गुरुवार, 25 अगस्त 2011

आह्वान ...

कब तक शब्दों को
विप्लव की रचनाओं में उतारोगे

शब्द से रचना
रचना से संग्रह
संग्रह से किताब
किताब से संग्रहालय
आंत्र-जाल
या कोई अखबार

दम घोंटू
जंग खाई अलमारियों में
फर्नेल की बदबू से जूझती
सीलन लगी किताबें
फफूंद लगे शब्द
अब सड़ने लगे हैं
मकड-जाल में फंसे मायनों की
साँस उखड़ने लगी है

इससे पहले की
दीमक शब्दों को चाट जाए
शब्दों से गिर के अर्थ
आत्महत्या कर लें
इन्हें बाहर लाओ
चमकती धूप दिखाओ
युग परिवर्तन की हवा चलाओ
शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
क्रान्ति का इंधन बना दो

क्या हुवा जो कुछ समय के लिए
काव्य सृजन न हुवा
इतिहास की वीथियों में
संगृहीत शब्दों की आवाजें
गूंजती रहेंगी सदियों तक

81 टिप्‍पणियां:

  1. संवेदनशील कविता.... बहुत गंभीर विषय पर एक सशक्त अभिव्यक्ति...
    "इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें"
    ..... ये पंक्तियाँ बेहद प्रभावित कर रही हैं...

    जवाब देंहटाएं
  2. इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    बहुत सुंदर शब्द संयोजन क्या बात कही आपने इससे ज्यादा कहने को शब्द नहीं है

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  3. इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
    क्रान्ति का इंधन बना दो
    क्या खूब अंदाज़ है.......... क्रांति ज़रूरी है....... parivartan भी नितांत आवश्य !!!!
    बेहतरीन कविता !!!

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  4. इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो '
    सही लिखा वो समय आ गया है 'वो सुबहा कभी तो आएगी' गाने का नही ऐसे गीतों को जीने का समय आ गया है.अब भी चुप रहे तो कई और साल तक भारत .....कुचला जाता रहेगा भ्रष्टाचार के पैरों तले.
    समय की नब्ज पकड़ने में माहिर हो गए हो बाबु! या.........देश से दूर ये भावनाएं ज्यादा उबाल पर है?
    देश को जगाने वालो का मनोबल बढाना भी देश भक्ति है.इतनी दूर बैठे वही कर रहे हो.जियो

    जवाब देंहटाएं
  5. इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो '
    सही लिखा वो समय आ गया है 'वो सुबहा कभी तो आएगी' गाने का नही ऐसे गीतों को जीने का समय आ गया है.अब भी चुप रहे तो कई और साल तक भारत .....कुचला जाता रहेगा भ्रष्टाचार के पैरों तले.
    समय की नब्ज पकड़ने में माहिर हो गए हो बाबु! या.........देश से दूर ये भावनाएं ज्यादा उबाल पर है?
    देश को जगाने वालो का मनोबल बढाना भी देश भक्ति है.इतनी दूर बैठे वही कर रहे हो.जियो

    जवाब देंहटाएं
  6. क्या हुवा जो कुछ समय के लिए
    काव्य सृजन न हुवा
    इतिहास की वीथियों में
    संगृहीत शब्दों की आवाजें
    गूंजती रहेंगी सदियों तक ...निशब्द करती पंक्तिया....

    जवाब देंहटाएं
  7. क्या हुवा जो कुछ समय के लिए
    काव्य सृजन न हुवा
    इतिहास की वीथियों में
    संगृहीत शब्दों की आवाजें
    गूंजती रहेंगी सदियों तक

    very inspiring and motivating creation.

    .

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  8. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति.......

    जवाब देंहटाएं
  9. दम घोंटू
    जंग खाई अलमारियों में
    फर्नेल की बदबू से जूझती
    सीलन लगी किताबें
    फफूंद लगे शब्द
    अब सड़ने लगे हैं
    मकड-जाल में फंसे मायनों की
    साँस उखड़ने लगी है
    Kahaan tak pahunch jaate ho sir ji !

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  10. चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ

    beautiful gazal

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  11. गुलज़ार साहब ने भी कहा है कि मेरी आवाज़ ही पहचान है.. वो आवाज़ जो शब्दों से पैदा हुई है.. इन्क़लाब जिंदाबाद, वंदे मातरम ये शब्द ही तो थे, जिन्होंने क्रान्ति या विप्लव को जन्म दिया!!
    बहुत ही संवेदनशील कविता!!

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  12. शब्द तो हमारी हर सांस में हैं...कभी मर ही नहीं सकते। हम एक बार सांस लेते और छोड़ते हैं तो भी शब्द की गूँज अपने आप सुनाई देती है। अर्थ समझना ही बड़ी बात है। अर्थ पर चलना बड़ी बात है। शब्द ही हैं जो क्रांति के वाहक बनते हैं।

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  13. बहुत बढ़िया रचना अभिव्यक्ति....आभार

    जवाब देंहटाएं
  14. दम घोंटू
    जंग खाई अलमारियों में
    फर्नेल की बदबू से जूझती
    सीलन लगी किताबें
    फफूंद लगे शब्द
    अब सड़ने लगे हैं
    मकड-जाल में फंसे मायनों की
    साँस उखड़ने लगी है
    भाई दिगम्बर जी बेहतरीन कविता के लिए आपको बहुत बहुत बधाई

    जवाब देंहटाएं
  15. दम घोंटू
    जंग खाई अलमारियों में
    फर्नेल की बदबू से जूझती
    सीलन लगी किताबें
    फफूंद लगे शब्द
    अब सड़ने लगे हैं
    मकड-जाल में फंसे मायनों की
    साँस उखड़ने लगी है
    भाई दिगम्बर जी बेहतरीन कविता के लिए आपको बहुत बहुत बधाई

    जवाब देंहटाएं
  16. इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
    क्रान्ति का इंधन बना दो
    Kya gazab kaa likha hai!

    जवाब देंहटाएं
  17. इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ

    ....सार्थक सन्देश देती बहुत संवेदनशील और प्रेरक अभिव्यक्ति..बहुत सुन्दर

    जवाब देंहटाएं
  18. ise sashakt rachana ke rachyita kee lekhanee soch ko naman .

    जवाब देंहटाएं
  19. हजारों मील दूर बैठे , अन्ना का यूँ समर्थन करना बढ़िया लगा ।
    सही है कुछ देर के लिए लेखन को छोड़ आवाज़ उठाने के लिए निकल पड़ो । वक्त की यही पुकार है ।

    बढ़िया सन्देश देती रचना के लिए बधाई ।

    जवाब देंहटाएं
  20. क्या हुवा जो कुछ समय के लिए
    काव्य सृजन न हुवा
    इतिहास की वीथियों में
    संगृहीत शब्दों की आवाजें
    गूंजती रहेंगी सदियों तक ... beshak

    जवाब देंहटाएं
  21. बहुत सशक्त कविता है ये

    हार्दिक बधाई पेश है विनम्रता के साथ.

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  22. सोए हुए प्राणों को झझकोरती ओजस्वी रचना...

    जवाब देंहटाएं
  23. स्वान्त:सुखाय से बेहतर है कि सर्वजन सुखाय हो..

    जवाब देंहटाएं
  24. इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ

    प्रेरित करने वाली रचना ..सटीक आह्वान

    जवाब देंहटाएं
  25. बहुत चुप रहे अब आखिर कब तक!
    सोई आत्माओं को जगाने का सार्थक सन्देश!

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  26. भाई दिगंबर नासवा जी

    बहुत ओजमयी रचना के लिए आभार !
    इससे पहले … कि
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
    क्रान्ति का इंधन बना दो


    निःसंदेह सशक्त-सार्थक रचना!

    जवाब देंहटाएं
  27. इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ

    बहुत अच्छा आह्वान किया है सर।

    सादर

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  28. वाह बहुत बहुत सुन्दर ..जबरदस्त अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  29. आह्वान करते. संवेदनशील कविता.... बहुत गंभीर विषय पर एक सशक्त अभिव्यक्ति...धन्यवाद....

    जवाब देंहटाएं
  30. सार्थक एवं सटीक अभिव्‍यक्ति ।

    जवाब देंहटाएं
  31. बहुत प्रभावशाली और सशक्त कविता, आज सचमुच शब्दों को धूप में चमकाने की जरूरत है....बधाई!

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  32. लाख टके की बात अब कलम से आग लगाने का समय आ चुका है युग परिवर्तन का काल है

    जवाब देंहटाएं
  33. इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
    क्रान्ति का इंधन बना दो

    प्रभावित करती पंक्तियाँ...क्रान्ति का आव्हान है आपकी रचना में...

    जवाब देंहटाएं
  34. क्या हुवा जो कुछ समय के लिए
    काव्य सृजन न हुवा
    इतिहास की वीथियों में
    संगृहीत शब्दों की आवाजें
    गूंजती रहेंगी सदियों तक

    बेहतरीन संदेश के साथ सार्थक आह्वान्…………अति सुन्दर रचना।

    जवाब देंहटाएं
  35. संगृहीत शब्दों की आवाजें
    गूंजती रहेंगी सदियों तक! ham rahe yaa n rahe shabd sadaiv bane rahenge !

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  36. अलख जगाओ , प्रयाण गीत गाओ. जबरदस्त .

    जवाब देंहटाएं
  37. अत्यंत सार्थक संदेश, शुभकामनाएं.

    रामराम

    जवाब देंहटाएं
  38. क्या हुवा जो कुछ समय के लिए
    काव्य सृजन न हुवा
    इतिहास की वीथियों में
    संगृहीत शब्दों की आवाजें
    गूंजती रहेंगी सदियों तक
    bilkul sahi kaha aur sundar bhi ,adbhut

    जवाब देंहटाएं
  39. चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ

    लाज़बाब अभिव्यक्ति

    जवाब देंहटाएं
  40. Hi I really liked your blog.

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  41. वाह! बहुत खूब लिखा है आपने! मन की गहराई को बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है!

    जवाब देंहटाएं
  42. जन लोकपाल के पहले चरण की सफलता पर बधाई.

    जवाब देंहटाएं
  43. संवेदना का जो ज्वार उठा है इस कविता के पढ़ने के बाद उसका वर्णन नहीं कर सकता।

    जवाब देंहटाएं
  44. @ युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
    क्रान्ति का इंधन बना दो

    सत्य वचन! अब जाग उठा इंसान, ज़माना देखेगा!

    जवाब देंहटाएं
  45. इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ

    जबर्दस्त कविता लिखी है।
    ..शब्दों से गिरकर अर्थ आत्महत्या कर लें...
    वाह,यह प्रतीक अनुपम है।
    बहुत अच्छी लगी कविता।

    जवाब देंहटाएं
  46. aajkal manushya sirf sahbd aur vichar mehi jine laga hai vasviktase koso dur....
    badi sunder rachna mujhe bahut pasand aai hai ....

    जवाब देंहटाएं
  47. इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
    क्रान्ति का इंधन बना दो
    वाह, सुंदर पंक्तियाँ ।

    जवाब देंहटाएं
  48. इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    bahut khoob...!

    जवाब देंहटाएं
  49. बहुत सुन्दर....
    सार्थक सन्देश देती बहुत संवेदनशील और प्रेरक अभिव्यक्ति..

    जवाब देंहटाएं
  50. अरि आज तो बधाई गाओ रंग महल में ,अन्ना जी की आरती गाओ रंग महल में ,जन गण मन की आरती गाओ रंग महल में .
    निश्चय ही नासवा जी सारे शब्द खो चुके हैं अपना अर्थ ,यहाँ तक की व्याकरण भी अब सरकंडे के खेत को जलाने का वक्त .आगया है .मौसम भी यहाँ का अब बदलने लगा है ,बदली छटने लगी है ,बेहद अर्थ पूर्ण रचना रची है आपने ,..........Saturday, August 27, 2011
    अन्ना हजारे ने समय को शीर्षासन करवा दिया है ,समय परास्त हुआ जन मन अन्ना विजयी . /
    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं
  51. गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब ग़ज़ल लिखा है आपने ! शानदार प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं
  52. आपकी पोस्ट ब्लोगर्स मीट वीकली (६) के मंच पर प्रस्तुत की गई है /आप आयें और अपने विचारों से हमें अवगत कराएँ /आप हिंदी के सेवा इसी तरह करते रहें ,यही कामना हैं /आज सोमबार को आपब्लोगर्स मीट वीकली
    के मंच पर आप सादर आमंत्रित हैं /आभार /

    जवाब देंहटाएं
  53. आह्वाहन की गूंज प्रेरित कर रही है.अब क्रांति को कोई रोक ही नहीं सकता है.मानो धरध्रराती हुई पुकार अन्दर तक प्रवेश कर रही हो.

    जवाब देंहटाएं
  54. क्या बात , क्या बात , क्या बात ....जबरदस्त!!!

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  55. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति.......

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  56. aadarniy sir
    bahut dino baad aapke blog par der se pahunchne ke liye xhma chati hun.
    bahut hi prabhavit kar gai aapki yah gahre avam sashkt shbdo se pripurit rachna.har panktiyan kuchh na kuchh sandesh deti hai
    bahut hi lajwab gahan abhivykti se bhare aapke vicharo ko mai naman karti hun.


    इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
    क्रान्ति का इंधन बना दो
    man me joshh jagane wali ek udhelit
    avam prena dene wali behad hi bhav prvan-prastuti ke liye
    hardik abhinandan
    poonam

    जवाब देंहटाएं
  57. इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
    क्रान्ति का इंधन बना दो
    गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब ग़ज़ल लिखा है आपने ! शानदार प्रस्तुती!

    जवाब देंहटाएं
  58. इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
    क्रान्ति का इंधन बना दो
    क्या हुवा जो कुछ समय के लिए
    काव्य सृजन न हुवा
    इतिहास की वीथियों में
    संगृहीत शब्दों की आवाजें
    गूंजती रहेंगी सदियों तक

    सरल शब्दों में छिपे गहरे भाव.
    यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
    अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html

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  59. बहुत ही प्रभावशाली रचना...
    शब्द मैदान में उतरने को छटपटा रहे हैं !

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  60. फफूंद लगे शब्द
    अब सड़ने लगे हैं
    मकड-जाल में फंसे मायनों की
    साँस उखड़ने लगी है
    इससे पहले की
    दीमक शब्दों को चाट जाए
    शब्दों से गिर के अर्थ
    आत्महत्या कर लें
    इन्हें बाहर लाओ
    चमकती धूप दिखाओ
    युग परिवर्तन की हवा चलाओ
    शब्दों को ओज़स्वी आवाज़ में बदल डालो
    क्रान्ति का इंधन बना दो!!

    kuchh aisi hi zaroorat hai..

    जवाब देंहटाएं
  61. अंतिम पंक्तियों में कवि का आत्मविश्वास कबिलेतारीफ.

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  62. हमेशा की तरह.... यथार्थपरक!
    आशीष
    --
    मैंगो शेक!!!

    जवाब देंहटाएं
  63. कभी-कभी,कवि को भी कलम-रूपी तलवार उठानी पडती है,युग-परिवर्तन के लिए.देरी के लिये क्षमा करें.

    जवाब देंहटाएं
  64. आपकी हर प्रस्तुति गहन अर्थ समेटे होती है.
    अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार.

    जवाब देंहटाएं

आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है