शनिवार, 20 नवंबर 2010

वो दराजों में पड़ी कुछ पर्चियाँ

मुफलिसों के दर्द आंसू सिसकियाँ
बन सकी हैं क्या कभी ये सुर्खियाँ

आम जन तो हैं सदा पिसते रहे
सर्द मौसम हो य चाहे गर्मियाँ

खून कर के वो बरी हो जाएगा
जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ

चोर है इन्सां तभी तो ले गयीं
रंग फूलों का उड़ा कर तितलियाँ

आदमी का रंग ऐसा देख कर
पी गयीं तालाब सारी मछलियाँ

तुम अंधेरों से न डर जाओ कहीं
जेब में रख ली हैं मैंने बिजलियाँ

थाल पूजा का लिए जब आयगी
चाँद को आने न देंगी बदलियाँ

कह रही हैं हाले दिल अपना सनम
वो दराजों में पड़ी कुछ पर्चियाँ

72 टिप्‍पणियां:

  1. आदमी का रंग ऐसा देख कर
    पी गयीं तालाब सारी मछलियाँ
    bahut hi badhiyaa

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  2. रबड़ी, कुत्ता, आदमी, देश
    सब में गहरा सम्बन्ध है जो आपने बड़ी खूबसूरती से बयां किया है...
    एक कहानी है कुत्ते और रबड़ी की जो कभी बाद में सुनाऊंगा..

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  3. बढ़िया खिचाई है जी , अच्छी लगी व्यंगात्मक अभिव्यक्ति . आभार .

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  4. मुफलिसों के दर्द आंसू सिसकियाँ
    बन सकी हैं क्या कभी ये सुर्खियाँ

    आम जन तो हैं सदा पिसते रहे
    सर्द मौसम हो य चाहे गर्मियाँ

    खून कर के वो बरी हो जाएगा
    जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ

    आम इंसान के दर्द और सत्ता की बेरहमी का मार्मिक चित्रण ……………हर शेर अपने आप अपनी दास्ताँ कह रहा है।

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  5. ग़ज़ल में बखूबी सजाई आपने,
    ढेर सारे भावों की है झलकियाँ,
    हमारी शिकायत फिर भी कायम वहीँ,
    सोच में थोड़ी करे तब्दीलियाँ ...

    बाकी सब तो हमेशा सा है गज़ब,
    उसके लिए आपको ढेरो बधाईयाँ ...

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  6. मुफलिसों के दर्द आंसू सिसकियाँ
    बन सकी हैं क्या कभी ये सुर्खियाँ

    बहुत ख़ूब !सच को बयान करती हुई पंक्तियां

    खून कर के वो बरी हो जाएगा
    जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ
    आज ये मंज़र हर ओर दिखाई दे रहा है,बहुत उम्दा!

    कह रही हैं हाले दिल अपना सनम
    वो दराजों में पड़ी कुछ पर्चियाँ

    ख़ूबसूरत शेर!

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  7. खून कर के वो बरी हो जाएगा.
    जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ

    ---

    bhrasht vyavasthaa par badhiya vyang

    .

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  8. हर एक शेर की अपनी ही दास्तान है, कहीं व्यंग है, कहीं बेबसी, कहीं लाचारी और दर्द ......जिन्दगी कुछ इन्ही टुकडो से बनी है शायद....
    regards

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  9. हर एक शेर की अपनी ही दास्तान है, कहीं व्यंग है, कहीं बेबसी, कहीं लाचारी और दर्द ......जिन्दगी कुछ इन्ही टुकडो से बनी है शायद....
    regards

    जवाब देंहटाएं
  10. खून कर के वो बरी हो जाएगा
    जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ

    नासवा जी आज बहुत दिन बाद आपका ब्लॉग देखा.गज़ल सीधी दिल में उतर गई.बधाइयाँ .

    जवाब देंहटाएं
  11. खून कर के वो बरी हो जाएगा
    जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ

    नासवा जी आज बहुत दिन बाद आपका ब्लॉग देखा.गज़ल सीधी दिल में उतर गई.बधाइयाँ .

    जवाब देंहटाएं
  12. तुम अंधेरों से न डर जाओ कहीं
    जेब में रख ली हैं मैंने बिजलियाँ

    थाल पूजा का लिए जब आयगी
    चाँद को आने न देंगी बदलियाँ

    बहुत ही सुन्‍दर पंक्तियों के साथ बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  13. खून कर के वो बरी हो जाएगा.
    जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ

    बेहतरीन शेर ! पूरी ग़ज़ल लाजवाब है !

    जवाब देंहटाएं
  14. खून कर के वो बरी हो जाएगा
    जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ
    वाह वाह,शेर में व्यंग अच्छा और पूरी ग़ज़ल बेहतरीन

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  15. आदरणीय नासवा जी
    नमस्कार !
    मुफलिसों के दर्द आंसू सिसकियाँ
    बन सकी हैं क्या कभी ये सुर्खियाँ
    ........सच को बयान करती हुई पंक्तियां
    लाजवाब.........प्रशंशा के लिए उपयुक्त कद्दावर शब्द कहीं से मिल गए तो दुबारा आता हूँ
    ......हमेशा की तरह ये पोस्ट भी बेह्तरीन है

    संजय भास्कर

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  16. खून कर के वो बरी हो जाएगा
    जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ

    तभी तो इन्साफ नहीं हो पाता ..

    आदमी का रंग ऐसा देख कर
    पी गयीं तालाब सारी मछलियाँ..

    गज़ब ..बात कही है ...बढ़िया व्यंग

    बहुत अच्छी प्रस्तुति .

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  17. दिगम्‍बर भाई, बहुत ही शानदार रचना है। हार्दिक बधाई।

    ---------
    मैं अभी तक तो स्‍वयं को शाकाहारी मानता रहा था, पर इस लेख को पढ़कर मेरी चूलें हिल गयी हैं।

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  18. आम जन तो हैं सदा पिसते रहे
    सर्द मौसम हो य चाहे गर्मियाँ

    खून कर के वो बरी हो जाएगा
    जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ
    ....vyang ke andaaj mein aam jan ke dukh-dard ke kareeb kee sachhayee bhari panktiyan...aabhar

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  19. आपकी पूरी गज़ल दिल में चुभी
    शेर हैं, या हैं नुकीली बर्छियाँ.

    दिगम्बर जी! दिल को छू गए एक एक शेर!

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  20. थाल पूजा का लिए जब आयगी
    चाँद को आने न देंगी बदलियाँ

    कह रही हैं हाले दिल अपना सनम
    वो दराजों में पड़ी कुछ पर्चियाँ
    Kya baat hai!Waise to harek pankti nihayat sundar hai!

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  21. दिगंबर जी हर शेर अपने आप में एक परिदृश्य बना रही है.. बहुत सुन्दर.. खास तौर पर
    "आम जन तो हैं सदा पिसते रहे
    सर्द मौसम हो य चाहे गर्मियाँ ".. इस शेर में खुद को पाता हूँ...

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  22. खून कर के वो बरी हो जाएगा
    जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ

    चोर है इन्सां तभी तो ले गयीं
    रंग फूलों का उड़ा कर तितलियाँ

    आदमी का रंग ऐसा देख कर
    पी गयीं तालाब सारी मछलियाँ

    तुम अंधेरों से न डर जाओ कहीं
    जेब में रख ली हैं मैंने बिजलियाँ


    क्या बात कही नासवा सहाब, बहुत सुन्दर, हालात पर कटाक्ष करती!

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  23. बहुत उम्दा .........आप की धार ऎसी ही तेज़ होती रहे .

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  24. मुफलिसों के दर्द आंसू सिसकियाँ
    बन सकी हैं क्या कभी ये सुर्खियाँ
    --
    बहुत सुन्दर गजल है!
    इसकी पहली दो लाइनों अर्थात
    मतले ने ही मन मोह लिया है!

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  25. आदमी का रंग ऐसा देख कर
    पी गयीं तालाब सारी मछलियाँ
    bahut khoob!

    जवाब देंहटाएं
  26. दिगंबर नासवा जी ,

    मुफलिसी बिन सुर्खियाँ ! क़ातिल पे ओहदेदारियाँ ! आदम से भागी तितलियाँ - कुछ मछलियां ! उनकी राहें रौशनी से पुर रहे , फिर मैं सहेजूँ बिजलियाँ -कुछ बदलियां ! हाल अपना जानती हैं इन दराजों में अटी सी पर्चियां !


    [ क्या खूब लिखा आपने हमारी टिप्पणी भी बहक गयी है ]

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  27. बहुत सुंदर असरदार और नए प्रयोग किये हैं शब्दों के. गज़ल बहुत उम्दा बन गयी है. अच्छे कटाक्ष किये हैं.

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  28. मुफलिसों के दर्द आंसू सिसकियाँ
    बन सकी हैं क्या कभी ये सुर्खियाँ
    वाह नासवा जी...
    बहुत अच्छा मतला है

    थाल पूजा का लिए जब आयगी
    चाँद को आने न देंगी बदलियाँ
    बहुत अच्छा शेर है, मुबारकबाद.

    जवाब देंहटाएं
  29. इसे क्या कहें? गज़ब। बहुत खूब लिख गये दिगंबरजी आप। एक एक शब्द मानों सीधे अपने लक्ष्य पर चोट करता है। गरीब सुर्खियां बने तो सिर्फ बाज़ार के लिये, जिन्हें सिर्फ बेचा गया, बेचा जा रहा है। चाहे नेता हों या व्यापारी या फिर कुछ अतिबुद्धिजीवी लेखक-निर्देशक ऐसों ने गरीबों के फटे चिथडों को लिख-दिखा कर खूब कमाई की है। आपकी ये पंक्तियां कि मुफलिसों के आंसू......." मरहम है मुझ जैसों के लिये जो बिकते हुए गरीब और उनकी गरीबी पर चिंतनशील रहता है। क्योंकि आम हूं। जिसे मौसमों का भय नहीं सिर्फ पिसना है बस्स। हर शे'र..खूब लिखा है आपने जो यथार्थ है और गहरा संकेत देता

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  30. तुम अंधेरों से न डर जाओ कहीं
    जेब में रख ली हैं मैंने बिजलियाँ
    क्या बात है दिगम्बर जी. बहुत सुन्दर.सभी शेर बहुत सुन्दर हैं.

    जवाब देंहटाएं
  31. ग़ज़ल के एक एक शे’र दिल में बस गए।

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  32. कार्तिक पूर्णिमा एवं प्रकाश उत्सव की आपको बहुत बहुत बधाई

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  33. सभी शेर गजब के निकाले हैं महाराज, वाह!!


    थाल पूजा का लिए जब आयगी
    चाँद को आने न देंगी बदलियाँ


    आनन्द आ गया...

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  34. वो दराज़ों में पड़ी कुछ चिठ्ठियां।
    ख़ूबसूरत मुकम्मल ग़ज़ल्।

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  35. बहुत सार्थक रचना, मछ्लियाँ तालाब पी रही हैं और बाड घास खा रही है।

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  36. बहुत सुंदर, सारे शेर बहुत शानदार

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  37. "आदमी का रंग ऐसा देख कर
    पी गयीं तालाब सारी मछलियाँ "

    वाह! दिगम्बर जी, कितना सच कहा आपने...सार्थक रचना.

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  38. बहुत खूब लिखा है |
    इतने सारे भाव आते कहाँ से हें |
    बधाई इस गजल के लिए |
    आशा

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  39. अति सुन्दर
    सारे शेर बहुत शानदार हें

    "आदमी का रंग ऐसा देख कर
    पी गयीं तालाब सारी मछलियाँ "

    बहुत अच्छा शेर है

    जवाब देंहटाएं
  40. Poori nazm hi shandaar h..
    चोर है इन्सां तभी तो ले गयीं
    रंग फूलों का उड़ा कर तितलियाँ ye lines behad pasand aayi :)

    जवाब देंहटाएं
  41. तुम अंधेरों से न डर जाओ कहीं
    जेब में रख ली हैं मैंने बिजलियाँ
    अद्भुत.

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  42. आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ........

    जवाब देंहटाएं
  43. wah kya baat hai.....
    bahut badiya vyngatmak abhivykti........
    Tareefekabil...........
    shukriya.

    जवाब देंहटाएं
  44. 7.5/10

    बेहतरीन ग़ज़ल
    आपकी शायरी में वो तमाम खूबियाँ दिखती हैं जो किसी शायर को ख़ास बनाती हैं. कई शेर की दूसरी पंक्ति जादू सा असर छोडती है :
    "जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ"
    "रंग फूलों का उड़ा कर तितलियाँ"
    "पी गयीं तालाब सारी मछलियाँ"
    "जेब में रख ली हैं मैंने बिजलियाँ"

    जिंदाबाद

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  45. मुफलिसों के दर्द आंसू सिसकियाँ
    बन सकी हैं क्या कभी ये सुर्खियाँ

    अपने समय के सत्य को बेहद खूबसूरती से उकेरती सारगर्भित अभिव्यक्ति.आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    जवाब देंहटाएं
  46. क्या कहूँ कुछ कहने लायक ही नहीं छोड़ा आपने. बस लाजवाब ...... पर दराज में पड़ी पर्चियों का राज तो कुछ अलग ही जान पड़ता है........

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  47. बहुत अच्छी रचना है आपकी

    कभी यहाँ भी आइये
    www.deepti09sharma.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  48. दिगम्‍बर भाई, अभी दुबारा पढी गजल, तो ये और अच्‍छी लगी। एक बार फिर से बधाई तो चलेंगा न।

    ---------
    ग्राम, पौंड, औंस का झमेला। <
    विश्‍व की दो तिहाई जनता मांसाहार को अभिशप्‍त है।

    जवाब देंहटाएं
  49. आपकी कृतियाँ ऐसे मुग्ध कर दिया करती हैं कि वाह वाह वाह के सिवाय और क्या कहा जाय सूझता ही नहीं...

    सदैव की भांति,अतिसुन्दर रचना...

    आनंद आ गया पढ़कर...

    बहुत बहुत आभार !!!

    जवाब देंहटाएं
  50. आम जन तो हैं सदा पिसते रहे
    सर्द मौसम हो य चाहे गर्मियाँ

    खून कर के वो बरी हो जाएगा
    जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ


    Bahut khoob likha hai sir .....
    AAbhar.

    जवाब देंहटाएं
  51. नए तेवर में लिखा गया बेहतरीन शेर...

    थाल पूजा का लिए जब आयगी
    चाँद को आने न देंगी बदलियाँ
    ..वाह!

    जवाब देंहटाएं
  52. कह रही हैं हाले दिल अपना सनम
    वो दराजों में पड़ी कुछ पर्चियाँ...waah

    bahut khubsurat hai sir.apke sapne bhi..parchiyaan bhi.....!!!

    आदमी का रंग ऐसा देख कर
    पी गयीं तालाब सारी मछलियाँ
    .gar machhliya taalab peene lage to fir insaan ka rang kya dekhna!!!

    bahut khoob!!!

    जवाब देंहटाएं
  53. बेहतरीन...... हर शेर एक अलग भाव को समेटे है..... बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं
  54. खून कर के वो बरी हो जाएगा
    जेब में रख ली हैं उसने कुर्सियाँ

    चोर है इन्सां तभी तो ले गयीं
    रंग फूलों का उड़ा कर तितलियाँ
    नास्वा जी क्या कहूँ आप हर बार ही कमाल की गज़ल लिखते है। बहुत अच्छी लगी गज़ल। बधाई।

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  55. वो दराजों में पड़ी कुछ पर्चियाँ !!
    हाले दिल तो यही बतायेंगी न ,मार्मिक रचना के लिए बधाई !

    जवाब देंहटाएं
  56. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार रचना लिखा है आपने! बधाई!

    जवाब देंहटाएं
  57. चोर है इन्सां तभी तो ले गयीं
    रंग फूलों का उड़ा कर तितलियाँ

    Bahut Khoob Likha hai aapne

    जवाब देंहटाएं
  58. वाह! बहुत खूब ग़ज़ल कही है .

    खास कर यह शेर बेहद खास लगा..
    'आदमी का रंग ऐसा देख कर
    पी गयीं तालाब सारी मछलियाँ '

    क्या बात है!!!!!

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  59. बेहतरीन .......
    यहाँ आकर एहसास होने लगता है की शब्दों में कितनी ताकत हो सकती है .. सारा दर्द बयान कर दिया

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  60. hamesha ki tarah deri se aane ke liye maafi chahunga ...

    aap ke paas shabdo ka wo khazana hai ki main kuch nahi kah paata hoon appki rachnao ke liye ...

    bas padhta hoon aur man me samet kar rakh leta hoon ...

    bahut sundar rachna

    badhayi

    vijay
    kavitao ke man se ...
    pls visit my blog - poemsofvijay.blogspot.com

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  61. आपकी रचनाएं बहुत शानदार और हृदयग्राही होती हैं ! कई बार कोशिश कर चुकी हूँ मगर मेरी टिप्पणी प्रकाशित नहीं होती ! आज भी यह गज़ल इतनी अच्छी लगी कि एक बार फिर कोशिश में जुट गयी हूँ ! शायद आज नेट मेहरबान हो जाए ! बेहतरीन गज़ल और हर शेर अद्भुत एवं अनमोल ! बहुत बहुत बधाई आपको !

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  62. गज़ल ....मुफलिसों के दर्द आंसू सिसकियाँ से शुरू हुई.लगा...फिर रो दिए तुम पर...जब लिखते हो
    'तुम अंधेरों से न डर जाओ कहीं
    जेब में रख ली हैं मैंने बिजलियाँ' एक सुकून मिलता है,जिसे प्यार करते हो,जो तुम्हारे करीब है उसे किसी बिजली से डरने की कोई जरूरत नही. कभी उसकी कौंध से डरने भी ना दोगे उन्हें. आशावाद झलक रहा है.जियो और इन शब्दों को जी जाओ. बहुत सुन्दर गज़ल है.

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है