बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

अच्छा ... आप भी न ...

अच्छा ... आप भी न ...
ऐसे हि बोलते हो ...
झाड़ पर चढ़ाते हो बस ...
कहीं इस उम्र में भी ...
मैं नही बस ...

और मैं देखता हूँ तुम्हें
अपने आप में सिमिटते
कभी पल्लू से खेलते
कभी होठ चबाते
कभी क्षितिज को निहारते ...

पता है उस वक़्त कितनी भोली लगती हो
तुम्हारे गुलाबी गाल
गुलाब से खिल जाते हैं
हंसते हुवे छोटी छोटी आँखें
बंद सी हो जाती हैं ...
गालों के डिंपल
उतने ही गहरे लगते हैं
जब पहली बार मिलीं थी
आस्था के विशाल प्रांगण में
गुलाबी साड़ी पहने
पलकें झुकाए
पूजा की थाली लिए

फिर तो दूसरी ... तीसरी ...
और न जाने कितनी मुलाक़ातें

सालों से चल रहा ये सिलसिला
आज भी ऐसे ही चल रहा है
जैसे पहली बार मिले हों ...
और हर बार ऐसा भी लगता है
जैसे जन्म- जन्मांतर से साथ हों ...
ये कैसी अनुभूति
कौन सा एहसास है
क्या ज़रूरी है इसको कोई नाम देना ...?
किसी बंधन में बाँधना ...?
या शब्दों के सिमित अर्थों में समेटना ...?

अरे सुनो ...
मुझे तो याद हि नही रहा
क्या तुम्हें याद है
पहली बार हम कब मिले ...?
क्या तारीख थी ...?
कौन सा दिन था ...?

वैसे ... क्या ज़रूरी है
किसी तारीख को याद रखना ...?
या ज़रूरी है
हर दिन को तारीख बनाना ...?

73 टिप्‍पणियां:

  1. ye huee naa koi baat ....pichalee rachana ne to hilaa hee diya tha....

    Kalpit ho to bhee aisee rachana peeda de jatee hai.....jis par ye beetatee hai vo to toot hee jata hoga......

    hamesha khush raho aur aisee hee pyaree rachanae likho.........
    bhoole se bhee aangan me kisee dukh kee parichaee bhee na pade isee duaa ke sath...

    जवाब देंहटाएं
  2. वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ...?

    bahut khub Digambar sir!!
    aise hi har din ko yaadgaar aap banao:)

    जवाब देंहटाएं
  3. गज़ब गज़ब गज़ब कर दिया…………बडी भीनी भीनी सी खुश्बू आ रही है………………रचना दिल मे उतर गयी। कुछ रिश्तों के नाम ना हों तभी अच्छा है कोई जरूरी नही कि किसी खास रिश्ते को कोई नाम देने की।

    जवाब देंहटाएं
  4. वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना
    बहुत मुश्किल है इस रचना मे प्रेम के उत्कर्ष को
    शब्दों के सिमित अर्थों में समेटना ...। आपकी हर रचना निशब्द कर देती है। बहुत बहुत शुभकामनायें।

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत खूबसूरत एहसास लिए हुए


    वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ...?

    कोई ज़रूरी नहीं ..और फिर ऐसे मौकों पर तारीख भी याद नहीं रहती ...

    जवाब देंहटाएं
  6. कमाल की रचना....कितनी भावनाएं समेट रखी हैं आपने इस कविता मे.....
    बहुत बहुत बहुत ही ख़ूबसूरत कविता....

    जवाब देंहटाएं
  7. है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ...? ....bahut sahi prashn.

    जवाब देंहटाएं
  8. aapki rachnaa mein badlate mausam kaa asar dikhaa ..halki si sard siharan jo romanchit kar deti hai

    जवाब देंहटाएं
  9. और हर बार ऐसा भी लगता है
    जैसे जन्म- जन्मांतर से साथ हों ...
    ये कैसी अनुभूति
    कौन सा एहसास है
    क्या ज़रूरी है इसको कोई नाम देना ...?
    किसी बंधन में बाँधना ...?
    या शब्दों के सिमित अर्थों में समेटना ...?
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ...?
    ......Gahri shabd abhivyanjana...
    samay ke saath-saath purani-nayee taarikhon ka badal jaana..sach mein man ko kitna kachota hai!
    Bahut prabhavpurn rachan...Aabhar

    जवाब देंहटाएं
  10. दिगम्‍बर जी ऐसी तारीखों को याद रखा भी नहीं जा सकता। क्‍योंकि उनके लिए अलग से एक कैलेंडर बनाना पड़ेगा। ऐसे पलों को हम दुनिया की बनाई इकाईयों से नहीं माप सकते । एक एक पल एक बरस के बराबर लगता है।
    सहजता से आप वह कह गए जो इस उम्र में हर कोई कहना चाहता है,मैं भी।

    जवाब देंहटाएं
  11. बहुतखूब बहुतखूब !

    हम ऐसे ही झाड़ पर नहीं चढ़ा रहे ।
    कविता वाकई खूबसूरत बन पड़ी है ।

    जवाब देंहटाएं
  12. क्या जरुरी है याद रखना तारीखें , समय ...
    उनसे मिलने से पहले का समय रहा ही कहाँ होगा ...!

    जवाब देंहटाएं
  13. वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना .

    बिलकुल भी नहीं ..बस एहसास जरुरी हैं और एहसासों का इज़हार जरुरी है :)
    बहुत प्यारी अभिव्यक्ति.

    जवाब देंहटाएं
  14. या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ..कमाल का लिखा है आपने बहुत बहुत सुन्दर ...दिल को छु गयी यह रचना शुक्रिया

    जवाब देंहटाएं
  15. ये कैसी अनुभूति
    कौन सा एहसास है
    क्या ज़रूरी है इसको कोई नाम देना ...?
    किसी बंधन में बाँधना ...?
    या शब्दों के सिमित अर्थों में समेटना ...?

    Kitni pyaree rachana hai!
    Gulzaar sahab kaa mashhoor geet yaad dila diya.." Hamne dekhi hai un aankhon kee mahakti khushboo, Haathse chhooke ise rishtonka ilzaam na do, Pyarko pyarhee rahne do koyi naam na do!"

    जवाब देंहटाएं
  16. अरे वाह दिगंबर भाई कमल कर दिया..
    बहुत ही खुबसूरत... जाने कितने भाव, कितनी कहानियाँ..सब कुछ..
    कहीं खो सा गया मैं....

    जवाब देंहटाएं
  17. भावुक कर देने वाली, खूबसूरत प्रस्तुति। !

    जवाब देंहटाएं
  18. प्यार तो गुज़रते समय के साथ और निखरता जाता है ...
    सही लिखा है..एक समय ऐसा आता है जब पहले कब मिले थे?याद नहीं रहता..
    बहुत ही खूबसूरती से आप भावनाओं को कविता बना कर प्रस्तुत किया है.

    जवाब देंहटाएं
  19. हाय!! क्या बात है..किसी की नजर न खा जाना महाराज!


    अच्छा ... आप भी न ...
    ऐसे हि बोलते हो ...
    झाड़ पर चढ़ाते हो बस ...

    -वैसे ये तो तुम शुरु से करते आये हो..सही डांटा उसने. :)

    -रचना बहुत सुन्दर पड़ी है.

    जवाब देंहटाएं
  20. अरे सुनो ...
    मुझे तो याद हि नही रहा
    क्या तुम्हें याद है
    पहली बार हम कब मिले ...?
    क्या तारीख थी ...?
    कौन सा दिन था ...?

    वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?

    नासवा साहब, आज लगता है कुछ ज्यादा ही रोमांटिक मूड में है ! बहुत खूब ! सुन्दर रचना !

    जवाब देंहटाएं
  21. ये कैसी अनुभूति
    कौन सा एहसास है
    क्या ज़रूरी है इसको कोई नाम देना ...? ....
    .
    क्या खुबसूरत प्रेम का कोमल अहसास है! बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...आभार...

    जवाब देंहटाएं
  22. कोमल भावनाओं को सहेजती सुकोमल कविता ...कविता के भाव और शिल्प दोनों में नयापन है।

    जवाब देंहटाएं
  23. सुरुआती हिस्सा में त अईसा बर्नन किए हैं आप कि मन अचानक पलट कर पीछे जाने लगता है अऊर सिरीमती जी कहीं मन का भाव पढ न लें सोचकर झिझक भी होने लगता है. अऊर अंतिम में त आप कमाल कर दिए हैं (ऊ तो हमेसा करते हैं आप).
    ई कलेंडर अईसा कलेंडर है जिसमें हर दिन बसंत है, अऊर बसंत का तारीख नहीं होता है... ई तो बस मौसम होता है, जा तन लागे सो तन जाने.

    जवाब देंहटाएं
  24. सचमुच बिल्कुल भी जरूरी नहीं है तारीखों को याद रखना...........
    बहुत ही सटीक प्रश्र........सुन्दर अहसास

    जवाब देंहटाएं
  25. बहुत मासूम सी प्रेम कविता है । इस अहसास को ज़िन्दा रखें ।

    जवाब देंहटाएं
  26. उम्र के एक पढाव पर आकर हम भी ऎसा सोचेन्गे . बहुत उमदा . एक बात आप सर्गई बूबका हो गये हो हर बार अपना रिकार्ड निखार लेते हो कविता का

    जवाब देंहटाएं
  27. वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ...

    बहुत ही खूबसूरत रचना और उस पर सुंदर-से भाव

    जवाब देंहटाएं
  28. हर दिन को तारीख बनाने का हुनर जिन्हे आता है वो हर दिल को गुलशन बना देते हैं।

    जवाब देंहटाएं
  29. खूबसूरत रचना, प्यार का एहसास लिये, धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  30. अपने मनो्भावो की बहुत सुन्दर प्रस्तुति। सुन्दर रचना है बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  31. वाह्! वाह्! वाह्!
    उत्तम...अतिउत्तम!

    जवाब देंहटाएं
  32. ये कैसी अनुभूति
    कौन सा एहसास है
    क्या ज़रूरी है इसको कोई नाम देना ...?
    किसी बंधन में बाँधना ...?
    या शब्दों के सिमित अर्थों में समेटना ...?

    अरे सुनो ...
    मुझे तो याद हि नही रहा
    क्या तुम्हें याद है
    पहली बार हम कब मिले ...?
    क्या तारीख थी ...?
    कौन सा दिन था ...?

    वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ...?
    bahut khoobsurat ,sach kaha har din kuchh khas ho yahi jaroori hai .

    जवाब देंहटाएं
  33. आप गजब लिखते हैं .खुशबुओं का . पूरा बाग़ ही .दिल में उतार देते हैं .. इतना रसा भरा होता है कि .. दुनिया के सारे रस और मीठास फीकी कर देते हैं .. अजब तरीका है आपका .. दिल से बधाई

    जवाब देंहटाएं
  34. जन्म जन्मांतर के साथ के साथ प्रेमानुभूतियों को दिन और तारीखों से टूट का अहसास होता होगा ?

    जवाब देंहटाएं
  35. अति उत्तम रचना!!! बहुत बहुत शुभकामनायें।

    जवाब देंहटाएं
  36. अति उत्तम रचना!!! बहुत बहुत शुभकामनायें।

    जवाब देंहटाएं
  37. कोमल भावनाओं का सुंदर अहसास। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    मध्यकालीन भारत-धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-२), राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

    जवाब देंहटाएं
  38. वाह वाह ..जब आप अपनी पूरी रवानी में होते हैं तो छटा ही अनुपम होती है ..बहुत ही कमाल की रचना नासवा जी

    जवाब देंहटाएं
  39. सचमुच बिल्कुल भी जरूरी नहीं है तारीखों को याद रखना...........
    बहुत ही सटीक प्रश्र........बहुत बहुत शुभकामनायें।

    जवाब देंहटाएं
  40. वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ...?

    बहुत ही सुन्‍दर पंक्तियां, भावमय प्रस्‍तुति ।

    जवाब देंहटाएं
  41. वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ...?

    खूबसूरत रचना

    आज और कल हर एक पल

    जवाब देंहटाएं
  42. ये कैसी अनुभूति
    कौन सा एहसास है
    क्या ज़रूरी है इसको कोई नाम देना ...?
    किसी बंधन में बाँधना ...?
    या शब्दों के सिमित अर्थों में समेटना ...

    bahut hi sundar........aapki bahumulya tippani ke liye dhanyawaad

    जवाब देंहटाएं
  43. वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    kuch to zaruri hai

    जवाब देंहटाएं
  44. मेरे ब्लॉग इस बार मेरी रचना ...
    स्त्री

    जवाब देंहटाएं
  45. दिगम्बर जी मुझे समझ आ गया आज ही का दिन होगा न.............. यादों को काव्य में अच्छा प्रस्तुत किया है।

    जवाब देंहटाएं
  46. क्या ज़रूरी है इसको कोई नाम देना ...?
    किसी बंधन में बाँधना ...?
    या शब्दों के सिमित अर्थों में समेटना ...?
    बिल्कुल जरूरी नही । प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो । सुंदर रचना दिल को गुदगुदा गई ।

    जवाब देंहटाएं
  47. बहुत ही प्यारी सी कविता ,सच है प्यार को बांधा नहीं जा सकता ।

    जवाब देंहटाएं
  48. वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ..

    वाह...वाह...वाह...अद्भुत रचना है दिगंबर जी सच में...प्रेम रस में डूबी इस रचना को पढ़ कर दिल प्रसन्न हो गया...गज़ब लिखा है आपने...प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो...

    नीरज

    जवाब देंहटाएं
  49. नवरात्रा स्थापना के अवसर पर हार्दिक बधाई एवं ढेर सारी शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं
  50. अभी तक जितनी भी रचनाएं पढी हैं
    उनसे यही लगा की आपकी रचनाएं सच में
    सीधे ह्रदय तक जाती हैं
    यह भी बेहद कोमल ढंग से एहसासों के साथ बुनी हुई रचना है

    कमाल है ...... बेहतरीन

    वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?

    ना जी ना .... एहसास याद रहे...काफी है क्योंकि एहसास पुरानी से पुरानी यादों को एक दम तरोताजा फूलों सा बना देते हैं ... जैसे आज ही की बात हो

    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ...?

    अजी जिंदगी है केलेंडर थोड़ी है

    जवाब देंहटाएं
  51. ये कैसी अनुभूति
    कौन सा एहसास है
    क्या ज़रूरी है इसको कोई नाम देना ...?
    किसी बंधन में बाँधना ...?
    या शब्दों के सिमित अर्थों में समेटना ...

    _bahut kavita hai
    in panktiyon me

    जवाब देंहटाएं
  52. नासवा साहब
    मासूम ख्यालों को समेटे एक अच्छी कविता......हिंदी कविता का सौन्दर्य निहार रहा हूँ..... (@ बुरा न मने तो कह दूं....गालों के "डिम्पल" में डिम्पल की जगह हिंदी का कोई और खूबसूरत शब्द पिरो दें.....!)

    जवाब देंहटाएं
  53. उफ़ तुम भी न और अच्छा आप भी न ... दोनों पहलु देख लिए ...
    बढ़िया सिलसिला है ...

    जवाब देंहटाएं
  54. वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ...?
    एहसास का पूरा समन्दर ही परोस दिया ...
    तारीख याद रहे न रहे पर तारीख बन ही जाना चाहिये.

    जवाब देंहटाएं
  55. वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ...?
    सच, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो

    जवाब देंहटाएं
  56. वैसे ... क्या ज़रूरी है
    किसी तारीख को याद रखना ...?
    या ज़रूरी है
    हर दिन को तारीख बनाना ...

    बेहतरीन!

    जवाब देंहटाएं
  57. क्या तुम्हें याद है
    पहली बार हम कब मिले ...?

    -शायद जन्म-जन्मान्तर से |

    जवाब देंहटाएं
  58. is sawaal ka jawab dhoodhne mein hi ek umra nikal jati hai :)..beautiful!

    जवाब देंहटाएं
  59. देश काल और परिस्थिति से घटना को अलग करने की एक चेष्टा सी ! संज्ञा ( व्यक्ति का नाम या रिश्तों का नाम ) के विरुद्ध सत्व सा कुछ खोजने का भाव ! मार्मिकता में विचार का रचाव ! सुन्दर !

    जवाब देंहटाएं
  60. अपकी यह पोस्ट अच्छी लगी।
    तीन गो बुरबक! (थ्री इडियट्स!)-2 पर टिप्पणी के लिए आभार!

    जवाब देंहटाएं
  61. पोस्ट करने से पहले एडिट क्यों नही करते? मात्राओं की कितनी गलतियाँ कर रखी है,मालूम?
    'आप' और 'तुम' दोनों को साथ काम लेना शिल्प दोष माना जाता है मेरे भाई.
    'सालों से चल रहा ये सिलसिला
    आज भी ऐसे ही चल रहा है
    जैसे पहली बार मिले हों ...
    और हर बार ऐसा भी लगता है
    जैसे जन्म- जन्मांतर से साथ हों ...
    ये कैसी अनुभूति
    कौन सा एहसास है
    क्या ज़रूरी है इसको कोई नाम देना ...?
    किसी बंधन में बाँधना ...?
    या शब्दों के सिमित अर्थों में समेटना ...?'
    प्रेम के खूबसूरत रंग से रची रचना की तरह है ये पंक्तियाँ. प्रेम ईश्वर है.जो भाव इश्वर के लिए हम रखते हैं यदि वो प्रेम के लिए है तो वो कत्तई गलत हो ही नही सकता.कोई नाम कोई रिश्ता....कहीं जरूरी नही.आपकी दुनिया स्वीकार नही करेगी किन्तु आपकी अंतरात्मा जानती है कि आपका ईश्वर (प्रेम,प्रेयसी,ये सम्बन्ध ) गलत नही.

    जवाब देंहटाएं

आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है