मंगलवार, 21 सितंबर 2010

क्षणिकाएँ

१) रेखाएँ

हर नये दर्द के साथ
बढ़ जाती है
नयी रेखा हाथ में
और लोग कहते हैं
हाथ के रेखाओं में
भविष्य छिपा है ...

२) चाँद

आसमान में
अटका
तारों में
भटका
सूरज के आते ही
खा गया
झटका

३)

साँसों के साथ खींच कर
दिल में रख लूँगा तुझे
सुना है
खून के कतरे
फेफड़ों से हो कर
दिल में जाते हैं

71 टिप्‍पणियां:

  1. हर क्षणिकाओं ने मन को छू लिया... लास्ट वाली तो वाकई में दिल तक पहुँच गई.... बहुत अच्छी लगीं क्षणिकाएं...

    जवाब देंहटाएं
  2. Pahli wali to bahut pyari lagi.

    Teesri wali kafi scientific hai :)

    जवाब देंहटाएं
  3. साँसों के साथ खींच कर
    दिल में रख लूँगा तुझे
    सुना है
    खून के कतरे
    फेफड़ों से हो कर
    दिल में जाते हैं ।


    बहुत खूब, सुन्‍दर शब्‍दों के साथ बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  4. सभी खानिकाएं लाजवाब ...

    साँसों के साथ खींच कर
    दिल में रख लूँगा तुझे
    सुना है
    खून के कतरे
    फेफड़ों से हो कर
    दिल में जाते हैं

    यह गज़ब लिखा है ..

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह...वाह...वाह....
    और क्या कहूँ ????

    शब्दों से शब्दों का कोई धनी ही इस तरह खेल सकता है...

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह...वाह.
    नासवा जी बहुत अच्छा लिख रहे हैं आप.

    जवाब देंहटाएं
  7. साँसों के साथ खींच कर
    दिल में रख लूँगा तुझे
    सुना है
    खून के कतरे
    फेफड़ों से हो कर
    दिल में जाते

    वाह जबर्दस्त्त लिखा है ...

    जवाब देंहटाएं
  8. सुना है
    खून के कतरे
    फेफड़ों से हो कर
    दिल में जाते ह
    सुंदर रचना के लिए साधुवाद

    जवाब देंहटाएं
  9. साँसों के साथ खींच कर
    दिल में रख लूँगा तुझे ....Touching lines !

    जवाब देंहटाएं
  10. सारी क्षणिकाएं सुन्दर है...अंतिम वाली तो बस बेमिसाल है...कमाल का लिखा है..

    जवाब देंहटाएं
  11. दिगम्बर जी,
    अगर सचमुच दर्द के साथ रेखाएँ बढ रही हैं या बन रही हैं, त ई बात पक्का है कि भविस्य में दर्द नहीं है...क्योंकि तब त रेखाओं के बनने के बाद दर्द पैदा होता...
    बेचारा चाँद... सूरज का अत्याचार नहीं सह सका..सच है हर सक्तिसाली, अपने से कमजोर पर अईसहीं जोर आजमाता है.
    तीसरा बिना सीर्सक काहे है, दिगम्बर भाई!! थोड़ा ध्यान रखिएगा, फेफड़ों में फिल्टर होता है, कहीं चाँद के तरह अटक गई तो??????????
    मन खुस हो गया, आपका ई रचना पढकर!!

    जवाब देंहटाएं
  12. दिगम्‍बर जी अंतिम रचना तो सचमुच हमारे दिल में ही चली गई है। सचमुच बहुत सुंदर है इसे क्षणिका कहने का भी मन नहीं कर रहा। बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  13. वाह...वाह...वाह....बहुत ही लाजवाब क्षणिकाएं .दिल में उतरी और दिल में ही कहीं खो गयी.

    जवाब देंहटाएं
  14. बहुत गहरी अभिव्यक्ति, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  15. हर नये दर्द के साथ
    बढ़ जाती है
    नयी रेखा हाथ में
    और लोग कहते हैं
    हाथ के रेखाओं में
    भविष्य छिपा है ...
    iski baat alag hai....

    जवाब देंहटाएं
  16. चांद की औकात ही बता दी .क्षणिकाए तीनो लाजबाब है

    जवाब देंहटाएं
  17. सभी क्षणिकाएँ बहुत ख़ूबसूरत लगीं

    जवाब देंहटाएं
  18. सभी एक से बढकर एक क्षणिकाएं हैं ...बहुत ही सुंदर पोस्ट

    जवाब देंहटाएं
  19. सही चित्र दिखला दिए आपने इन क्षणिकाओं में!

    जवाब देंहटाएं
  20. संभवतः दर्द ही हमारा भविष्य गढ़ता है।

    जवाब देंहटाएं
  21. थोडा देर से आई हूँ पर दुरुस्त वरना इतनी अच्छी क्षणिकाएं मिस कर देती

    जवाब देंहटाएं
  22. थोडा देर से आई हूँ पर दुरुस्त वरना इतनी अच्छी क्षणिकाएं मिस कर देती

    जवाब देंहटाएं
  23. दर्द की कोख से भविष्य का ख्याल और सूरज के ताप से सहमें चांद का सवाल तो बेहतर है पर 'उसे' खून आलूदा अपनें दिल में रखूं ? तौबा !

    जवाब देंहटाएं
  24. साँसों के साथ खींच कर
    दिल में रख लूँगा तुझे
    सुना है
    खून के कतरे
    फेफड़ों से हो कर
    दिल में जाते हैं
    jawab nahi ,bahut hi behtrin lagi ,behad pasand aai sabhi .

    जवाब देंहटाएं
  25. तीनों ही क्षणिकाएं बढिया लगी.....
    लेकिन प्रथम क्षणिका को लेकर एक शिकायत है आपसे कि कृ्प्या ऎसा गजब मत करें..भाई क्यूं हम गरीब पंडितों के पेट पर लात मारने पर तुले हैं..कुछ कमा खा लेने दीजिए :)

    जवाब देंहटाएं
  26. हर नये दर्द के साथ
    बढ़ जाती है
    नयी रेखा हाथ में
    और लोग कहते हैं
    हाथ के रेखाओं में
    भविष्य छिपा है ...


    -क्या गज़ब कर रहे हो...तीनों एक से बढ़कर एक...वाह!

    जवाब देंहटाएं
  27. उफ़ ! बहुत ही गहन अभिव्यक्ति ....आभार

    जवाब देंहटाएं
  28. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    काव्य प्रयोजन (भाग-९) मूल्य सिद्धांत, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

    जवाब देंहटाएं
  29. बढ़िया है भाई .... घाव करे गंभीर !!

    जवाब देंहटाएं
  30. हर दर्द के साथ बन जाती है एक नयी रेखा ...
    आह !
    साँसों से खींच कर रख लूँगा दिल में ..
    वाह !

    जवाब देंहटाएं
  31. आम तौर पर नही कहती 'दिल को छू गई' जब तक कोई सचमुच 'दिल को ना छू' ले.
    तीसरी क्षणिका में वो बात है.
    ये ख्वाहिश,सपना,सोच ही कम नही कि कोई अपनी साँसों के रस्ते अपने प्रिय को भीतर तक खीच कर दिल में बिठा ले.
    शब्दों से खेलना जानते हो या....... सचमुच 'ऐसे' हो दिगम्बर आप?
    यदि लिखी गई तीसरी क्षणिका जैसे व्यक्तित्त्व और ह्रदय,मन वाले हो तो ....आश्चर्य! ईश्वर के कितने करीब रहते हो!

    जवाब देंहटाएं
  32. बहुत ही सशक्त अभिव्यक्ति है!
    --

    यह सूचना इस लिए दे रहा हूँ क्योंकि चर्चा मंच पत्रिका के आज के अंक में आपकी रचना ली गई है!
    http://lamhon-ka-safar.blogspot.com/2010/09/priye-hai-mujhe-mera-pagalpan.html

    जवाब देंहटाएं
  33. तीनों ही क्षणिकाएं बहुत अच्छी लगीं.
    श्रेष्ठ गज़लकार पुरस्कार प्राप्ति पर बहुत बहुत बधाई.

    जवाब देंहटाएं
  34. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  35. अति सुन्दर क्षणिकाये, लगता है चाँद के भाग्य में केवल झटका ही लिखा है .

    जवाब देंहटाएं
  36. हर नये दर्द के साथ
    बढ़ जाती है
    नयी रेखा हाथ में
    और लोग कहते हैं
    हाथ के रेखाओं में
    भविष्य छिपा है ...
    "कितनी गूढ़ बात कह डाली है आपनी इन पंक्तियों में.......मन उलझ गया है इनमे...."
    regards

    जवाब देंहटाएं
  37. बेहेतरीन क्षणिकाएं...आभार।

    जवाब देंहटाएं
  38. बहुत सुन्दर । आखिरी क्षणिका ने तो दिल ही जीत लिया ।

    जवाब देंहटाएं
  39. सभी क्षणिकाएँ बहुत उम्दा है .
    एक से बढ़कर एक .
    आभार .

    जवाब देंहटाएं
  40. संक्षेप में बहुत कुछ कह दिया है{ बधाई
    आशा

    जवाब देंहटाएं
  41. बहुत सुन्दर क्षणिकाएं बिलकुल गागर में सागर की तरह ! बधाई इतनी शानदार और जानदार अभिव्यक्ति के लिये !

    जवाब देंहटाएं
  42. हर नये दर्द के साथ
    बढ़ जाती है
    नयी रेखा हाथ में
    और लोग कहते हैं
    हाथ के रेखाओं में
    भविष्य छिपा है ...

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !वाह!

    जवाब देंहटाएं
  43. साँसों के साथ खींच कर
    दिल में रख लूँगा तुझे
    सुना है
    खून के कतरे
    फेफड़ों से हो कर
    दिल में जाते हैं ---------------------------
    दिगम्बर जी,
    क्षणिकायें तो तीनों ही बहुत जोरदार हैं लेकिन तीसरी क्षणिका तो कमाल की है। सुन्दर।

    जवाब देंहटाएं
  44. क्या क्षणिकाएँ हैं । आखरी वाली तो जबरदस्त ।

    जवाब देंहटाएं
  45. हर नये दर्द के साथ
    बढ़ जाती है
    नयी रेखा हाथ में
    और लोग कहते हैं
    हाथ के रेखाओं में
    भविष्य छिपा है .

    क्या सच्ची बात कही आपने नाशवा साहब !

    जवाब देंहटाएं
  46. चाँद

    आसमान में
    अटका
    तारों में
    भटका
    सूरज के आते ही
    खा गया
    झटका...

    ये तो थोड़े में ज्यादाकी बात, पंतिम पंक्तियाँ लाजवाब हैं....

    शुभकामनाएं...

    जवाब देंहटाएं
  47. हर नये दर्द के साथ
    बढ़ जाती है
    नयी रेखा हाथ में
    और लोग कहते हैं
    हाथ के रेखाओं में
    भविष्य छिपा है ...

    बेहतरीन क्षणिकाएँ

    जवाब देंहटाएं
  48. सुना है
    खून के कतरे
    फेफड़ों से हो कर
    दिल में जाते हैं !!!
    स्वप्न जब स्वप्न न रह कर धडकन बन जाते हैं !तब ऐसी कविताएँ जन्म लेती हैं ! पढने वाले आभार से भर जाते हैं ! बहुत बहुत धन्यवाद !

    जवाब देंहटाएं
  49. बहुत सुन्दर और लाजवाब क्षणिकाएं लिखा है आपने! बधाई!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं
  50. हैरान हूँ कैसे रह गयी आपकी ये पोस्ट्! हर नये दर्द के साथ
    बढ़ जाती है
    नयी रेखा हाथ में
    और लोग कहते हैं
    हाथ के रेखाओं में
    भविष्य छिपा है ...
    और आख्गिरी ़ाणिका भी दिल को छू गयी। बहुत बहुत बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  51. क्या बात है ..दिगंबर भैया ..एक से बढ़ कर एक भावपूर्ण क्षणिकाएँ....जादू है आपकी शब्दों में गागर में सागर वाली बात कहें तो कोई अतिशयोक्ति नही है..

    चाहे ग़ज़ल हो या छ्न्द मुक्त कविता या क्षणिकाएँ हर एपीसोड लाज़वाब होता है..शुभकामनाएँ...सुंदर रचना के लिए ढेरों बधाई....नमस्कार

    जवाब देंहटाएं
  52. भाई तारीफ को शब्द नहीं है मेरे पास।

    जवाब देंहटाएं
  53. देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर.बहुत खूब.

    जवाब देंहटाएं
  54. ek se bad kar ek sabhee dil jeetne walee kshnikae hai.......
    aabhar .

    जवाब देंहटाएं
  55. क्षणिकाएँ क्या है पूरी जिंदगी का सार है

    नि:शब्द

    जवाब देंहटाएं
  56. एक से बढ़ कर एक क्षणिका ..बहुत बहुत सुन्दर

    जवाब देंहटाएं
  57. २) चाँद

    आसमान में
    अटका
    तारों में
    भटका
    सूरज के आते ही
    खा गया
    झटका' ये चाँद है ही ऐसा तभी तो इसको 'इंदु' भी कहते हैं.हा हा हा पर.....कब तक रोक सका है सूरज इस चाँद को? चाँद भी झटके खा लेता है खुशी के साथ क्योंकि वो जानता है 'उसे' रौशनी तो इसी सूरज से मिलती है. हा हा हा तीसरी क्षणिका ...... बहुत प्यारी ! लिख चुकी हूँ इसके बारे में.मेरे प्रश्न का जवाब...अब तक नही मिला.

    जवाब देंहटाएं

आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है