गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

सोदा

विकसित होने से पहले
कुचल जाते हैं
कुछ शब्दों के भ्रूण

बाहर आने से पहले
फँस जाते हैं होठों के बीच
कुछ जवाब

द्वंद में उलझ कर
दम तोड़ देते हैं
कुछ विचार

हथेलियों में दबे दबे
पिघल जाता है आक्रोश

पेट की आग
जिस्म की जलन
उम्मीद का झुनझुना
मौत का डर
मुक्ति की आशा
अधूरे स्वप्न
जीने की चाह
कुछ खुला गगन

पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
गिनती की साँसें के बदले
सोदा बुरा तो नही ......

85 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे आक्रोशित मन का एहसास हो रहा है !

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  2. very nice creation,sochneey.
    vikas pandey.

    www.vicharokadarpan.blogspot.com

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  3. बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

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  4. आज के समय के ......कुछ सच्चाई को व्यक्त करती ये रचना .........बहुत खूब

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  5. बाहर आने से पहले
    फँस जाते हैं होठों के बीच
    कुछ जवाब........lajawaab

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  6. अधूरे स्वप्न
    जीने की चाह
    कुछ खुला गगन

    नासवा जी!
    आपका शब्द-चयन बहुत सुन्दर है!
    पूरी रचना सम्वेदनाओंको झंकृत कर रही है!

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  7. पेट की आग
    जिस्म की जलन
    उम्मीद का झुनझुना
    मौत का डर
    मुक्ति की आशा
    अधूरे स्वप्न
    जीने की चाह
    कुछ खुला गगन बहुत खूब ...लफ्ज़ खुद ही इन आक्रोश के भावों को व्यक्त कर रहे हैं ..अधूरे स्वप्न जीने की चाह शायद है किसी दिल के एक कोने में रह जाती है ..पसंद आई आपकी यह रचना शुक्रिया

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  8. विकसित होने से पहले
    कुचल जाते हैं
    कुछ शब्दों के भ्रूण


    द्वंद में उलझ कर

    दम तोड़ देते हैं
    कुछ विचार

    KAI VAR PAD DALEE JHAKJHOR GAYEE YE RACHANA CHINTAN KO..............

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  9. पेट की आग
    जिस्म की जलन
    उम्मीद का झुनझुना
    मौत का डर
    मुक्ति की आशा
    अधूरे स्वप्न
    जीने की चाह
    कुछ खुला गगन

    पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
    गिनती की साँसें के बदले
    सोदा बुरा तो नही ......
    आज के हालात इतने उलझ गये हैं कि हर इन्सान के मन मे आक्रोश जन्म ले रहा है जब आप जैसे सरल ह्रदय इन्सान को इस आक्रोश मे देखें तो हालात की गम्भीरता का अन्दाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है। दिल को छू गये रचना । शुभकामनायें

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  10. नासवा जी, आदाब
    हथेलियों में दबे दबे....पिघल जाता है आक्रोश
    ........पेट की आग..जिस्म की जलन......उम्मीद का झुनझुना.....मौत का डर
    मुक्ति की आशा......अधूरे स्वप्न.......जीने की चाह........कुछ खुला गगन
    पूंजीवाद की तिजोरी में बंद.....गिनती की साँसें के बदले.....सोदा बुरा तो नही .....
    ....वाह.....वाह.....वाह
    खूबसूरत शब्द, जो गहराई से निकले, और दिल में बस गये..

    .

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  11. हथेलियों में दबे दबे
    पिघल जाता है आक्रोश

    पेट की आग
    जिस्म की जलन
    उम्मीद का झुनझुना


    पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
    गिनती की साँसें के बदले
    सोदा बुरा तो नही ......

    बहुत संवेदनशील रचना है....आज के हालातों को सही शब्दों में बयां किया है...

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  12. पेट की आग
    जिस्म की जलन
    उम्मीद का झुनझुना
    मौत का डर
    मुक्ति की आशा
    अधूरे स्वप्न
    ....बेहतरीन, प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!

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  13. हथेलियों में दबे दबे
    पिघल जाता है आक्रोश

    बहुत सही कहा ।

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  14. हथेलियों में दबे दबे
    पिघल जाता है आक्रोश

    पेट की आग
    जिस्म की जलन
    उम्मीद का झुनझुना
    मौत का डर
    मुक्ति की आशा
    अधूरे स्वप्न
    जीने की चाह !


    बहुत कुछ कहता हर एक शब्‍द, लाजवाब प्रस्‍तुति, बधाई ।

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  15. मौत का डर
    मुक्ति की आशा
    अधूरे स्वप्न
    जीने की चाह
    कुछ खुला गगन

    पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
    गिनती की साँसें के बदले
    सोदा बुरा तो नही ...

    aaah kitni mazburi.......aur kaise samait dala hai itne aakrosh ko....jitna shabdo me dhaalna aasaan hai utna hi is aakrosh ko pee jana/daba pana mushkil.....

    samvendansheel rachna.

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  16. पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
    गिनती की साँसें के बदले
    सोदा बुरा तो नही ......

    wah wah behatareen abhivyakti.

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  17. एक कचोटती हुई कविता.....और यह पंक्तियाँ तो..
    हथेलियों में दबे दबे
    पिघल जाता है आक्रोश
    ..बहुत कुछ सच बयान करती हैं..९५ प्रतिशत जनता के असंतोष की यही नियति होती है..मुट्ठी मे दबे दबे पिघल जाने की..

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  18. sochne ko majboor karti ,sachchayi se ru-b-ru karati bahut hi samvedansheel rachna.

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  19. पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
    गिनती की साँसें के बदले
    सोदा बुरा तो नही .....
    ***बेबस ,हताश मन का अंत में समझोता...बुरा तो नहीं!
    --बहुत खूब अभिव्यक्त किया है इस द्वंद को...

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  20. पेट की आग
    जिस्म की जलन
    उम्मीद का झुनझुना
    मौत का डर
    मुक्ति की आशा
    अधूरे स्वप्न
    जीने की चाह
    कुछ खुला गगन ...

    बहुत सुंदर कविता.... आपकी रचना बाँध कर रखती है..... बहुत ही सुंदर रचना....

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  21. हथेलियों में दबे दबे
    पिघल जाता है आक्रोश
    पूँजीवाद पर अच्छी चोट है सच बयान करती हैं.. बहुत सुंदर कविता !!!!

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  22. बहुत सुंदर शव्दो से सजाया है आप ने इस सुंदर कविता को.बहुत सुंदर
    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  23. विकसित होने से पहले
    कुचल जाते हैं
    कुछ शब्दों के भ्रूण

    बाहर आने से पहले
    फँस जाते हैं होठों के बीच
    कुछ जवाब
    Sach..kayi baar aisa hota hai!

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  24. चाहे जितना व्यस्त हो जाऊं पर आप की रचना छूट जाए यह हो नही सकता एक एक शब्द और भाव मेरे लिए बहुत कीमती है एक सीख दे जाती है आपकी रचनाएँ मैं इसे शब्दों में बयान नही कर सकता...खूबसूरत भाव..खूबसूरत शब्द...और खूबसूरत प्रस्तुतिकरण.....

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  25. द्वंद में उलझ कर
    दम तोड़ देते हैं
    कुछ विचार...

    आप भी अहसास को मथ देते है.
    ख़ासकर सौदे वाली स्थिति.... क्या बोलूं मैं.

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  26. haqiqat bayaan kar rahe he janaab, aakrosg bhi dikhtaa he, dabi hui manovyathaa ki jvalamukhi jesi he yah rachna...abhi supt lagtaa he kintu jab footegaa to tabaah macha degaa..../ bahut saarthak rachnaa likhi he aapne.
    vese mujhe aksar ese hi vichaar uthate rahte he aour shayd isiliye esi janakrosh vaali rachnaaye pasand aati he..

    जवाब देंहटाएं
  27. पेट की आग
    जिस्म की जलन
    उम्मीद का झुनझुना
    मौत का डर
    मुक्ति की आशा
    अधूरे स्वप्न
    जीने की चाह
    कुछ खुला गगन

    पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
    गिनती की साँसें के बदले
    सोदा बुरा तो नही .....

    आम आदमी के लिए देश के कर्णधारों द्वारा रचित व्यवस्था में और कोई चारा भी तो नहीं..

    अति सुन्दर प्रस्तुति.

    होली पर आपको हार्दिक बधाइयाँ

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  28. द्वंद में उलझ कर
    दम तोड़ देते हैं
    कुछ विचार
    ऐसी मजबूरी भी आती है...कभी कभी...बहुत खूब...सुन्दर अभिव्यक्ति
    होलो की ढेरों शुभकामनाएं ..

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  29. पेट की आग
    जिस्म की जलन
    उम्मीद का झुनझुना
    मौत का डर
    मुक्ति की आशा
    अधूरे स्वप्न
    जीने की चाह
    कुछ खुला गगन
    bahut hi laazwaab ,man ka dwand pratikshan ,holi mubaarak ho .

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  30. digambar ji blog par aapka e mail address dhoondh raha tha nahin mila, isliye yahin ana pada..............holi ki shubhkaamnaon ke liye hardik dhanyawaad................ apko aur aapke pariwar ko bhi hamari or se is pavan parva ki dheron shubhkaamnayen. dhanyawaad.

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  31. विकसित होने से पहले कुचल जाते हैं कुछ शब्दों के भ्रूण
    अपूर्व शब्द चयन ।
    और
    पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
    गिनती की साँसें के बदले
    सोदा बुरा तो नही ......
    वाह ।

    जवाब देंहटाएं
  32. पेट की आग
    जिस्म की जलन
    उम्मीद का झुनझुना
    मौत का डर
    मुक्ति की आशा
    अधूरे स्वप्न
    जीने की चाह
    कुछ खुला गगन



    आपको व आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें

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  33. *****आपको व आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें******

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  34. आपको होली की हार्दिक शुभकामनाएं....
    सादर व साभार !
    शलभ गुप्ता

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  35. !! रंग बिरंगी होली की रंगारंग शुभकामनाएँ !!

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  36. इस बार रंग लगाना तो.. ऐसा रंग लगाना.. के ताउम्र ना छूटे..
    ना हिन्दू पहिचाना जाये ना मुसलमाँ.. ऐसा रंग लगाना..
    लहू का रंग तो अन्दर ही रह जाता है.. जब तक पहचाना जाये सड़कों पे बह जाता है..
    कोई बाहर का पक्का रंग लगाना..
    के बस इंसां पहचाना जाये.. ना हिन्दू पहचाना जाये..
    ना मुसलमाँ पहचाना जाये.. बस इंसां पहचाना जाये..
    इस बार.. ऐसा रंग लगाना...
    (और आज पहली बार ब्लॉग पर बुला रहा हूँ.. शायद आपकी भी टांग खींची हो मैंने होली में..)

    होली की उतनी शुभ कामनाएं जितनी मैंने और आपने मिलके भी ना बांटी हों...

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  37. हद उम्दा और जरूरी कविता के लिए आभार.

    पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
    गिनती की साँसें के बदले
    सोदा बुरा तो नही ......
    ..वाह! जितनी भी तारीफ़ की जय कम है.

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  38. आपको तथा आपके समस्त परिजनों को होली की सतरंगी बधाई

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  39. आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

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  40. शब्दों के भ्रूण अच्छा बिम्ब है । रंगपर्व की शुभकामनायें ।

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  41. आपको सपरिवार होली की ढेरो बधाईयाँ और शुभकामनाएँ

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  42. बहुत सुन्दर कविता.....
    आपको सपरिवार रंगोत्सव की हार्दिक शुभकामनाऎँ!!!!

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  43. Behad prabhavi rachna.Bhav aur abhivyakti dono hi dristi se..

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  44. mn ka aakrosh aur vyavstha ki jhol ke beech ki kash.m.kash ka bahut hi steek chitran kiya hai....
    chaah ka db kr reh jaana to jaane
    aaj ke insaan ki niyatee bn kr reh gaya hai...
    aapki bhaavnaaeiN spasht haiN... sachch haiN...nek haiN
    A B H I V A A D A N.

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  45. होली की हार्दिक बधाई अवम शुभकामनायें।

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  46. द्वंद में उलझ कर
    दम तोड़ देते हैं
    कुछ विचार

    हथेलियों में दबे दबे
    पिघल जाता है आक्रोश

    रचना अच्छी है



    रंग लेकर के आई है तुम्हारे द्वार पर टोली
    उमंगें ले हवाओं में खड़ी है सामने होली

    निकलो बाहं फैलाये अंक में प्रीत को भर लो
    हारने दिल खड़े है हम जीत को आज तुम वर लो
    मधुर उल्लास की थिरकन में आके शामिल हो जाओ
    लिए शुभ कामना आयी है देखो द्वार पर होली

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  47. द्वंद में उलझ कर
    दम तोड़ देते हैं
    कुछ विचार .....bahut accha.

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  48. सर जी सौदा बिलकुल बुरा नहीं है \होंठो के बीच कुछ जवाब अनकहे रह ही जाते है तभी ऐसा कहा जाता है " कुछ ऐसी बात है जो चुप हूँ ,वरना क्या बात कर नहीं आती

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  49. एक गहरी चोट कर रही है आपकी कविता ......!!

    आह....हम ये सांसों का सौदा कब तक करते रहेंगे......!!

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  50. "अच्छी भावाभिव्यक्ति ..."
    amitraghat.blogspot.com

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  51. "शुक्रिया सर ...."
    amitraghat.blogspot.com

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  52. बहुत उम्दा पोस्ट
    बाहर आने से पहले
    फँस जाते हैं होठों के बीच
    कुछ जवाब
    आभार....................

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  53. "हथेलियों में दबे दबे
    पिघल जाता है आक्रोश.."

    क्या खूब लिखा आपने । बहुत भावपूर्ण रचना ।

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  54. विकसित होने से पहले
    कुचल जाते हैं
    कुछ शब्दों के भ्रूण
    बाहर आने से पहले
    फँस जाते हैं होठों के बीच
    कुछ जवाब
    सच है कई बार हम कितना कुछ छह कर भी कुछ नहीं कह पाते!
    विचारोत्तेजक!

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  55. sahi baat hai.... log bolne se hickichate hai... zindgi kabhi samjhauta hai, kabhi majboori aur kabhi belagaam

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  56. हर बार आप कुछ नया सा विचार मन में डाल जाते हैं.
    बेहतरीन रचना.

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  57. बड़ी गहरी संवेदना है.......आप को इस रचना के लिये बहुत बहुत बधाई....

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  58. बहुत कुछ बया करती कविता अंतर्मन को झकझोर गई।

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  59. पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
    गिनती की साँसें के बदले
    सोदा बुरा तो नही ......

    बहुत खूब.....!!

    सौदा बुरा नही .....

    (सोदा को सौदा कर लें )

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  60. shabdon ka bhurn ...........behad sundar .
    अब नई पोस्ट लिखये !

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  61. "रामनवमी की शुभकामनाएँ....."
    amitraghat.blogspot.com

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  62. पूंजीवाद की तिजोरी में बंद
    गिनती की साँसें के बदले
    सोदा बुरा तो नही ......
    जी हाँ सौदा बुरा नहीं क्योकि कोई विकल्प नहीं है शायद.
    शानदार रचना
    शानदार अभिव्यक्ति

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  63. हथेलियों में दबे दबे
    पिघल जाता है आक्रोश.." !!! बहुत सुंदर और सार्थक व्यंग्य ! बधाई !

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  64. निःशब्द हूँ...क्या कहूँ...

    अद्वितीय !!!

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  65. द्वंद में उलझ कर
    दम तोड़ देते हैं
    कुछ विचार

    हथेलियों में दबे दबे
    पिघल जाता है आक्रोश

    sach mein kitna kuch ghatit hota hai hamare samaj mein aur hum apna aakrosh tak vyakt karne mein asamarth dikhte hai...
    aapki har rachna man ko udelit karti hain.... bahut shubukamnayne...

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  66. बाहर आने से पहले
    फँस जाते हैं होठों के बीच
    कुछ जवाब

    अक्सर होता है ऐसा मेरे साथ,आपके साथ,सभी जिवित या युँ कहेँ अर्धजिवित लोगोँ के साथ

    सत्य

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है