गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

बुढ़ापा - एक दृष्टि-कोण

मेरी रचना "बुढ़ापा" पर सभी मित्रों की टिप्पणी पढ़ कर अभिभूत हूँ ... जहाँ एक और रचना को सभी ने सराहा वहीं मुझे ये आभास भी हुवा की कहीं ना कहीं मेरी रचना एक नकारात्मक पहलू को इंगित कर रही है. सभी टिप्पणियों और विशेष कर आदरणीय महावीर जी की समीक्षा और उनकी लिखी ग़ज़ल ने मुझे प्रेरित किया की मैं बुढ़ापे को इक नये दृष्टि-कोण से देखूं.
आशा है इस नयी रचना में आपको ज़रूर सकारात्मक पहलू नज़र आएगा.


उम्र का मंथन
तज़ुरबों की ख़ान
समय के पन्नों पर लिखा
अनुभव का ग्रंथ

चेहरे की झुर्रियों में उगे
मील के पत्थर
हाथों की उर्वरा से उगे
अनगिनत भविष्य

यज्ञ जीवन
अनंत का निर्माण
जीवन की संध्या
स्वयं का निर्वाण

श्रीष्टि का नियम
प्रेयसी की प्रतीक्षा
मौत का आलिंगन
देह का त्याग

यही तो प्रारंभ है
आत्मा परमात्मा के मिलन का
नये युग के प्रवाह का

56 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी कई रचनाये पढने से रह गयी थी ..अभी सब पढ़ी हर रचना का अलग मिजाज है बुढापा यही तो प्रारंभ है
    आत्मा परमात्मा के मिलन का
    नये युग के प्रवाह का ...यही सत्य है ..बहुत बढ़िया लिखते हैं आप ..शुक्रिया

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  2. युवक नियमों को जानता है, परंतु वृद्ध मनुष्य अपवादों को जानता है ।

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  3. उम्र का मंथन
    तज़ुरबों की ख़ान
    समय के पन्नों पर लिखा
    अनुभव का ग्रंथ
    ati sundar

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  4. 'उम्र का मंथन
    तज़ुरबों की ख़ान
    समय के पन्नों पर लिखा
    अनुभव का ग्रंथ '

    सृष्टि के नियम का पालन करता जीवन अंतिम पड़ाव पर क्या क्या लिए चढ़ता है.
    आप ने बहुत ही खूबसूरती से इस पक्ष को प्रस्तुत किया है...बेहतरीन रचना

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  5. "उम्र का मंथन
    तज़ुरबों की ख़ान
    समय के पन्नों पर लिखा
    अनुभव का ग्रंथ"

    वाह!बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति!सारा अनुभव यही रख दिया हो जैसे....

    कुंवर जी,

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  6. ...बहुत खूब,प्रभावशाली रचना !!!

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  7. अब के नासवा साहब अमृत मंथन करके लौटे हैं ...............सादर चरण स्पर्श

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  8. बहुत सुन्दर व प्रभावशाली रचना है। बधाई स्वीकारें।

    यही तो प्रारंभ है
    आत्मा परमात्मा के मिलन का
    नये युग के प्रवाह का

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  9. सृष्ठी का नियम
    प्रेयसी की प्रतीक्षा
    मौत का आलिंगन
    देह का त्याग

    यही तो प्रारंभ है
    आत्मा परमात्मा के मिलन का
    नये युग के प्रवाह का

    बहुत खूब !

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  10. इस बार वह कमी पूरी हो गयी, बहुत बेहतरीन.

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  11. बहुत सुन्दर नासवा जी ।
    यह दूसरा रूप है , बुढ़ापे का । शानदार ।

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  12. बुढ़ापे का दूसरा रूप भी बहुत पसंद आया

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  13. जीवन के अंतिम पड़ाव का एक यात्रा वृतांत के रूप में चित्रण अप्रतिम है... मृत्यु का प्रेयसी के रूप में वरण वृद्धावस्था की प्रेम गाथा है... जीवंत कर दिया आपने इस यात्रा को..

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  14. बहुत सुन्दर रचना है ! इस बार वाकई आपने सही चित्र प्रस्तुत किये हैं ! बुढ़ापा अपने साथ बहुत तकलीफें ज़रूर लाती है पर ये भी सच है ही हमारे समाज के बड़े बूढ़े एक धरोहर है, उनका तजुर्बा उनका ज्ञान हमारा मार्गदर्शन करता है !

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  15. चेहरे की झुर्रियों में उगे
    मील के पत्थर
    हाथों की उर्वरा से उगे
    अनगिनत भविष्य
    .....
    ye jhurriyan umra ke anubhawon ka dastavej hain

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  16. दोनों कवितायें एक साथ ही पढ़ीं...और अच्छा हुआ..पहली कविता ने तो रोंगटे खड़े कर दिए थे पर सच्चाई भी थी..
    दूसरी कविता पढ़ सुकून मिला...सच्चाई यहाँ भी है..पर भयावह नहीं ...
    सुन्दर रचना

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  17. आत्मा से परमात्मा तक बुढापा एक माध्यम है । बेहतरीन कविता

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  18. उम्र का मंथन
    तज़ुरबों की ख़ान
    समय के पन्नों पर लिखा
    अनुभव का ग्रंथ

    बहुत सहज शब्दों में आपने अनुभव को लिख दिया है....

    चेहरे की झुर्रियों में उगे
    मील के पत्थर
    हाथों की उर्वरा से उगे
    अनगिनत भविष्य

    और इस उम्र तक आते आते कितने भविष्य बना दिए गए इन हाथों से....बहुत खूब

    यज्ञ जीवन
    अनंत का निर्माण
    जीवन की संध्या
    स्वयं का निर्वाण

    अपनी ज़िम्मेदारी निभाः कर स्वयं के निर्वाण की तैयारी....मन तृप्त हो गया ये पंक्तियाँ पढ़ कर

    श्रीष्टि का नियम
    प्रेयसी की प्रतीक्षा
    मौत का आलिंगन
    देह का त्याग

    यही तो प्रारंभ है
    आत्मा परमात्मा के मिलन का
    नये युग के प्रवाह का

    अंतिम पंक्तियाँ ..बहुत प्रभावशाली....
    आपकी इस रचना का एक एक शब्द आत्मसात करने वाला है.....सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई

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  19. पिछली कविता छूट गई थी.... अभी पढ़ी.... दोनों कविता को बहुत ही खूबसूरती से लिखा है आपने.... बहुत सुंदर शब्दों के साथ ...बहुत बढ़िया प्रस्तुति....

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  20. "उम्र का मंथन
    तज़ुरबों की ख़ान
    समय के पन्नों पर लिखा
    अनुभव का ग्रंथ"


    बहुत प्रभावशाली रचना

    सुन्दर प्रस्तुति के लिए
    बधाई & शुभ कामनाएं

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  21. सादर वन्दे !
    एक समापन नए आरम्भ की शुरुआत होती है !
    और जीवन भी यही तो है, इसे आपने बहुत ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया है |
    रत्नेश त्रिपाठी

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  22. श्रीष्टि का नियम
    प्रेयसी की प्रतीक्षा
    मौत का आलिंगन
    देह का त्याग

    यही तो प्रारंभ है
    आत्मा परमात्मा के मिलन का
    नये युग के प्रवाह का
    मौत का आलिंगन प्रेयसी की तरह करना…………………वाह ……अद्भुत ख्याल्…………………लाजवाब रचना।

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  23. चेहरे की झुर्रियों में उगे..मील के पत्थर
    हाथों की उर्वरा से उगे..अनगिनत भविष्य...

    जीवन भर अपने अनुभव की दौलत और अपने आशीष का साया देते वृद्धजनों को समर्पित ये रचना दिल को छू गई. नासवा जी बहुत बहुत बधाई.

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  24. bahut hi behtareen rachna,,,
    yun hi likhte rahein..
    aapko padhna achha lagta hai.....
    ----------------------------------------
    mere blog par is baar
    इंतज़ार...
    jaroor aayein...
    http://i555.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं
  25. मैंने ये नज्म सहेज ली है ..जानती हैं क्यों....ताकी अपने पिता से बात करते हूए कभी आपा खो बैठूं . तो ये नज्म मुझे याद दिलाती रहे की मैं क्या गलती कर रहा हूं....

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  26. रचना अच्‍छी है बस श्रीष्टि को सृष्टि कर लें।

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  27. सुन्दरम !!

    आपकी कविता में अनुभव की गहराई है.

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  28. rachnaatmak lekhan kabhi bhi naakaaratmak nahi hota.
    यही तो प्रारंभ है
    आत्मा परमात्मा के मिलन का
    नये युग के प्रवाह का .....bahut badhiya, sakaaratmak our pahle ki tarah khubsurat.

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  29. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  30. बहुत सुन्दर नासवा जी ।
    यह दूसरा रूप है , बुढ़ापे का । शानदार ।

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  31. उम्र का मंथन
    तज़ुरबों की ख़ान
    समय के पन्नों पर लिखा
    अनुभव का ग्रंथ

    चेहरे की झुर्रियों में उगे
    मील के पत्थर
    हाथों की उर्वरा से उगे
    अनगिनत भविष्य

    रचना बहुत सशक्त है!

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  32. आत्मा परमात्मा के मिलन का
    नये युग के प्रवाह का-वास्तविकता यही है। पतझड़ के बाद ही बसन्त का आगमन होता है।

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  33. " aapki her rachana dil jeet leti hai "

    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

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  34. ब्रद्ध अवस्था ,एक आशा वादी द्रष्टिकोण you are as old as you think

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  35. पूरा टॉपिक ही पलट दिया इस बार..सही है सब हमारी सोच का फ़र्क होता है..चीजें भी वैसी ही हो जाती हैं..वैसे यह पंक्तियाँ जबर्दस्त रहीं

    चेहरे की झुर्रियों में उगे
    मील के पत्थर
    हाथों की उर्वरा से उगे
    अनगिनत भविष्य

    बहुत कुछ सकारात्मक...

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  36. "उम्र का मंथन
    तज़ुरबों की ख़ान
    समय के पन्नों पर लिखा
    अनुभव का ग्रंथ "

    बहुत सुन्दर रचना, बुजुर्गो का मान रखते हुए, बहुत अच्छी बात कही ।

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  37. बहुत अच्छी लगी ये रचना...पिछली कविता पढ़कर तो रूह काँप गयी थी. एक ही बात को दो दृष्टिकोणों से कैसे खूबसूरती से कहा जा सकता है, आपकी दोनों कविताएँ इसका उदाहरण हैं.
    पता है मेरे माता-पिता नहीं हैं...दादा-दादी, नाना-नानी किसी को भी मैंने नहीं देखा क्योंकि मेरे होश सँभालने से पहले ही वो लोग दुनिया से जा चुके थे...मैंने अपने जीवन में जिस वृद्ध को बहुत करीब से देखा वो मेरे पिता ही थे, जब उनका देहांत हुआ, उनकी उम्र ६९ थी...उनके जीवन के अनुभवों ने मेरा मार्गदर्शन किया है, उनकी जिजीविषा ने मुझे जीने का ढंग सिखाया और उनके जोश ने मुझे कठिनाइयों से लड़ने की प्रेरणा दी...अपनी मृत्यु से कुछ पहले वे नाश्ता बनाने की तैयारी कर रहे थे...उनके सिरहाने कई पत्रिकाएँ और उस दिन का अखबार पड़ा था... उस उम्र में वे सारा दिन किताबें पड़ते रहते थे. ये अलग बात है कि जब उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ, तो उनके तीनों बच्चों में से कोई उनके साथ नहीं था, वे अकेले ही रहते थे और खुद खाना बनाते थे, पर बुढ़ापा कितना ग्लोरियस हो सकता है, कितनी शान्ति और शान से बिताया जा सकता है, मैंने उनसे सीखा...मुझे बुढ़ापे से इसीलिये कोई भय नहीं.
    अपि च---
    श्रीष्टि का नियम
    प्रेयसी की प्रतीक्षा
    मौत का आलिंगन
    देह का त्याग ---ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं, पर शायद इसमें "श्रीष्टि" शब्द गलत टाइप हो गया है, इसे "सृष्टि" होना चाहिये...
    मनोज सर की टिप्पणी बहुत अच्छी लगी---
    "युवक नियमों को जानता है, परंतु वृद्ध मनुष्य अपवादों को जानता है ।"
    मेरे ब्लॉग पर आने के लिये और टिप्पणी करने के लिये धन्यवाद !!!

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  38. ye prem to setu hai ..jo sambandh sthapit karta hai .. dono jahaan men..aapne jis preyasi ki kalpna ki hai adbhut hai .. aur

    चेहरे की झुर्रियों में उगे
    मील के पत्थर
    हाथों की उर्वरा से उगे
    अनगिनत भविष्य

    behad sundar bhaav..apne pure nayepan ke saath .. :)

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  39. बुढ़ापे का सही प्रस्तुतिकरण ।


    नेट की समस्या थी इसलिये ब्लाग जगत से दूर था

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  40. ... फिर काहे का बुढ़ापा और कैसा अंत, कैसी शुरुआत, क्या जन्म, क्या मरण ... बस देह का दान, देह का दान।
    बेहतरीन कविता।
    वैसे भी दर्शन की दुनिया में देह से ज्यादा कर्म की महत्ता है। होनी भी चाहिए। और कर्म तो कभी मर नहीं सकता।

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  41. जीवन के इस अन्तिम पडाव का क्या खूब चित्रण किया आपने.....लाजवाब्!

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  42. दोनों कविताएँ बहुत उम्दा हैं !
    बहुत बधाई !

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  43. सृष्टि का नियम
    प्रेयसी की प्रतीक्षा
    मौत का आलिंगन
    देह का त्याग
    यही तो प्रारंभ है
    आत्मा परमात्मा के मिलन का
    नये युग के प्रवाह का....

    बहुत सुंदर....!!

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  44. यही तो प्रारंभ है
    आत्मा परमात्मा के मिलन का
    नये युग के प्रवाह का ....
    superb lines....

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  45. यह अहसास जीने के लि‍ए एक लक्ष्य तो दि‍खाता ही है।

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  46. ...इस रचनामें बुढापे का सकारात्मक पहलू सामने आया है... शब्दों को मानों तराशा गया है!

    आपकी सभी रचनाएं अपनी अलग अलग पहचान लिए हुए है....रुबरु कराने के लिए धन्यवाद!

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  47. यज्ञ जीवन
    अनंत का निर्माण
    जीवन की संध्या
    स्वयं का निर्वाण
    बहुत खुब..आभार

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  48. Aapki dono kawitayen padhee. Budhape ke dono pakshon ko ujagar karatee huee. Dono awasthaon ka warnan ekdam sateek . par doosari wali jyada pasan aaee ek ashawadi drushtikon dikhati huee.
    यही तो प्रारंभ है
    आत्मा परमात्मा के मिलन का
    नये युग के प्रवाह का .
    Wah !

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  49. bahut hi khubsurat... bahut baadhiya aur sakaratmak bhavnaayein

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  50. यही तो प्रारंभ है
    आत्मा परमात्मा के मिलन का
    नये युग के प्रवाह का

    सागर की तह से भाव उठा के लाये हो आप तो ..तारीफ़ मुमकिन नहीं शब्दों में

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है