मंगलवार, 13 सितंबर 2011

ख़बरों को अखबार नहीं कर पाता हूँ ..

कविताओं के दौर से निकल कर ... पेश है आज एक गज़ल ...

उनसे आँखें चार नहीं कर पाता हूँ
मिलने से इंकार नहीं कर पाता हूँ

खून पसीना रोज बहाता हूँ मैं भी
मिट्टी को दीवार नहीं कर पाता हूँ

नाल लगाए बैठा हूँ इन पैरों पर
हाथों को तलवार नहीं कर पाता हूँ

सपने तो अपने भी रंग बिरंगी हैं
फूलों को मैं हार नहीं कर पाता हूँ

अपनों की आवाजें हैं पसमंज़र में
खूनी हैं पर वार नहीं कर पाता हूँ

सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ

कातिब हूँ कातिल भी मैंने देखा है
ख़बरों को अखबार नहीं कर पाता हूँ

74 टिप्‍पणियां:

  1. सपने तो अपने भी रंग बिरंगी हैं
    फूलों को मैं हार नहीं कर पाता हूँ

    वाह बहुत सही ...बहुत बढ़िया लगी आपकी लिखी यह गजल .....बेहतरीन शेर ..

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  2. अपनों की आवाजें हैं पसमंज़र में
    खूनी हैं पर वार नहीं कर पाता हूँ

    सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ
    Kya gazab likha hai!

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  3. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ

    सात समंदर पार करना आसान है ..लेकिन आंसुओं के सागर को पार करना किसी के वश में नहीं .....क्योँकि इनका सम्बन्ध हमारी संवेदना से है ...हमारे जज्बातों से है .....ग़ज़ल का हर शेर एक अनुपम अर्थ सामने लाता है .....आपका आभार

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  4. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ
    हर पंक्ति अपने आप में बेमिसाल है ...

    यह पंक्तियां बहुत ही अच्‍छी लगी ...आभार ।

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  5. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ
    वाह ..दिल के बेहद करीब.

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  6. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ
    waah bahut khoob.....aabhar

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  7. उनसे आँखें चार नहीं कर पाता हूँ
    मिलने से इंकार नहीं कर पाता हूँ
    .....उम्दा ख्याल....प्यार का बेहतरीन अंदाज़, अच्छा और नया लगा

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  8. नाल लगाए बैठा हूँ इन पैरों पर
    हाथों को तलवार नहीं कर पाता हूँ
    वाह बहुत खूब ...बहुत सुन्दर सच्ची बात लिखी आपने ..बहुत पसंद आया यह शेर

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  9. बेहतरीन रचना। बहुत अच्छी ग़ज़ल।

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  10. बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति ...

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  11. वाह...एक से बढ़कर एक मनके...क्या प्रशंसा करूँ...

    बेजोड़ !!!!

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  12. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ

    वाह , नासवा जी , बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं ।
    बढ़िया ग़ज़ल लिखी है । बेहतरीन ।

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  13. है रोजी-रोटी परिवार सब,
    घर-बार नहीं कर पाता हूँ |

    मनाते हैं वैशाखी-होली-ईद
    मनानुसार नहीं कर पाता हूँ ||

    सुन्दर रचना आपकी, नए नए आयाम |
    देत बधाई प्रेम से, प्रस्तुति हो अविराम |

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  14. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ ......बहुत सुन्दर!!

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  15. नासवा जी!
    एक लंबे अंतराल के बाद आपकी गज़ल पढ़ने को मिली.. और इसके रंग देखकर कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ मैं.. कमाल के अशार हैं और मक़ता सीधा कलेजे में पैबस्त हो जाता है!!

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  16. खून पसीना रोज बहाता हूँ मैं भी
    मिट्टी को दीवार नहीं कर पाता हूँ

    वाह वाह ...
    बहुत शानदार ग़ज़ल...
    सादर...

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  17. खून पसीना रोज बहाता हूँ मैं भी
    मिट्टी को दीवार नहीं कर पाता हूँ


    सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ

    बहुत दिनों बाद आपकी ग़ज़ल पढने को मिली, हमेशा की तरह पढ़ कर आनंद आ गया!

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  18. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ
    हर शेर खुबसूरत वाह वाह .....

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  19. खून पसीना रोज बहाता हूँ मैं भी
    मिट्टी को दीवार नहीं कर पाता हूँ .......हर शेर बहुत खुबसूरत ...

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  20. आपकी कविता की तरह खबरें भी प्रभाव डाल जाती हैं।

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  21. वाह, आज तो अंदर तक बात उतर गई, बहुत खूबसूरती के साथ उकेरी गई रचना, शुभकामनाएं.

    रामराम

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  22. बहुत खूबसूरत, बहुत शानदार, बहुत अच्छी गजल... वाह..

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  23. बहुत अच्छी ग़ज़ल....... हर पंक्ति बेजोड़ है. सुंदर प्रस्तुति.
    पुरवईया : आपन देश के बयार

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  24. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ
    ..कमाल का शेर...! एकदम नया अंदाज...!! वाह..!!!

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  25. नाल लगाए बैठा हूँ इन पैरों पर
    हाथों को तलवार नहीं कर पाता हूँ
    अद्भुत अभिव्यक्ति।
    इसमें कुछ ऐसा है जो मुझे आह और वाह करने पर मज़बूर किए दे रहा है।

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  26. नाल लगाए बैठा हूँ इन पैरों पर
    हाथों को तलवार नहीं कर पाता हूँ

    Khoob....Behtreen Panktiyan

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  27. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ


    कितने मुद्दे उठा लिए आपने इस खूबसूरत गज़ल में .. बहुत खूब .

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  28. अपनों की आवाजें हैं पसमंज़र में
    खूनी हैं पर वार नहीं कर पाता हूँ
    subhanallah , bahut hi badhiyaa

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  29. नासवा जी , नमस्कार !
    बहुत भावुक ....
    आप मेरी प्रशंसा के मोहताज नही और न मैं इस लायक !
    शुभकामनायें !

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  30. बहुत सुंदर शब्द ,बहुत सुन्दर पंक्तियाँ |कहीं गहरे में उतरती हुई..

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  31. bahut hi sateek har pankti hamari bhavnao se judi si prateet hoti hai.kya khoob likha hai aapne---
    सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ

    कातिब हूँ कातिल भी मैंने देखा है
    ख़बरों को अखबार नहीं कर पाता हूँ
    bahut kuchh ankahe kah jaati hain ye panktiyan-------
    sadar naman
    poonam

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  32. दिगंबर जी
    बढ़िया ग़ज़ल.......
    मतले से ही बात बन गयी.... बाकी शेर तो बोनस में मिले....!!!
    अपनों की आवाजें हैं पसमंज़र में
    खूनी हैं पर वार नहीं कर पाता हूँ
    अच्छा है.....!!!!

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  33. खून पसीना रोज बहाता हूँ फिर भी
    मिट्टी को दीवार नहीं कर पाता हूँ
    वाह नासवा जी, उम्दा शेर
    नाल लगाए बैठा हूँ इन पैरों पर
    हाथों को तलवार नहीं कर पाता हूँ
    किस कदर बेबसी का आलम पेश किया है...वाह
    सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ
    ये तो हासिले-ग़ज़ल शेर है आपका...यादगार.

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  34. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ
    क्या बात है..बड़ी शानदार ग़ज़ल लिखी है..

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  35. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण ग़ज़ल...

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  36. भाई दिगम्बर नासवा जी कमाल की गज़ल है बधाई रंग बिरंगे कर ले टाईपिंग भूल सुधार कर लें

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  37. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ

    बेहतरीन.

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  38. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ

    कातिब हूँ कातिल भी मैंने देखा है
    ख़बरों को अखबार नहीं कर पाता हूँ

    बेहतरीन ग़ज़ल...हर शे‘र में आपका निराला अंदाज झलक रहा है।

    जवाब देंहटाएं
  39. दिगंबर जी हमेशा की तरह ला-जवाब कर दिया है आपने...क्या कहूँ समझ ही नहीं पा रहा...छोटी बहर में ऐसी बड़ी बड़ी बातें...कसमसाहट...घुटन का इतना सजीव चित्रण...भाई वाह...

    खून पसीना रोज बहाता हूँ मैं भी
    मिट्टी को दीवार नहीं कर पाता हूँ

    नाल लगाए बैठा हूँ इन पैरों पर
    हाथों को तलवार नहीं कर पाता हूँ

    सुभान अल्लाह...कैसे उतरते हैं ऐसे शेर आपके ज़ेहन में? कमाल करते हैं नाशवा जी....कमाल...भाई इस ग़ज़ल के लिए दिली दाद कबूल करें.

    नीरज

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  40. सात समंदर को पार करने से मुश्किल था आंसुओं को पार करना ...
    बेहतरीन !

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  41. विशुद्ध रूप से लिखी गई ग़ज़ल और कई सारे सन्देश देती हुई !
    लाजवाब रचना !

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  42. बेहतरीन हर पंक्ति.. खासकर "सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में, बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ"

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  43. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसू पार नहीं कर पाता हूँ

    क्या बात कही है, नासवा जी ।
    इस शेर पर हजारों दाद कबूल फरमाएं।

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  44. उनसे आँखें चार नहीं कर पाता हूँ
    मिलने से इंकार नहीं कर पाता हूँ
    सुन्दर प्रस्तुति .....आपकी ये पंक्तिया दिल को छु गयी .
    उम्दा प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  45. नाल लगाए बैठा हूँ इन पैरों पर
    हाथों को तलवार नहीं कर पाता हूँ
    ......बेहतरीन !

    जवाब देंहटाएं
  46. बहुत बढ़िया लगी आपकी लिखी यह गजल|लाजवाब रचना|

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  47. aur is se jyada kya hatho ko talwar banayenge...ham to dharashayi ho hi gaye hain.

    :)

    sunder, umda gazel.

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  48. "अपनों की आवाजें हैं पसमंज़र में
    खूनी हैं पर वार नहीं कर पाता हूँ "

    shaayad apne hote hi hain chot karne ke liye...

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  49. खून पसीना रोज बहाता हूँ फिर भी
    मिट्टी को दीवार नहीं कर पाता हूँ...

    waah sir...ek se badhkar ek sher....is behatarin gazal ke liye bahut bahut badhai...

    जवाब देंहटाएं
  50. खून पसीना रोज बहाता हूँ फिर भी
    मिट्टी को दीवार नहीं कर पाता हूँ...

    waah sir...ek se badhkar ek sher....is behatarin gazal ke liye bahut bahut badhai...

    जवाब देंहटाएं
  51. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ

    -गज़ब महाराज....आर पार हो गया!!

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  52. कई बार पढ़ा और जब तक ये गज़ल मुझे
    पूरी तरह याद ना हो जाये , मैं हर रोज
    पढने आया करूंगा ||
    सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ

    वाह कितनी बड़ी और गहरी बात छुपी है इस शेर में

    कातिब हूँ कातिल भी मैंने देखा है
    ख़बरों को अखबार नहीं कर पाता हूँ

    इस शेर की तो बात ही निराली है

    दिल से बधाई सर जी ||

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  53. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  54. शनिवार १७-९-११ को आपकी पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर है |कृपया पधार कर अपने सुविचार ज़रूर दें ...!!आभार.

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  55. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ

    शानदार गज़ल.

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  56. उनसे आँखें चार नहीं कर पाता हूँ
    मिलने से इंकार नहीं कर पाता हूँ
    bhaut khub vaah vaah ...

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  57. शेर है सवा शेर . सारे के सारे . हकीकत से रूबरू कराते हुए

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  58. खून पसीना रोज बहाता हूँ मैं भी
    मिट्टी को दीवार नहीं कर पाता हूँ


    दिगंबर जी,

    बहुत सुंदर-सुंदर शेर कही आपने
    शब्दों के जादूगर है आप तो कुछ भी लिख दीजिए मन मोह ही लेता है...भगवान आपके इस प्रतिभा को और उँचाई दे..नमस्कार

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  59. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में
    बहते आंसूं पार नहीं कर पाता हूँ.

    क्या भाव प्रस्तुत किये हैं इस खूबसूरत गज़ल के द्वारा. हर शेर दिल को छूता है.

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  60. बंधु, आप कविता लिखें या ग़ज़लें, सहज ही प्रभावित कर जाते हैं अपने पाठकों को। आप की इस ख़ूबी ने खरीद लिया है मुझे। बधाई।

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  61. सात समुन्दर पार किये हैं चुटकी में,
    दरिया आंसू का पार नहीं कर पाता हूँ

    थोडा संशोधन करने की गुस्ताखी कर रहा हूँ...बेहतरीन ग़ज़ल...

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  62. खून पसीना रोज बहाता हूँ मैं भी
    मिट्टी को दीवार नहीं कर पाता हूँ

    ... लाजवाब गजल । बहुत खूब !

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  63. har khyaal lajavaab...aur chhote chhote sher kehne ki ye adaa...waah!

    Mere latest post ko yahan padhe:
    http://teri-galatfahmi.blogspot.com/2011/09/blog-post_19.html

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  64. फूलों के हार सी प्यारी है यह गज़ल...और हर अशआर कमाल के हैं!!!

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  65. jeevan ke bahut hi nazdeek....
    dil ho chhoote hue kuchh nikal gaya...
    har sher laazvab hai......!
    shukriya..!!

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  66. ख़ूबसूरत ग़ज़ल … क्या बात है ! बधाई !

    आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है