मंगलवार, 31 मई 2011

बड़ी शिद्दत से अम्मा फिर तुम्हारी याद आती है

गुरुदेव पंकज जी के आशीर्वाद से संवरा गीत ....

पुराने गीत बेटी जब कभी भी गुनगुनाती है
बड़ी शिद्दत से अम्मा फिर तुम्हारी याद आती है

दबा कर होठ वो दाँतों तले जब बात करती है
तेरी आँखें तेरा ही रूप तेरी छाँव लगती है
मैं तुझसे क्या कहूँ होता है मेरे साथ ये अक्सर
बड़ी बेटी किसी भी बात पर जब डाँट जाती है
बड़ी शिद्दत से अम्मा.....

कभी जब भूल से पत्नी मेरी चूल्हा जला ले तो
दही मक्खन पराठा जब कभी तुझसा बना ले तो
कभी घर से अचानक हींग की खुश्‍बू के आते ही
तेरे हाथों की वो खुश्‍बू मेरे दिल को सताती है
बड़ी शिद्दत से अम्मा.....

वो छुटके को हुई थी रात में उल्टी अचानक ही
लगी थी खेलते में गैन्द फिर उस शाम किरकेट की
हरी मिर्ची नमक नींबू कभी घर के मसालों से
दवा देसी बगल वाली पड़ोसन जब बनाती है
बड़ी शिद्दत से अम्मा....

निकलती है कभी बिस्तर से जब फ़र्नैल की गोली
नज़र आती है आँगन में कभी जब दीप रंगोली
पुरानी कतरनें अख़बार के पन्नों को छूते ही
तू शब्दों से निकल कर सामने जब मुस्कुराती है
बड़ी शिद्दत से अम्मा....

मैं छोटा था मुझे चोरी से तू कुछ कुछ खिलाती थी
मुझे है याद सीने से लगा के तू सुलाती थी
किसी रोते हुवे बच्चे को बहलाते में जब अक्सर
नये अंदाज़ से जब माँ कोई करतब दिखाती है
बड़ी शिद्दत से अम्मा....

79 टिप्‍पणियां:

  1. अम्‍मां और अम्‍मां की याद दोनों ही अनमोल हैं।

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  2. ये कहूँ कि सचमुच बहुत प्यारी कविता है तो........आम कमेंट्स की तरह इसे हल्का फुल्का मत लेना.
    मैं भी कांच में देखती हूँ खुद का चेहरा,
    कभी गालों के गड्ढे में,कभी चौड़े माथे में
    देखती उसको, उसकी झलक मिल जाती है
    उतरती हूँ जब ऊंची ऊंची सीढ़ियों को मैं
    खुद अपनी चाल में मुझको अम्मा याद आती है.
    जानती हूँ अक्सर याद करते हो,
    बेटी में भी उसके अक्स को देखा करते हो
    वो भूलने वाली शख्सियत ही नही होती
    बहुत चाहा कि भूल जाए पर....बड़ी शिद्दत से....
    बहुत भावुक हो बाबु! देखो न इस कविता को .

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  3. बेटी में माँ की परछाई नजर आती ही है.
    बहुत ही भाव भीनी कविता दिल से निकल कर दिल में प्रवेश करती हुई..

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  4. एक - एक शब्द ने अम्मा को सुन्दरता से अभिव्यक्त है ....!

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  5. जिस बेटे ने माँ को शिद्दत से देखा हो यह कविता पढ़ कर उसकी आँखों से आँसू निकल आएँगें. माँ पर लिखी उम्दा कविताओं में से एक.

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  6. bhaavuk kar diya aapki is kavita ne.umda rachna.bahut badhiya.

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  7. माँ पर लिखी हर रचना ... दिल से लिखी जाती है और दिल में ही सीधे उतर जाती है...भावभीनी रचना

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  8. आह! अम्मा की यादों को उतनी ही शिद्दत से संजोया है जितनी शिद्दत से वो याद आती है………बेहतरीन अभिव्यक्ति।

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  9. मां की याद में भीगा हर शब्‍द हर भाव गहरे तक उतरता हुआ .... लाजवाब ।

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  10. बेटी में माँ कि छवि दिखना ..और ऐसी लितानी ही बातें आपने लिख दिन जिससे माँ कि याद शिद्दत से आती है ... आपके भावों को पढ़ मन भावुक हो गया ..

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  11. माँ से जुड़ी हर बात कितना कसक दे जाती है...
    हर जर्रे में ही उसकी याद समाई होती है.

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  12. बेहतरीन भावात्‍मक रचना। इसे पढ़कर मुनव्‍वर राना जी का शेर याद आ रहा है, 'जब भी कश्‍ती मेरी सैलाब में आ जाती है। मॉ दुआ करती हुई ख्‍वाब में आ जाती है।'

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  13. कई बार किसी रचना पर कोई कमेन्ट करते नहीं बनता... लगता है मेरे शब्द पूरी तरह से रचना की विशालता को अभिव्यक्त नहीं कर सकेंगे...

    गूंगे का गुड़ मानते हुए मेरा प्रणाम स्वीकारें

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  14. दिगंबर भाई क्षमा करें डबडबाई आँखों से कमेन्ट नहीं लिखा जा रहा...सच कहूँ ऐसी रचनाएँ बिना माँ के आशीर्वाद के कागज़ पर नहीं उतरतीं...

    नीरज

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  15. बहुत मार्मिक कविता है। मांओं से ही हमारा अस्तित्व है। उनका स्मरण स्व की ही तलाश है।

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  16. दबा कर होठ वो दाँतों तले जब बात करती है
    तेरी आँखें तेरा ही रूप तेरी छाँव लगती है
    मैं तुझसे क्या कहूँ होता है मेरे साथ ये अक्सर
    बड़ी बेटी किसी भी बात पर जब डाँट जाती है
    बड़ी शिद्दत से अम्मा.....
    yun amma saath hoti hai , daantker wah din yaad dilati hai

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  17. किस-किस पंक्ति को चिन्हांकित करूँ ?
    पूरा गीत ही ह्रदय से निकला है .....अंतस तक पहुँचता है ..
    अम्मा और उनकी याद का गीत ....बरबस ही आँखें भर आयीं ..

    बधाई हो बन्धु......लेखनी यहीं धन्य होती है |

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  18. पुरानी कतरनें अख़बार के पन्नों को छूते ही
    तू शब्दों से निकल कर सामने जब मुस्कुराती है
    वाह,दिगंबर जी,अदभुत शब्द संयोजन है !
    माँ की यादों को नमन !
    आभार !

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  19. भावुक कर गई....अद्भुत रचना....

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  20. दिल निकालकर रख दिया है। बहुत ही श्रेष्‍ठ और कालजयी रचना।

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  21. हर अक्षर में माँ जैसे झांकती नज़र आ रहीं हैं ..... आभार !

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  22. वन्दनीय है,पूजनीय है, अतुलनीय है मां..

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  23. मैं छोटा था मुझे चोरी से तू कुछ कुछ खिलाती थी
    मुझे है याद सीने से लगा के तू सुलाती थी
    किसी रोते हुवे बच्चे को बहलाते में जब अक्सर
    नये अंदाज़ से जब माँ कोई करतब दिखाती है
    बड़ी शिद्दत से अम्मा....

    माँ से जुड़ी आपकी हर रचना मन को छूने वाली ही होती है ....यह भी बेहतरीन कविता है.....

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  24. बहुत भावुक और निशब्द कर दिया आपकी रचना ने...अद्भुत प्रस्तुति..आभार

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  25. माँ को याद करने के कारण बहुत अच्छे लगे आगे कुछ कहते नहीं बनता ..

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  26. माँ की हर बात निराली होती है, सही में अक्सर कई जगह हमें हमारी माँ दिख जाती है , कई रूपों में वो अपनी उपस्थिति हमारे दिल में दर्शाती है |
    बहुत ही सुन्दर रचना ...!!

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  27. बहुत सुन्दर। कुछ नही कहना है। बस इसे दिल से महसुस करने की जरूरत है।

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  28. बड़ी शिद्दत से अम्मा फिर तुम्हारी याद आती है .....

    माँ पर लिखी हर रचना निराली होती है... एक शब्द में माँ नज़र आती है...
    लाजवाब रचना..........

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  29. बहुत बहुत सुन्दर रचना...

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  30. पुराने गीत बेटी जब कभी भी गुनगुनाती है
    बड़ी शिद्दत से अम्मा फिर तुम्हारी याद आती है
    और आखिरी पंक्ति तक...बस बार पढ़ने को मन होता है, ये रचना गर किसी के दिल के क़रीब जो है...बधाई नासवा जी.

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  31. कविता ने बहुत भावुक कर दिया, धन्यवाद

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  32. भाई दिगंबर नासवां जी! यह गीत तो भावनाओं में बहा दे रहा है. इसे पढने के बाद सामान्य रह पाना मुश्किल है.बहुत देर तक आंखें बंद किये चुपचाप पड़े रहने की इच्छा हो रही है.
    ---देवेंद्र गौतम

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  33. अम्मा की यादें हमें बड़ा होने ही नहीं देती.. कविता पढते हुए बचपन की एक प्रार्थना याद हो आई:
    जब बहुत सुबह चिड़िया उठकर
    कुछ गीत खुशी के गाती है,
    कलियाँ दरवाज़े खोल खोल
    जब वसुधा पर मुस्काती है.
    है जग के पालनहार प्रभु
    तब याद तुम्हारी आती है!!

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  34. सुन्दर भावाभिव्यक्ति! टीस है पर मधुर है।

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  35. बहुत ही खूबसूरत रचना... दिल को छू गयी, भावुक कर गयी है....

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  36. सच में,बड़ी शिद्दत के साथ पेश किया है आपने अपनी भावनाओं को!माँ से जुडी हर बात सम्मानीय होती है और याद तो बस.....



    कुँवर जी,

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  37. बहुत ही भावुक प्रस्तुति... सुन्दर रचना

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  38. BHAV VIBHOR KAR GAYEE AAPKEE YE RACHANA.
    AMMA AISEE HEE HOTEE HAI.AB ITNEE SHIDDAT SE YADE SAMBHAL KAR rakhne walee koum ka akal hee padne wala hai zamana badal raha hai aur sath hee maanytae bhee ..........
    aapko padna ek sukhad anubhav hai .
    Aabhar

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  39. beautiful is the only word which can be said after reading this !!!

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  40. नासवा जी
    कभी जब भूल से पत्नी मेरी चूल्हा जला ले तो
    दही मक्खन पराठा जब कभी तुझसा बना ले तो
    कभी घर से अचानक हींग की खुश्‍बू के आते ही
    तेरे हाथों की वो खुश्‍बू मेरे दिल को सताती है
    बड़ी शिद्दत से अम्मा.....
    कलेजा निकल कर रख दिया मित्र.... शानदार रचना. जितनी बार पढो उतनी बार नयी और दिलकश लगे.

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  41. आपके ब्लॉग पर आने पर अम्मा मिलीं . बहुत प्यारी रचना है . बहुत दिनों बाद एक प्यारे ब्लॉग से परिचय हुआ . आना फिर पड़ेगा , कुछ बात है . पर हर बार कमेंट्स ना भीं हों तो मुआफी चाहूँगा , पाठक हूँ , वैसे भी संपादक के नाम पत्र कभी नहीं लिखा .

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  42. माँ के बारे में कुछ कहने की शक्ति मुझमे नहीं !maa is great.

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  43. मां के प्रति ऐसी श्रद्धा भावना से प्रेरित रचना --नासवा जी की छाप साफ़ नज़र आती है । बेहद खूबसूरत , संवेदनाओं से परिपूर्ण रचना ।

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  44. भावुक कर दिया आपने....

    कंठ में गोला सा आकर अटक गया है....

    क्या कहूँ...बस

    लाजवाब लाजवाब लाजवाब.....

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  45. मैं छोटा था मुझे चोरी से तू कुछ कुछ खिलाती थी
    मुझे है याद सीने से लगा के तू सुलाती थी
    किसी रोते हुवे बच्चे को बहलाते में जब अक्सर
    नये अंदाज़ से जब माँ कोई करतब दिखाती है
    बड़ी शिद्दत से अम्मा....
    bahut dunder ma to hai ma..........
    saader
    rachana

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  46. बहुत मार्मिक कविता है। बेहद खूबसूरत

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  47. अम्मा के आगे तो सब बच्चे हो जाते हैं...उम्दा रचना...

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  48. Badi shiddat se amman kee yad dila gaee aapki ye pyari pyari kawita.

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  49. माँ होती ही ऐसी अनमोल है उसकी हर बात मन को सुकून से भर जाती है, बहुत सुंदर भावों को जगाती कविता !

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  50. मैं छोटा था मुझे चोरी से तू कुछ कुछ खिलाती थी
    मुझे है याद सीने से लगा के तू सुलाती थी

    बहुत बढिया

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  51. behad marmik geet... bahut sundar... maan aur beti ke beech ka rishta adbhud hota hai.. is rishto ko is geet ne ise jiya hai..

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  52. निकलती है कभी बिस्तर से जब फ़र्नैल की गोली
    नज़र आती है आँगन में कभी जब दीप रंगोली
    पुरानी कतरनें अख़बार के पन्नों को छूते ही
    तू शब्दों से निकल कर सामने जब मुस्कुराती है

    बेहद शानदार लाजवाब .......

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  53. बहुत सुंदर .... गहन अभिव्यक्ति लिए पंक्तियाँ....

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  54. बहुत सुंदर .... गहन अभिव्यक्ति लिए पंक्तियाँ....

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  55. अम्मा तो याद आती ही रहती है
    प्यारी कविता

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  56. बहुत ही प्यारी कविता.... अनोखे भाव....
    सादर...

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  57. वाह ... बहुत ही अच्‍छा लिखा है ।

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  58. bahut hi adhbhut .behatreen v marmik prastuti.
    --- badi shiddat se tumhari amma yaad aati hai .
    in panktiyo me kuchh eha chupahua dard hai jise bayan nhai kija sakta sirf mahsus kar sakte hain .waqai1
    man ko jhakjhor gai aapki yah anupam kriti.---
    sadar dhanyvaad sahit
    poonam

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  59. aajkal ma se dur rah raha hun... to mujhe bhi meri ma ki bahut yaad aa rahi hai...
    apke is geet ne or yaad dila di..

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  60. कमाल का चित्रण किया है..सुन्दर शब्द..सुन्दर भाव

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  61. अम्मा कि यादें. मन को दृवित करती प्रस्तुति. बेहद शानदार लाजवाब.

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  62. bahut sunder....sach me maa aisehi hoti hai ........

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  63. वाह! माँ की याद पवित्र कर देती है,और नसीब वाले हैं,जिन्हे ये जज़्बा याद रहता है! बहुत ही सुन्दर शब्द और तरन्नुम बन पडा है रचना में! वाह!

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  64. अम्मा को याद करना सबसे सुखद अनुभूति है।
    बहुत ही प्यारी रचना।

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  65. ज़िन्दगी के बहुत थोड़े से लम्हात होंगे जब अम्माँ की याद न आई हो
    नि:शब्द हूँ ,,कोई ,रचना जब मन की गहराइयों से निकलती है तो पाठकों के मन को भी छू जाती है
    बहुत सुन्दर !
    काबिले तारीफ़ ओ सताइश !!!

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  66. नासवा जी ,निशब्द हूँ !
    क्या माँ ...ऐसी होती है ..?
    जिसने न देखा हो...वो तो पुछेगा ही...
    खुश और स्वस्थ रहें !
    अशोक सलूजा !

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  67. एक बार फिर इस कविता को पढ़ना अच्छा लग रहा है.ठहरे हुए पानी में कोई कंकड मार दे जैसे. बहुत भावुक,मार्मिक,प्यारी कविता है.एक नन्हा सा बच्चा भीड़ में अकेला रो रहा हो जैसे .... एकदम अकेला.

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  68. आपकी इस कविता को पढ़कर लगा जैसे मैंने तीर्थयात्रा कर ली हो...कितना अद्भुत लिखतें हैं आप...कितना गहरा...

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  69. Digambar ji. I like it very much. after a long time i read such beautiful poem on mother.

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है