनता था तो उनसे भी यही प्रश्न किया करता था! परऩ्तु
    उनके समाधान करने पर जिज्ञासा शान्त हो जाती थी!

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  17. बहुत सुंदर कविता, हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं, क्यो कि हम हार कर उस से सवक ले लेते है ओर अगली बात जीत की उम्मीद रखते है

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  18. सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं
    शायद उसे अपनी ताकत का पता है .

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  19. पा लिया दुनिया को मैंने हार कर दिल
    हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं

    bahut pyari panktian, sabhi sher umda. badhaai sweekaren digambar ji.

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  20. ग़ज़ल दिल को छू गई।
    बेहद पसंद आई।

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  21. दिगम्बर नासवा जी
    ग़ज़ल का मतला-
    आस्था विश्वास का विस्तार क्यों नहीं
    आदमी को आदमी से प्यार क्यों नहीं
    एक सवाल है,
    और ये शेर उसका जवाब भी-
    पा लिया दुनिया को मैंने हार कर दिल
    हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं
    सच कहा आपने,
    काश, इस जीत के लिये हम सब मिलकर लडें..
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  22. आपकी भाषा जादुई है . एकदम अलग ! आखिरी पंकियाँ अति सुंदर हैं .

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  23. aaiyine ko khud pe ahnkar kyun nahi
    kya baat hai.
    bejod digambar ji .

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  24. "भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
    पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं "

    क्या खूब दिगम्बर जी!

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  25. सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं

    बहुत अच्छा लिखा अपने। कुछ ऐसा पढ़कर अच्छा लगा महज तुकबंदी के अलावा कुछ बेहतरीन संदेश भी था।
    आपको बहुत-बहुत बधाई!
    आगे भी जारी रखिए।

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  26. पा लिया दुनिया को मैंने हार कर दिल
    हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं

    अच्छी ग़ज़ल, सीधी /सरल भाषा, बिना लाग लपेट के.......!

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  27. सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं
    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में कही गई एक बेहतरीन रचना, आभार ।

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  28. जीवन के अनन्य भावों को लिया है,बहुत ही बढ़िया

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  29. दिल के बदले दिल मिले, आंसू नहीं
    इस तरह से प्यार का व्यापार क्यों नहीं .....
    aasha hai aisa bhi kabhi ho sakega............

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  30. आप द्वारा लिखी गई पंक्तियां वाकई में दिल को छूने वाली है।

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  31. "सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं"

    वाह सुन्दर विचार और अभिव्यक्ति!

    "सच में" पर आप के लगातार आने और स्नेह तथा प्रशंसा के लिये आप का आभार!

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  32. कविता का शीर्षक मुझे बेहद पसंद आया! बहुत खूब लिखा है आपने! इस लाजवाब कविता के लिए बधाई!

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  33. सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं

    बहुत सुन्दर और पंक्तियां----सच्चाई को समेटे हुये…
    पूनम

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  34. भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
    पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं
    सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं
    बहुत बेहतरीन अभिव्यक्ति एक एक शब्द अपनी कहानी खुद ही कह रहा है। आज कल समय ही किसके पास है गंध और श्रंगार के लिए जमाना तो और भी आगे निकल गया है।आज कल तो हर चीज़ फास्ट और टेम्पोरेरी ही प्रचलन में है।

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  35. दिल के बदले दिल मिले, आंसू नहीं
    इस तरह से प्यार का व्यापार क्यों नहीं ।
    पूरी गज़ल ही सुंदर है पर ये शेर खास अच्छा लगा ।

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  36. Jiska man aaina hota hai, use kab apne aap pe ahankar hota hai?

    "Gazab Qanoon" pe commentke liye tahe dilse shukriya!
    (Vandana ji kee bhee shukr guzaar hun,ki, unhon ne mera aalekh apne blog pe dala!)

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  37. दिल के बदले दिल मिले, आंसू नहीं
    इस तरह से प्यार का व्यापार क्यों नहीं

    सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं

    bahut sundar abhivyakti ....badhai

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  38. सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं

    wah ! sudar darshan ! anukarniya sandesh .

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  39. भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
    पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं

    पा लिया दुनिया को मैंने हार कर दिल
    हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं

    Man WAAH WAAH karte agha nahi raha....kya likha hai aapne WAAH !!!

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  40. "सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं"

    सुन्दर भावों को सजोय हुए एक बहुत ही बढिया रचना!!!

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  41. बहुत सुन्दर आइना सत्य ही कहता पर अहंकार नहीं !!! पेड़ मीठे फल दूसरों को ही देते स्वंयं क्यों नहीं खाते !! सुन्दर रचना !!!

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  42. भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
    पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं

    दिल के बदले दिल मिले, आंसू नहीं
    इस तरह से प्यार का व्यापार क्यों नहीं

    बहुत ही अर्थपूर्ण भाव दिगम्बर जी..कुछ ऐसा ही भाव मेरे मन में भी उठा था....अजीब है ना ये सब रिश्ते .....??इंसानियत और दोस्ती के रिश्ते का कद बहुत बड़ा है , मेरी नज़रों में तो

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  43. vबहुत दिनों बाद ,आपकी सभी रचनाएँ पढ़ी ,हमेशा की तरह अच्छा लगा ,एक संतुलन और स्थिरता है आपकी रचनायों में ,शुभकामनायें ।

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  44. भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
    पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं

    वाह...दिगंबर जी आपका लेखन चमत्कृत करता है...
    नीरज

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  45. सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं
    LAJWAAB

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  46. पा लिया दुनिया को मैंने हार कर दिल
    हार में ही जीत है तो हार क्यों नहीं


    वाह दिगंबर जी !!!

    क्या बात कही है ...एक एक शेर सचमुच दिल की गहराई तक अपने अर्थ छोड़ जाता है ....:)

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  47. दिगंबर जी
    आदमी से आदमी को प्यार क्यों नहीं . इसी तरह के सवाल कई हैं आपके .शायद चीजों से प्यार बढ़ता जा रहा है इसी लिए ?

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  48. बेहतरीन ग़ज़ल
    बहुत बहुत आभार.....

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  49. सुन्दर भावों को सजोय हुए एक बहुत ही बढिया रचना!!!

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  50. आस्था विशवास का विस्तार क्यों नहीं
    आदमी को आदमी से प्यार क्यों नहीं


    आज कल आदमी बस अपने ही विकास में लगा पड़ा है कलयुग की माया के आगे उसकी आँखे बंद सी हो गई है..
    बहुत बढ़िया बढ़िया बात..सुंदर गीत..बधाई

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  51. भ्रमर भी है, गीत भी है, रीत भी
    पुष्प में फिर गंध और श्रृंगार क्यों नहीं


    इस शे'र के ज़वाब में 'ज़ावेद अख्तर सा'अब' का एक शे'र याद हो आया:

    'किन शब्दों में इतनी कडवी इतनी कसिली बात लिखूं,
    ग़ज़ल की में तहज़ीब निभाऊं या अपने हालत लिखूं?'

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  52. सत्य ही कहता है आईना हमेशा
    आईने को खुद पर अहंकार क्यों नहीं


    क्यूंकि शायद आइने का कोई Zoological नाम नहीं है...

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है