गुरुवार, 15 जुलाई 2010

धरती

परंपराओं में बँधी
दधीचि सी उदार
नियमों में बँधी
जिस्मानी उर्वारा ढोने को लाचार
बेबस धरती की कोख

ना चाहते हुवे
कायर आवारा बीज को
पनाह की मजबूरी
अनवरत सींचने की कुंठा
निर्माण का बोझ
पालने का त्रास

अथाह पीड़ा में
जन्म देने की लाचारी
अनचाही श्रीष्टि का निर्माण
आजन्म यंत्रणा का अभिशाप

ये कैसा न्याय कैसा स्रजन
प्राकृति का कैसा खेल
धरती का कैसा धर्म ....

68 टिप्‍पणियां:

  1. Qudrat ke qaanoon qudrathi jane! Nihayat khoobsoortee se pesh kiya hai aapne!

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  2. उफ़ …………………बेहद गहन अभिव्यक्ति……………धरती की वेदना का बहुत सुक्ष्म चित्रण और शायद मुझे लगता है इसी के साथ आपने स्त्री जीवन का भी चित्रण कर दिया है।

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  3. यही तो विडम्बना है ... गहन पीड़ा की बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति ..

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  4. dharti ki...naritv ki pir ko bade hi dhir-gambhir tarah se pesh kiya hai aapne..jan manas ko vichlit karti ek sajeev rachna!

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  5. बहुत ही भावुक कर देने वाली बढ़िया रचना...आभार

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  6. बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती रचना.

    आप की रचना 16 जुलाई के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com
    आभार
    अनामिका

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  7. बहुत सुन्दर कल्पना और कृति

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  8. सही है । धरती इस वक्त बड़े नाज़ुक दौर से गुजर रही है ।
    और साथ ही मानव भविष्य भी ।

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  9. ये कैसा न्याय कैसा स्रजन
    प्रकृति का कैसा खेल
    धरती का कैसा धर्म ...


    बहुत बढ़िया !
    धरती मां है न ये सब तो उसे सहना ही है ,
    आरंभ से अंत तक यही नियति है उस की

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  10. नासवा जी, अपकी कविता ने फ़ादर माल्थस की याद दिला दी... कहीं कोई हल नहीं!! धरा की यह व्यथा यह कराह कौन सुनता है..कुछ आपके जैसे सम्वेदनशील लोग हैं, जो इतनी संजीदगी से सोच लेते हैं...बहुत सुंदर!!

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  11. धरती और स्त्री दोनों ही सहनशीलता की पर्याय हैं ।
    अच्छी अभिव्यक्ति ,धरती की व्यथा का ।

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  12. ना चाहते हुवे
    कायर आवारा बीज को
    पनाह की मजबूरी
    अनवरत सींचने की कुंठा
    निर्माण का बोझ
    पालने का त्रास


    form the core of the earth.... mann ki bat padh gaye aap dharti ki .. ghazab

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  13. इसमें वर्णन और विवरण का आकाश नहीं वरन् विश्लेषण, संकेत और व्यंजना से काम चलाया गया है। प्रयुक्त प्रतीक व उपमाएं नए हैं और सटीक भी। आपकी इस कविता में निराधार स्वप्नशीलता और हवाई उत्साह न होकर सामाजिक बेचैनियां और सामाजिक वर्चस्वों के प्रति गुस्सा, क्षोभ और असहमति का इज़हार बड़ी सशक्तता के साथ प्रकट होता है।

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  14. धरती की वेदना का मार्मिक चित्रण ..

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  15. ..ना चाहते हुवे
    कायर आवारा बीज को
    पनाह की मजबूरी
    अनवरत सींचने की कुंठा
    निर्माण का बोझ
    पालने का त्रास..
    ...इसे पढकर याद आया कि हमारे किसान अफीम की खेती करने के लिए विवश थे। आज भी कुछ ऐसी ही बेबसी देखने को मिल जाती है।
    ...बेहतरीन अभिव्यक्ति के लिए बधाई।
    उर्वारा,श्रीष्टि,स्रजन,प्राकृति

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  16. धरती का एक नाम क्षमा भी है !
    यह इसकी क्षमाशीलता है !
    अब तक की सबसे बड़ी साक्षी यही है न !
    अच्छी कविता है ! बाकी मनोज जी ने जो कहा है उससे मेरी भी सहमति है ! आभार !

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  17. एक बार हमरी बिटिया को भूकम्प के बारे में प्रोजेक्ट बनाने को मिला था... जब ऊ हमसे पूछी कि भूकम्प का होता है, त हम सोचे कि का बताएँ... लेकिन मन हुआ कि बोलें कि धरती पर एतना अत्याचार हो रहा है कि ऊ भी कराह कर दर्द से बिलबिलाती है... ई दर्द का पुकार अऊर धरती का काँपना, भूकम्प कहलाता है...उसके समझ में नहीं आया, भाग गई, हमरे पास से... लगता है आज भी आपका बात ऊ लोग को नहीं बुझाएगा जिनके लिए आप लिखे हैं... हमरे लिए त दिल को लगने वाला कबिता है!!

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  18. बहुत कुछ कह रही है आप की यह वेदना से भरी कविता. धन्यवाद

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  19. धरती स्त्री है साहब... और दोनों का धर्म पालना ही है, स्वयं कष्ट में रहकर भी। अच्छी रचना।

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  20. बहुत संवेदनशीलता से रची है धरती की वेदना....सच ही मानव बहुत अत्याचार कर रहा है और धरती सह रही है....

    अथाह पीड़ा में
    जन्म देने की लाचारी
    अनचाही श्रीष्टि का निर्माण
    आजन्म यंत्रणा का अभिशाप

    बहुत मार्मिक पंक्तियाँ....

    जवाब देंहटाएं
  21. ये कैसा न्याय कैसा स्रजन
    प्राकृति का कैसा खेल
    धरती का कैसा धर्म ....

    बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति नासवा जी, मानवी अत्याचारों से पीडित पृ्थ्वी की वेदना को दर्शाती.....
    आभार्!

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  22. ये कैसा न्याय कैसा स्रजन
    प्राकृति का कैसा खेल
    धरती का कैसा धर्म ...
    --
    रचना बहुत ही सुन्दर है
    लेकिन --
    गाहे-बगाहे मन में उठते
    इन प्रश्नों का उत्तर
    सभी को निरुत्तर कर देता है!

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  23. ना चाहते हुवे
    कायर आवारा बीज को
    पनाह की मजबूरी
    अनवरत सींचने की कुंठा
    निर्माण का बोझ
    पालने का त्रास
    धरती की वेदना मे मुझे कहीं कहीं लगा कि एक नारी की वेदक़्ना भी इसमे है
    आजन्म यंत्रणा का अभिशाप

    ये कैसा न्याय कैसा स्रजन
    प्राकृति का कैसा खेल
    धरती का कैसा धर्म ....
    बहुत मार्मिक् अभिवयक्ति है। शायद आपसे अधिक मार्मिक कोई कह नही सकता क्योंकि आप हमेशा दिल की गहराई से बात कहते हैं। शुभकामनायें

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  24. 17.07.10 की चिट्ठा चर्चा में शामिल करने के लिए इसका लिंक लिया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  25. धरती और धरती सरीखी स्त्री की वेदना का मार्मिक चित्रण

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  26. धरती के माध्यम से स्त्री की व्यथा को बहुत सुन्दर तरीके से उकेरा गया है

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  27. ना चाहते हुवे
    कायर आवारा बीज को
    पनाह की मजबूरी
    अनवरत सींचने की कुंठा
    निर्माण का बोझ
    पालने का त्रास

    गहरे भावों के साथ अनुपम प्रस्‍तुति ।

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  28. मैं तो अपनी माटी का अपनी धरती का उपकार मानता हूं
    बहुत ही बढि़या रचना है आपकी

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  29. aapkee ye rachana kitnee gahree soch hai aapkee ye darshatee hai............
    utkrusht rachana hai.........
    Aabhar...

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  30. ना चाहते हुवे
    कायर आवारा बीज को
    पनाह की मजबूरी
    अनवरत सींचने की कुंठा
    निर्माण का बोझ
    पालने का त्रास '
    धरती को शायद इसीलिये सहनशील कहा गया है और सहनशीलता में उसकी तुलना कोई नहीं कर सकता.आप की इस रचना में धरती के दुःख के माध्यम से कई सामजिक /प्राकृतिक समस्याओं की तरफ चिंता व्यक्त की गयी है.
    वर्तमान में अगर धरती के दिल से पूछेंगे तो वह शायद कुछ इसी तरह से अभिव्यक्त करेगी..एक सशक्त और सुगठित रचना.

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  31. phir bhi binaa uff kiye anwrat chalti ja rahi aur sinchati jaa rahi hai!!

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  32. Yah pratikatmak rachna vastav me apne aap me kai aayamo ko samate hue hai.badhai.

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  33. bahut hi achha likha hai..aaj hamari bebas dharti !! sachmuch lachar hai.


    गौरतलब पर आज की पोस्ट पढ़े ... "काम एक पेड़ की तरह होता है."

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  34. लेकिन धरती इस वेदना को वेदना की तरह न लेकर खुशी खुशी झेलती है. यही धरती की स्वाभाविक उदारता है.

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  35. शायद तभी धरती को मां कहते है . सब कुछ सहने वाली

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  36. शायद तभी धरती को मां कहते है . सब कुछ सहने वाली

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  37. दिगंबर जी..धरती की सुंदर मनोव्यथा....प्रकृति के सभी प्रकार से दी गई यातनाओं जैसे सूखा,बाढ़,ओले इत्यादि के बीच भी सृजन करती हुई धरती माँ त्याग की प्रतिरूप है...

    एक नया और सुंदर विषय ...कविता बहुत सुंदर बन पड़ी है...धन्यवाद दिगंबर जी...

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  38. prithvi par ab tak ka sabse bada sankat kaal hai. rachna hame jhakhjhorne me poori tarah safal rahi hai. kaash ham ab bhi sachet ho jayen.

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  39. ना चाहते हुवे
    कायर आवारा बीज को
    पनाह की मजबूरी
    अनवरत सींचने की कुंठा
    निर्माण का बोझ
    पालने का त्रास

    sab to kah diya yahain aapne...tippani ko kya bacha

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  40. इस सशक्त कविता को मैं इमेल फीड से पढ़ चूका था.
    इस बेबसी पर कुछ कहते नहीं बन रहा है.
    -
    (इन दिनों यात्राओं के कारण ब्लॉगजगत से दूरी बनी हुई है.)

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  41. प्रकृति के असहयनीय सत्य को व्यक्त करती कविता।

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  42. परंपराओं में बँधी
    दधीचि सी उदार
    नियमों में बँधी
    जिस्मानी उर्वारा ढोने को लाचार
    बेबस धरती की कोख
    Ghor Bidambana ko darshati Maarmspharshi rachna....

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  43. धरती के दर्द को अंतर्मन से महसूस क्र शब्दों में ढाला है आपने |न जाने कब तक असह्य दर्द झेलती रहेगी धरती माँ ?
    आभार

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  44. शायद तभी धरती को मां कहते है . सब कुछ सहने वाली

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  45. धरती के माध्यम से स्त्री वेदना को छुआ है आपने ......
    बेहद गहन भाव .......!!

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  46. अथाह पीड़ा में
    जन्म देने की लाचारी
    अनचाही श्रीष्टि का निर्माण
    आजन्म यंत्रणा का अभिशाप

    ये कैसा न्याय कैसा सृजन
    प्रकृति का कैसा खेल
    धरती का कैसा धर्म ...
    वाह....बहुत खूब....
    नासवा जी..आपकी रचना दिल को छू गई..

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  47. 'ye kaisa nyay.........'
    wah! kaya baat! kya baat! kya baat!

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  48. @सभी सम्मानित एवं आदरणीय सदस्यों

    आप सबके अपने blog " blog parliament " ( जिसका की नाम अब " ब्लॉग संसद - आओ ढूंढे देश की सभी समस्याओं का निदान और करें एक सही व्यवस्था का निर्माण " कर दिया गया है ) पर पहला प्रस्ताव ब्लॉगर सुज्ञ जी के द्वारा प्रस्तुत किया गया है , अब इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर बहस शुरू हो चुकी है

    कृपया कर आप भी बहस में हिस्सा लें और इसके समर्थन या विरोध में अपनी महत्वपूर्ण राय प्रस्तुत करें ताकि एक सही अथवा गलत बिल को स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जा सके

    धन्यवाद

    महक

    जवाब देंहटाएं
  49. @सभी सम्मानित एवं आदरणीय सदस्यों

    आप सबके अपने blog " blog parliament " ( जिसका की नाम अब " ब्लॉग संसद - आओ ढूंढे देश की सभी समस्याओं का निदान और करें एक सही व्यवस्था का निर्माण " कर दिया गया है ) पर पहला प्रस्ताव ब्लॉगर सुज्ञ जी के द्वारा प्रस्तुत किया गया है , अब इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर बहस शुरू हो चुकी है

    कृपया कर आप भी बहस में हिस्सा लें और इसके समर्थन या विरोध में अपनी महत्वपूर्ण राय प्रस्तुत करें ताकि एक सही अथवा गलत बिल को स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जा सके

    धन्यवाद

    महक

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  50. @सभी सम्मानित एवं आदरणीय सदस्यों

    आप सबके अपने blog " blog parliament " ( जिसका की नाम अब " ब्लॉग संसद - आओ ढूंढे देश की सभी समस्याओं का निदान और करें एक सही व्यवस्था का निर्माण " कर दिया गया है ) पर पहला प्रस्ताव ब्लॉगर सुज्ञ जी के द्वारा प्रस्तुत किया गया है , अब इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर बहस शुरू हो चुकी है

    कृपया कर आप भी बहस में हिस्सा लें और इसके समर्थन या विरोध में अपनी महत्वपूर्ण राय प्रस्तुत करें ताकि एक सही अथवा गलत बिल को स्वीकार अथवा अस्वीकार किया जा सके

    धन्यवाद

    महक

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  51. धरती के धर्म के बहाने जीवन के सच को सलीके से बयां किया है आपने।
    ................
    महिला खिलाड़ियों का ही क्यों होता है लिंग परीक्षण?

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  52. बहुत गहरी अभीव्यक्ति है.....

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  53. बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति नासवा जी।

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  54. क्या कहूँ बहुत भावुक कर गयी आपकी पोस्ट. पर ये ही आज का सत्य है.
    आभार

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  55. Dharti aur stree dono hee gujarti hain is peeda se. Sunder rachna ke dwara dard dilon tak pahunchane me aap safal hain.

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  56. भावुक रचना
    गहरी बात....
    धरती मां...

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  57. Hai, Dhartee kee aisee Bechargee...
    kavi samjhta hai,ya fir Dhartee ... tisra koi nahin...

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  58. ना चाहते हुवे
    कायर आवारा बीज को
    पनाह की मजबूरी
    अनवरत सींचने की कुंठा
    निर्माण का बोझ
    पालने का त्रास
    main bahar gayi rahi is karan yahan nahi aa pai samya se ,ati sundar .

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  59. saarthak gambheer chintan....atisundar रचना....वाह !!!

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  60. प्रणाम धरती माँ .............हैरान हूँ अच्छा माँ तो ऐसे ही होती हैं ............

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है