सोमवार, 19 दिसंबर 2011

मुक्ति ...

क्या ये सच है
लेखक की कल्पना का कोई अंत नहीं ... ?
कवि की सोच गहरे सागर में गोते लगा कर
सातवें आसमान तक जाती है ... ?

सच लगता है जब श्रोता की तरह सोचता हूँ
पर जब कवि मन से विवाद होता है
अपने आप से आँखें चुराने लगता हूँ

हकीकत में तो
कवि अपनी सोची समझी सोच को
शब्दों की चासनी लपेट कर परोसता है
विशेष विचारधारा का गुलाम
अपने ही फ्रेम में जकड़ा
सोचे हुवे अर्थों के शब्द ढूँढता है
जिसके आवरण में वो सांस ले सके

एक सिमित सा आकाश
जिसमें वो जीता है मरता है
कलाकार होने का दावा करता है
आम आदमी की जमात से ऊपर उठ के
बुद्धिजीवी होने का दावा

सुनो कवि
अपने आप को रिक्त करो
मान्यताएं, विचारधारा
अपनी पसंद के शब्दों का दायरा तोड़ो
ये कारा तोड़ो
सत्य को सत्य की नज़र से देखो
अपने केनवास के किनारे तोड़ो
पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
तो कवि धर्म निभाओ
अपने आप से मुक्ति पाओ

70 टिप्‍पणियां:

  1. हकीकत में तो
    कवि अपनी सोची समझी सोच को
    शब्दों की चासनी लपेट कर परोसता है
    विशेष विचारधारा का गुलाम
    अपने ही फ्रेम में जकड़ा
    सोचे हुवे अर्थों के शब्द ढूँढता है
    जिसके आवरण में वो सांस ले सके
    बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ... आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्या ये सच है
    लेखक की कल्पना का कोई अंत नहीं ... ?
    कवि की सोच गहरे सागर में गोते लगा कर
    सातवें आसमान तक जाती है ... ?
    sach to bas yahi hai ... samvedanshilta kee udaan , gahri paith , aur pahunch khud kavi se bhi anjaan hoti hai , per uski kalam se lipatti hai

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुनो कवि
    अपने आप को रिक्त करो
    मान्यताएं, विचारधारा
    अपनी पसंद के शब्दों का दायरा तोड़ो
    ये कारा तोड़ो

    बहुत सुन्दर , मगर इतना आसाँ कहाँ इनसे पार पाना, नासवा साहब !

    उत्तर देंहटाएं
  4. भूत से मुक्त होना है, भविष्य को स्वीकार करना है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. हकीकत में तो
    कवि अपनी सोची समझी सोच को
    शब्दों की चासनी लपेट कर परोसता है

    यह तो बिल्कुल सही कहा नासवा जी । कवि की माहरत ही इस बात में है कि वह कितनी चासनी लपेट सकता है ।
    फिर भी कवि के कहे शब्द श्रोताओं के लिए राम बाण साबित हो सकते हैं । इसलिए कवियों को तो अपना धर्म निभाते रहना चाहिए ।

    सोचने पर मजबूर कर रही है रचना ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. कविधर्म तो स्वतंत्रमना होकर ही निभायी जा सकता है। अब कोई मिथ्याचार करते धर्मनिर्वहन न करें तो इसमें तो व्यक्ति का दोष है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुनो कवि
    अपने आप को रिक्त करो
    मान्यताएं, विचारधारा
    अपनी पसंद के शब्दों का दायरा तोड़ो
    ये कारा तोड़ो

    वाह बहुत सुंदर.. बहुत गहरी बात कही है आपने !

    आभार...!!

    उत्तर देंहटाएं
  8. कवि यदि कुछ कहने को विवश कर दिया जाये उन भावों द्वारा जो उसके भीतर सहज ही उमड रहे हैं वहाँ तक तो ठीक है पर जब लिखना एक मजदूरी हो जाये तब सोचना पड़ेगा...

    उत्तर देंहटाएं
  9. नमस्कार दिगम्बर जी
    बहुत ही सुंदर प्रस्तुति लगी ........कवी मन के सब तारो का समावेश है .........परन्तु कवी सिर्फ स्वप्न की ही नहीं सच्चाई को भी बयां करता है . शब्दों का द्वन्द , मनस्थिति .विचार .......बेहतरीन रचना

    लेखक की कल्पना का कोई अंत नहीं ..............बिलकुल सत्य
    कवि की सोच गहरे सागर में गोते लगा कर
    सातवें आसमान तक जाती है ..................ख़ूबसूरती कवी द्वारा ही प्रस्तुत की जाती है ......बहुत ही सुंदर . बधाई स्वीकार करे , उत्तम प्रस्तुति .

    उत्तर देंहटाएं
  10. सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
    तो कवि धर्म निभाओ
    अपने आप से मुक्ति पाओ ....

    अनतलाशे आसमान में अनंत उड़ान की प्रेरणा देती सुन्दर रचना सर....
    सादर..

    उत्तर देंहटाएं
  11. बात तो सही कही है आपने.
    सोचने पर मजबूर करती रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सही कहा, कवि को अपनी व्यक्तिगत विचारधारा से बाहर आकर सत्य को सत्य की तरह अभिव्यक्त करना चाहिए, यही तो इतिहास बनेंगे. आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  13. इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं...
    बात बिलकुल सही है लेकिन हकीकत में तो कवि अपनी सोची समझी सोच को ही शब्द देता है और उसकी अपनी सोच का एक दायरा होता है... सही सोचते हैं आप

    उत्तर देंहटाएं
  14. मुनव्वर साहब फरमाते हैं कि
    मैंने लफ़्ज़ों को बरतने में लहू थूक दिया,
    आप तो सिर्फ ये देखेंगे गज़ल कैसी है!इसलिए सिर्फ ऐसा नहीं कि लफ़्ज़ों की चाशनी में शब्द लपेटकर पेश करने से कविता बनती है.. कल ही एक अज़ीम शायर इंतकाल फरमा गए.. जनाब अदम गोंडवी.. उनका मजमुआ पढकर मुंह कसैला हो जाता है... और कमाल ये कि हम ये भी नहीं सोचते कि उस शायर ने यह सब जिया था!!

    उत्तर देंहटाएं
  15. तो कवि धर्म निभाओ
    अपने आप से मुक्ति पाओ……………ये तो तभी संभव है जब समभाव आ जाये और कवि की कलम को स्वतंत्रता मिले वैसे तो कवि होता ही स्वतंत्र है …………बहुत सुन्दर प्रस्तुति सोचने को विवश करतीहै।

    उत्तर देंहटाएं
  16. अपने से मुक्‍त होना ही सबसे बड़ी चुनौती है।

    उत्तर देंहटाएं
  17. बहुत ही सच बात आपने कही. विचारणीय पोस्ट.

    उत्तर देंहटाएं
  18. सुनो कवि
    अपने आप को रिक्त करो
    मान्यताएं, विचारधारा
    अपनी पसंद के शब्दों का दायरा तोड़ो
    ये कारा तोड़ो
    सत्य को सत्य की नज़र से देखो
    अपने केनवास के किनारे तोड़ो
    पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
    सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
    तो कवि धर्म निभाओ
    अपने आप से मुक्ति पाओ
    निर्मम आत्मालोचन करती पोस्ट .

    उत्तर देंहटाएं
  19. सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
    तो कवि धर्म निभाओ
    अपने आप से मुक्ति पाओ
    Wah! Kya baat kahee hai!

    उत्तर देंहटाएं
  20. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की जायेगी! आपके ब्लॉग पर अधिक से अधिक पाठक पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  21. कविता में यथार्थ और कल्पना को बराबर स्थान दिया गया है !

    उत्तर देंहटाएं
  22. मुक्ति - आह. किसे मिल सकी है. आप की कविता में इसे पढ़कर मैं थोडा भटक गया हूँ. मुक्त होना - एक अगाध आसमान में किसी बंद परिंदे की उड़ान की चाहत की तरह है.
    या फिर किसी नदी की तरह बहने में. मनचाही दिशा में. कल कल करते. पत्थरों से टकराते, तटों से गले मिलते.

    उत्तर देंहटाएं
  23. कवि धर्म के विभिन्न आयामों को समझने और समझाने का सुंदर प्रयोग इस कविता के माध्यम से आपने किया है नासवा जी.

    एक धीर गंभीर प्रस्तुति सचमुच काबिलेगौर है.

    उत्तर देंहटाएं
  24. जहाँ न पहुचें रवि वहाँ पहुचे कवि,विचारणीय पोस्ट
    बहुत सुंदर पोस्ट,,.........

    मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

    आफिस में क्लर्क का, व्यापार में संपर्क का.
    जीवन में वर्क का, रेखाओं में कर्क का,
    कवि में बिहारी का, कथा में तिवारी का,
    सभा में दरवारी का,भोजन में तरकारी का.
    महत्व है,..

    पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

    उत्तर देंहटाएं
  25. सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
    तो कवि धर्म निभाओ
    अपने आप से मुक्ति पाओ

    बहुत खूब कहा है....सुन्दर कविता

    उत्तर देंहटाएं
  26. कविधर्म निभाने को प्रेरित करती यह रचना सत्य के आवरण को उद्घाटित करती है।

    उत्तर देंहटाएं
  27. आपने तो कवी ह्रदय को खोल कर रख दिया ...बहुत सुन्दर और अच्छी सार्थक रचना

    उत्तर देंहटाएं
  28. भाई दिगम्बर नासवा जी बहुत ही सुन्दर कविता पढ़ने को मिली |बधाई और शुभकामनाएं |

    उत्तर देंहटाएं
  29. लेखक की कल्पना का कोई अंत नहीं...ये बात बिलकुल सही है! गहरे भाव के साथ लाजवाब और विचारणीय रचना! बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  30. sahi kaha hai kavi ki kalpna ka koi ant nahi hota par yeh bhi sach hai ki jahan na pahuche ravi vahan pahuch gaye kavi fir bhi kaviyon ko apni soch me nootanta laane ke liye apni soch ka daayra badhana chahiye.bahut achche vichar.badhia prastuti.

    उत्तर देंहटाएं
  31. अपने आप से मुक्ति पाओ। बहुत सशक्‍त विचार।

    उत्तर देंहटाएं
  32. बहुत सुन्दर सर...
    २ दिन पूर्व मैंने भी मुक्ति विषय पर कविता लिख कर ड्राफ्ट में डाल दी थी..
    आज शीर्षक थोडा बदल कर पोस्ट करती हूँ...आपके स्नेह की आकांक्षा रखती हूँ..
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  33. हकीकत में तो
    कवि अपनी सोची समझी सोच को
    शब्दों की चासनी लपेट कर परोसता है
    विशेष विचारधारा का गुलाम
    अपने ही फ्रेम में जकड़ा
    सोचे हुवे अर्थों के शब्द ढूँढता है
    जिसके आवरण में वो सांस ले सके
    Ye sach hai,phirbhi kavi ek adamy shakti rakhata hai,jo use padhane/sunnewaalon ko milti rahtee hai.

    उत्तर देंहटाएं
  34. सत्य है...स्वयं से,पूर्वाग्रहों से मुक्त हुए सार्थक रचना संभव नहीं...

    चिंतनयुक्त सुन्दर कविता...

    उत्तर देंहटाएं
  35. सत्य को सत्य की नज़र से देखो
    अपने केनवास के किनारे तोड़ो
    पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
    सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
    तो कवि धर्म निभाओ
    अपने आप से मुक्ति पाओ
    ...sarthak dharm nibhana hi kavi ka karm hai..
    bahut sundar aawahan....

    उत्तर देंहटाएं
  36. कविता में आये भाव से असहमत।

    कितना कठिन है एक प्यारा गीत लिखना
    कितना सरल है उसे हंसते हुए गुनगुना देना।

    कवि कवि में फर्क होता है..अदम गोंडवी को ही लें..उन्होने जीया है जिंदगी को..जो आक्रोश उनकी गज़लों में है वो फकत शब्दों की जादुगरी नहीं है। यह हो सकता है कि हम आप सुविधानुसार शब्दों से खेलते हों मगर कुछ हैं जो जीते भी हैं। चलिए मान लिया शब्दों की बाजीगरी है फिर भी उस बाजीगरी को रचते वक्त कवि ह्रदय में एक भाव जगे जो समाज को दिशा दे सकते हैं..भले ही वो खुद ना चल पाये उस पर। यह भी कम नहीं है। भाव भी सच्चे ना हों तो कवि क्या खाक कविता लिखेगा। फकत उपदेश गर्त में मिल जाते हैं..कोई नहीं पढ़ता..कोई प्रभावित नहीं होता।
    आपकी गज़लों को..कविताओं को पढ़कर मुझे सुख मिलता है..मैं यह मान ही नहीं सकता कि वे सिर्फ शब्दों की बाजीगरी हैं....इस कविता में भी कुछ तो है जो मैं इतना लिख गया..इसमें आये भाव से असहमत होते हुए भी।

    उत्तर देंहटाएं
  37. सत्य को सत्य की नज़र से देखो
    अपने केनवास के किनारे तोड़ो
    पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
    सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
    तो कवि धर्म निभाओ

    अच्छा लिखा है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  38. तो कवि धर्म निभाओ
    अपने आप से मुक्ति पाओ
    beautiful poem

    उत्तर देंहटाएं
  39. हकीकत की पटरियों पर चलते फिरते कवि भी मिल जाते हैं कभी ...
    कुमार विश्वास जी की सक्रियता देखी जा सकती है इन दिनों !
    सार्थक आह्वान !

    उत्तर देंहटाएं
  40. एक सीमित सा आकाश
    जिसमें वो जीता है मरता है
    कलाकार होने का दावा करता है
    आम आदमी की जमात से ऊपर उठ के
    बुद्धिजीवी होने का दावा

    सशक्त रचना..... आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  41. ईमानदार अभिव्यक्ति .......... :)
    इस मंथन ने आयाम लिया है, इस का मतलब आने वाले दिनों में आप बड़ा धमाका करने वाले हैं| आय एम श्योर|
    आप की धमाकेदार पोस्ट का इंतज़ार रहेगा|

    उत्तर देंहटाएं
  42. बहुत सधे शब्दों में कवि मन को ...सबके सामने रख दिया है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  43. आपकी इस रचना का जवाब नहीं...बेमिसाल...

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  44. सुनो कवि
    अपने आप को रिक्त करो
    मान्यताएं, विचारधारा
    अपनी पसंद के शब्दों का दायरा तोड़ो
    ये कारा तोड़ो
    सत्य को सत्य की नज़र से देखो
    अपने केनवास के किनारे तोड़ो
    पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
    सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
    तो कवि धर्म निभाओ
    अपने आप से मुक्ति पाओ

    वाह! बहुत खूब.
    बहुत खूबसूरती से कवि का अंतर्द्वंद प्रस्तुत किया है आपने.

    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  45. सुनो कवि
    अपने आप को रिक्त करो
    मान्यताएं, विचारधारा
    अपनी पसंद के शब्दों का दायरा तोड़ो
    ये कारा तोड़ो
    सत्य को सत्य की नज़र से देखो
    अपने केनवास के किनारे तोड़ो
    पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
    सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
    तो कवि धर्म निभाओ
    अपने आप से मुक्ति पाओ
    bahut sunder bhav
    sunder shabd ke sath
    badhai
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  46. सत्य को सत्य की नज़र से देखो
    अपने केनवास के किनारे तोड़ो
    पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
    सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं

    ....बहुत सच कहा है..गहन चिंतन को समाये बहुत सार्थक अभिव्यक्ति..

    उत्तर देंहटाएं
  47. "पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
    सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
    तो कवि धर्म निभाओ
    अपने आप से मुक्ति पाओ"

    ...बहुत सुन्दर...

    उत्तर देंहटाएं
  48. "पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
    सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
    तो कवि धर्म निभाओ
    अपने आप से मुक्ति पाओ"

    ...बहुत सुन्दर...

    उत्तर देंहटाएं
  49. सार्थक अभिव्यक्ति..बहुत सुन्दर...

    उत्तर देंहटाएं
  50. hi digambar,
    khubsurat gehre rachna,ek lekhak/kavi ke asem kalpanashakti ko ujagar karte hue sundar panktiya,
    aapka samarthak ban rha hun,hindi kavita likhne ke suruwat kar rha hun,apse sekhne ka prayas karunga,
    subhkamnia,
    Rohit

    उत्तर देंहटाएं
  51. चुनाव तो करना ही है.. मुर्दा इतिहास और जिन्दा कवि में .

    उत्तर देंहटाएं
  52. अनुभूतियों को पूर्ण अभिव्यक्ति मिल जाने से बडा कोई सुख नही । वही सच्ची मुक्ति है पर सबसे दुर्लभ भी । अच्छी कविता ।

    उत्तर देंहटाएं
  53. क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनायें !
    मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  54. बहुत ही अच्‍छी अभिव्यक्ति .....

    उत्तर देंहटाएं
  55. मेरे विचार सं कवि सत्य को ही देखता और कहता है।
    लेकिन लगता है कि यह कविता भी सच्चाई का ही बयान कर रही है।

    उत्तर देंहटाएं
  56. हाँ ताउम्र हम एक ही बात कहते रहते हैं बात वही होती है अंदाज़े बयाँ फर्क लेखक को इसी खोल से बाहर आ दुनिया को जैसी वह है उसी दुनियावी नजर से देखने को प्रेरित करती पोस्ट .बधाई .बड़े दिन मुबारक .आपकी टिप्पणियाँ हमारी धरोहर हैं .

    उत्तर देंहटाएं
  57. आपका चिंतन ग़ज़ब का है भाई.

    उत्तर देंहटाएं
  58. कवि तो मैक्रोस्कोप से सूक्ष्म कीटाणू पकड़ने का प्रयास करता है :)

    उत्तर देंहटाएं
  59. बहुत ही सुंदर भावों का प्रस्फुटन देखने को मिला है । मेरे नए पोस्ट उपेंद्र नाथ अश्क पर आपकी सादर उपस्थिति की जरूरत है । धन्यवाद ।

    उत्तर देंहटाएं
  60. सुनो कवि
    अपने आप को रिक्त करो
    मान्यताएं, विचारधारा
    अपनी पसंद के शब्दों का दायरा तोड़ो
    ये कारा तोड़ो
    सत्य को सत्य की नज़र से देखो
    अपने केनवास के किनारे तोड़ो
    पसंदीदा रंगों से मोह छोडो
    सुना है इतिहास के साक्ष्य कविता में मिलते हैं
    तो कवि धर्म निभाओ
    अपने आप से मुक्ति पाओ
    प्रेरणादाई,सुन्दर अभिव्यक्ति
    v7: स्वप्न से अनुराग कैसा........

    उत्तर देंहटाएं
  61. सुनो कवि
    अपने आप को रिक्त करो
    मान्यताएं, विचारधारा

    जब एक कवि सभी मान्यताओं से
    रिक्त होकर जो कुछ सृजन करता है
    निसंदेह सुंदर होता है !
    सुंदर रचना अर्थपूर्ण है !

    उत्तर देंहटाएं
  62. सत्य को सत्य की नज़र से देखो
    अपने केनवास के किनारे तोड़ो
    पसंदीदा रंगों से मोह छोडो

    आपका ब्लॉग मेरे लिए मंदिर के सामान है...जब भी आती हूँ..आशीर्वाद और प्रेरणा मिलती है

    उत्तर देंहटाएं

आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है ...