गुरुवार, 14 जनवरी 2010

शिकवे कितने सारे हैं

झूठे वादे, झूठे सपने, झूठे इनके नारे हैं
जैसे नेता, वैसी जनता शिकवे कितने सारे हैं

आग लगी है अफ़रा-तफ़री मची हुई है जंगल में
लूट रहे जो घर को तेरे रिश्तेदार तुम्हारे हैं

पहले तो जी भर के लूटा सागर धरती पर्वत को
डरते हैं जब भू मंडल के ऊपर जाते पारे हैं

पृथ्वी जल अग्नि वायु में इक दिन सब मिट जाना है
ये तेरा है, वो मेरा सब इसी बात के मारे हैं

अपने बंधु मित्र सगे संबंधी साथ नही देता
अपनी यादें, अपने सपने, बस ये साथ हमारे हैं

सूनी आँखें, टूटे सपने, खाली घर, रूठा अंगना
रीती रातें, सूना चंदा, तन्हा कितने तारे हैं

पात्र सुपात्र नही हो तो फिर ज्ञान नहीं बाँटा जाता
अपने ही बच्चों से अक्सर कृष्ण भी बाजी हारे हैं

62 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बेहतरीन मन, मानसिकता, संस्कार पर्यावरण राजनीती और जीव का कटु सत्य एक साथ समेटे हुए,सोचने को मजूबर करती रचना

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  2. हुज़ूरे-ए-आला, आज तो आपने बरसात कर दी शे'रों को...

    Udhar Tarahi me samaan baandha hai.

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  3. आग लगी है अफ़रा-तफ़री मची हुई है जंगल में
    लूट रहे जो घर को तेरे रिश्तेदार तुम्हारे हैं

    Sach byaani hai.....

    पहले तो जी भर के लूटा सागर धरती पर्वत को
    डरते हैं जब भू मंडल के ऊपर जाते पारे हैं

    Ham kya kahen...apko sab khabar hai..

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  4. बहुत ही खूबसूरत रचना है । मेरा अभिनन्दन और बधाई स्वीकार करें ।
    http://sudhinama.blogspot.com

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  5. पात्र सुपात्र नही हो तो फिर ज्ञान नहीं बाँटा जाता
    अपने ही बच्चों से अक्सर कृष्ण भी बाजी हारे हैं
    .....
    moti nikala hai gahre paith kar

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  6. बहुत बढ़िया प्रस्तुती एक एक शब्द एक एक पंक्ति मुखर हो उठी है आपकी कलम का साथ पा कर

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  7. पात्र सुपात्र नही हो तो फिर ज्ञान नहीं बाँटा जाता
    अपने ही बच्चों से अक्सर कृष्ण भी बाजी हारे हैं
    अरे क्या खूब कहा है....इतना गहरा कहाँ से ढूँढ कर लाये आप....बहुत बढ़िया रचना है

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  8. पहले तो जी भर के लूटा सागर धरती पर्वत को
    डरते हैं जब भू मंडल के ऊपर जाते पारे हैं

    पात्र सुपात्र नही हो तो फिर ज्ञान नहीं बाँटा जाता
    अपने ही बच्चों से अक्सर कृष्ण भी बाजी हारे हैं

    नस्वा जी ,
    बहुत सुन्दर ढंग से आपने मानव के स्वार्थ को लिखा है.....खूबसूरत ग़ज़ल कही है....

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  9. पहले तो जी भर के लूटा सागर धरती पर्वत को
    डरते हैं जब भू मंडल के ऊपर जाते पारे हैं

    सार्थक संदेश , शानदार रचना

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  10. पहले तो जी भर के लूटा सागर धरती पर्वत को
    डरते हैं जब भू मंडल के ऊपर जाते पारे हैं

    पात्र सुपात्र नही हो तो फिर ज्ञान नहीं बाँटा जाता
    अपने ही बच्चों से अक्सर कृष्ण भी बाजी हारे हैं
    ये दो शेर ही नहीं पूरी गज़ल ही दिल को छू गयी। कितनी सुन्दर और सटीक बातें इतने अच्छे ढंग से कही हैं कि शब्द नहीं मिल रहे तारीफ के लिये। बहुत बहुत बधाई।

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  11. सुन्‍दर भाव।


    सूनी आँखें, टूटे सपने, खाली घर, रूठा अंगना
    रीती रातें, सूना चंदा, तन्हा कितने तारे हैं
    इस शेर में तो बहुत सारा वि‍वरण है।

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  12. बहुत ही गहन और लाजवाब रचना.

    रामराम.

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  13. झूठे वादे, झूठे सपने, झूठे इनके नारे हैं
    जैसे नेता, वैसी जनता शिकवे कितने सारे हैं
    बहुत खुब जी
    धन्यवाद

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  14. पात्र सुपात्र नही हो तो फिर ज्ञान नहीं बाँटा जाता
    अपने ही बच्चों से अक्सर कृष्ण भी बाजी हारे हैं

    digambarji..yahi he saar. mujhe bahut behatreen lagi yah rachna..isaliye bhi ki in panktiyo me dher saare arth apas me goonthe hue he, jo jitanaa suljha kar nikaal le......

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  15. बहुत खूब लिखा आपने. वाकई में, अपने तो सिर्फ़ यादें हैं.

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  16. सूनी आँखें, टूटे सपने, खाली घर, रूठा अंगना
    रीती रातें, सूना चंदा, तन्हा कितने तारे हैं...
    भावपूर्ण रचना.

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  17. आग लगी है अफ़रा-तफ़री मची हुई है जंगल में
    लूट रहे जो घर को तेरे रिश्तेदार तुम्हारे हैं

    पहले तो जी भर के लूटा सागर धरती पर्वत को
    डरते हैं जब भू मंडल के ऊपर जाते पारे हैं
    kis kis sher ki tarif karoon.........sabhi lajawaab hain aur bhavnayein ubhar kar aa rahi hain ..........manav vyatha ko jivant kar diya aapki gazal ne.

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  18. पृथ्वी जल अग्नि वायु में इक दिन सब मिट जाना है
    ये तेरा है, वो मेरा सब इसी बात के मारे हैं

    यही बात सब समझ ले तो फिर बात ही क्या है ..बहुत पसंद आई आपकी लिखी यह पंक्तियाँ शुक्रिया जी

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  19. झूठे वादे, झूठे सपने, झूठे इनके नारे हैं
    जैसे नेता, वैसी जनता शिकवे कितने सारे हैं

    सत्य है . पूरी गज़ल ही लाजबाब है

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  20. bahut sundar kavita lagi... aapko makar sankranti ki shubhkaamnaye

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  21. बहुत सुन्दर रचना , मकर संक्रांति की शुभकामनाये

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  22. पृथ्वी जल अग्नि वायु में इक दिन सब मिट जाना है
    ये तेरा है, वो मेरा सब इसी बात के मारे हैं
    अच्छी ग़ज़ल, जो दिल के साथ-साथ दिमाग़ में भी जगह बनाती है।

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  23. आग लगी है अफ़रा-तफ़री मची हुई है जंगल में
    लूट रहे जो घर को तेरे रिश्तेदार तुम्हारे हैं

    आज यही सच है।
    बहुत सुन्दर शेरों से सजी ग़ज़ल।

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  24. मकर संक्रांति की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ!
    बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने!

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  25. क्या कोई ज्ञानी बता सकता है कि चिट्ठाचर्चा पर की इस टिप्पणी में ऐसा क्या था जो इसे रोक रखा गया है?
    http://murakhkagyan.blogspot.com/2010/01/blog-post.html

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  26. पृथ्वी जल अग्नि वायु में इक दिन सब मिट जाना है
    ये तेरा है, वो मेरा सब इसी बात के मारे हैं.....

    बहुत खूब्!!! लाजवाब्!!!

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  27. rajneeti,paryavaran,rishte,mitrta, tanhayi aur aaj k baccho per sab per ek ek sher likh dala...bahut khoob.bahut khoobsurat shabdo se sawaara hai gazel ko.

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  28. अपने बंधु मित्र सगे संबंधी साथ नही देता
    अपनी यादें, अपने सपने, बस ये साथ हमारे हैं

    -वाह, क्या बात है..आजकल जबरदस्त शेर निकल कर आ रहे हैं.

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  29. क्या ठाठ बनाया है आपने ...
    सूनी आँखें, टूटे सपने, खाली घर, रूठा अंगना
    रीती रातें, सूना चंदा, तन्हा कितने तारे हैं ...
    और समापन का शेर तो गजब ही है ...
    ऐसी गजलें पसंद आती हैं ... आभार ,,,

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  30. nishavd jaisee sthitee hai.......
    aasheesh hee de saktee hoo aisee hee sandesh chodtee sarthak rachanae aapkee kalam aur soch se hame miltee rahe ..atydhik sunder rachana hai ye ........

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  31. पहले तो जी भर के लूटा सागर धरती पर्वत को
    डरते हैं जब भू मंडल के ऊपर जाते पारे हैं

    बहुत खूब!
    वातावरण के बदलने का ग़ज़ल पर भी प्रभाव!
    -पात्र सुपात्र नही हो तो फिर ज्ञान नहीं बाँटा जाता
    अपने ही बच्चों से अक्सर कृष्ण भी बाजी हारे हैं
    -बहुत उम्दा!

    *****बेहतरीन ग़ज़ल कही है!

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  32. झूठे वादे, झूठे सपने, झूठे इनके नारे हैं
    जैसे नेता, वैसी जनता शिकवे कितने सारे हैं

    आग लगी है अफ़रा-तफ़री मची हुई है जंगल में
    लूट रहे जो घर को तेरे रिश्तेदार तुम्हारे हैं


    इस रचना में तो आपने कलई खोल कर रख दी!
    जमीन से जुड़ी इस गजल के लिए बधाई!

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  33. कमाल है भई. सर्द मौसम में इतनी आग बरसाती, आक्रोश से भरी, लोगों के जज्बात की तर्जुमानी करती यह शानदार गजल, मुझे तो चित कर गयी. लगता है यार आपने मुझे इस गजल की गर्मी में जला देने का इरादा कर लिया है. जी में आया कि आपका नाम काट बल्कि मिटा कर, अपना लिख दूं. अब आगे क्या लिखूं, आप ने तो बोलती ही बंद कर दी.
    कल बहुत कोशिश की कमेन्ट पोस्ट करने की, पता नहीं क्यों, मेरा लिखा लेने को तैयार ही नहीं हुआ ये मुआ बक्सा.

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  34. digambar ji tarahi mushayere men apki ghazal padhne ke bad pahli bar apke blog par ayi hoon shuru ki do ghazlen hi itni umda hain ki tareef ke liye shabdon ka chayan mushkil ho raha hai ,aur sare shabd likhoon itni samarthya nahin ,paryavaran par itne achchhe sher!jawab nahin
    buzurgon ki halat ka jo varnan apne aik sher men kar diya qabile tareef hai mubarak ho.

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  35. आग लगी है अफ़रा-तफ़री मची हुई है जंगल में
    लूट रहे जो घर को तेरे रिश्तेदार तुम्हारे हैं

    पहले तो जी भर के लूटा सागर धरती पर्वत को
    डरते हैं जब भू मंडल के ऊपर जाते पारे हैं

    बेहद ख़ूबसूरत रचना,
    दिगम्बर नासवा जी

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  36. nishbd hoo is utkrsht abhivykti par .
    de jate hai apno ko hi dukh
    aur le jate hai apno ka hi sukh .

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  37. बहुत स्क्रोल करना पड़ा कमेन्ट के लिए.)

    पहले तो जी भर के लूटा सागर धरती पर्वत को
    डरते हैं जब भू मंडल के ऊपर जाते पारे हैं

    बहुत सामयिक बात... गोया पूरी गजल ही..

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  38. 2010 लगता है बड़ा गंभीर साल है कहीं बेचैनी कहीं उदासी तो कहीं खामोशी छाई हुई है .

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  39. गज़ब की मधुरता भरी है इस ग़ज़ल मे..कि बड़ी अपनी सी लगती हैं सारी कही बातें..
    और फिर इस पंक्तियों का जादू..
    सूनी आँखें, टूटे सपने, खाली घर, रूठा अंगना
    रीती रातें, सूना चंदा, तन्हा कितने तारे हैं

    जैसे चाँदनी के तरल आँसुओं मे रात ने मिश्री घोल कर नींद को पिला दी हो..
    पढ़ कर मजा आया सर जी...

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  40. सूनी आँखें, टूटे सपने, खाली घर, रूठा अंगना
    रीती रातें, सूना चंदा, तन्हा कितने तारे हैं..
    Aisee panktiyon tareef kin lafzon me kee jaye?

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  41. सूनी आँखें, टूटे सपने, खाली घर, रूठा अंगना
    रीती रातें, सूना चंदा, तन्हा कितने तारे हैं
    .... एक-एक शब्द का अपना-अपना प्रभाव है क्या गजब अभिव्यक्ति है जितनी भी तारीफ़ की जाये कम ही पडेगी... बेहद प्रसंशनीय,बधाई !!!!!

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  42. आग लगी है अफ़रा-तफ़री मची हुई है जंगल में
    लूट रहे जो घर को तेरे रिश्तेदार तुम्हारे हैं....
    hundred percent accurate....

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  43. दिगंबर जी
    बेहतरीन ग़ज़ल हर शेर उम्दा है|
    तारीफ के लिए मेरे पास ज्यादा शब्द नहीं है
    आग लगी है अफ़रा-तफ़री मची हुई है जंगल में
    लूट रहे जो घर को तेरे रिश्तेदार तुम्हारे हैं

    बहुत बहुत आभार

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  44. सूनी आँखें, टूटे सपने, खाली घर, रूठा अंगना
    रीती रातें, सूना चंदा, तन्हा कितने तारे हैं

    b-e-h-a-t-r-e-e-n ...

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  45. aअरे क्या बात दिगम्बर जी...छाये हुये हैं आजक्ल आप तो अपनी लेखनी से। बहुत सुंदर ग़ज़ल...बहुत ही सुंदर...उधर पहले तरही का धमाल अब इधर ये लाजवाब ग़ज़ल।

    किसी एक शेर की तारीफ़ करना...न बाबा, सब के सब उत्कृष्ठ!

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  46. सही है यादें और सपने ही साथ देते है लेकिन फिर भी ""उतना ही उपकार समझ कोई जितना साथ निभादे ""एक ही शेर में कितना कुछ कह दिया है कि क्या कहे आंगन ,घर ,आंखें ,सपने,रातें चांद तारे सब अकेले सब उदास ।इस घर की देखभाल को वीरानियां तो है , जाले हटा दिये तो हिफ़ाजत करेगा कौन। घर के रिश्तेदारो द्वारा लूटा जाना "" घर वालों ने प्यार जता कर ,गैरों ने मक्कारी से /मुझको तो मिल जुल कर लूटा सबने बारी बारी से ""

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  47. सूनी आँखें, टूटे सपने, खाली घर, रूठा अंगना
    रीती रातें, सूना चंदा, तन्हा कितने तारे है
    bahut hi khoobsurat rachna ,ek se badhkar ek rachna line lagati jaa rahi hai ,jawab nahi .tyohar par itni mithi rachna ,badhai ho aapko .

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  48. बहुत स्क्रोल करना पड़ा कमेन्ट के लिए.)
    भगवान करे..हर बार करना पड़े...!

    बेहद उम्दा..उम्दा..उम्दा..!

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  49. आग लगी है अफ़रा-तफ़री मची हुई है जंगल में
    लूट रहे जो घर को तेरे रिश्तेदार तुम्हारे हैं

    बिलकुल सच कह दिया भाई

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  50. पात्र सुपात्र नही हो तो फिर ज्ञान नहीं बाँटा जाता
    अपने ही बच्चों से अक्सर कृष्ण भी बाजी हारे हैं

    बहुत बड़ी बात को सीधी सरल भाषा में कह देना आपकी विशेषता है. 'हर धड़कन वतन के लिए' ग़ज़ल बहुत ही अच्छी लगी, उसे संगीतबद्ध किया जा चुका है,सुन कर बड़ी मार्मिक लग रही है. 26 जनवरी को अपने ब्लॉग पर लगाऊँगी, ग़ज़ल भी, उसका ऑडियो भी. धन्यवाद और बधाई.

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  51. pahale to tarahi me behtarin gazal padhawaane ke liye dil se hardik khushi hai aur dhero duaayen... aur fir yah tewar aapke blog par kamaal hai huzoor... kalam kamaal karti jaa rahi hai magar aapke chhandmukt kavitaayen meri kamjori hain , ho sake to mera khayaal rakhen.. :)

    arsh

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  52. खूबसूरत गजल के लिए बधाई स्वीकार करें.

    इन दो शेरोन ने तो मन मोह लिया:-

    पहले तो जी भर के लूटा सागर धरती पर्वत को
    डरते हैं जब भू मंडल के ऊपर जाते पारे हैं

    सूनी आँखें, टूटे सपने, खाली घर, रूठा अंगना
    रीती रातें, सूना चंदा, तन्हा कितने तारे हैं
    ...वाह!

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  53. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना लिये हुये बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  54. दिगम्बर जी मुझे तो ग़ज़ल के बारे में बहुत जानकारी नही है मैं तो बस भाव को प्रधानता देता हूँ और उसमें आप कहीं कोई कसर नही छोड़ते है..हर एक लाइन इतना बढ़िया ढंग से सजाया की क्या तारीफ़ करूँ ..बहुत खूब..भगवान आपकी लेखनी को और प्रसिद्धि दें..

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  55. आग लगी है अफ़रा-तफ़री मची हुई है जंगल में
    लूट रहे जो घर को तेरे रिश्तेदार तुम्हारे हैं

    क्या बात कही है आपने. व्यस्तता के चलते आपकी कई ख़ास रचनाएँ छूट गयी है मुझसे, आज उन्ही को पढ़ रहा हूँ

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  56. पात्र सुपात्र नही हो तो फिर ज्ञान नहीं बाँटा जाता
    अपने ही बच्चों से अक्सर कृष्ण भी बाजी हारे हैं

    bahut khoob

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  57. यूँ तो सारी उम्र ज़ख़्मों से लड़ा था
    हिल गई बुनियाद घर फिर भी खड़ा था

    yakinan kabil-e-daad
    kubool karen

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है