बुधवार, 21 मार्च 2012

हाथ में पहले तो खंजर दे दिया ...

हाथ में पहले तो खंजर दे दिया
फिर अचानक सामने सर दे दिया

ले लिए सपने सुनहरी धूप के
और फिर खारा समुन्दर दे दिया

एक बस फरमान साहूकार का
छीन के घर मुझको छप्पर दे दिया

लहलहाती फसल ले ली सूद में
जोतने को खेत बंजर दे दिया

नौच खाया जिस्म सबके सामने
चीथडा ढंकने को गज भर दे दिया

चाकुओं से गोद कर इस जिस्म को
खुदकशी का नाम दे कर दे दिया

तोड़ दूंगा कांच सारे शहर के
हाथ में क्यूँ फिर से पत्थर दे दिया

83 टिप्‍पणियां:

  1. खोल दिया सारे राज को जो किसी ने कलम दे दिया आपके हाथो में..अति सुन्दर सृजन..

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  2. बेहतरीन ग़ज़ल, मन को छूती हुयी।

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  3. क्या खूब अभिव्यक्ति है सोच की, दिगम्बर जी! बेहतरीन..

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  4. जबरदस्त प्रस्तुति ।

    चुन चुन वे साजा किये, अपने सपने रोज ।

    चुनचुनाना सौंपते, इधर उधर से खोज ।।

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  5. शानदार प्रस्तुति, व्यवस्था के प्रति दिल की कशमशाहट !

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  6. लहलहाती फसल ले ली सूद में
    जोतने को खेत बंजर दे दिया

    नौच खाया जिस्म सबके सामने
    चीथडा ढंकने को गज भर दे दिया

    चाकुओं से गोद कर इस जिस्म को
    खुदकशी का नाम दे कर दे दिया

    आह, जिंदगी का सच को इतनी खूबसूरती से भी कहा जा सकता है ।

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  7. नौच खाया जिस्म सबके सामने
    चीथडा ढंकने को गज भर दे दिया waah kya baat kahi hai

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  8. बहुत सुंदर रचना ...
    शुभकामनायें आपको !

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  9. तोड़ दूंगा कांच सारे शहर के
    हाथ में क्यूँ फिर से पत्थर दे दिया
    .........waah kya baat hai ......sab kuch kah diya khanjar ke saath sar bhi de diya ....aapke haantho me thami kalam ne sara pardafash kar diya ............jabarjast

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  10. वाह!!!

    बहुत खूबसूरत गज़ल...

    ले लिए सपने सुनहरी धूप के
    और फिर खारा समुन्दर दे दिया

    सभी शेर एक से बढ़कर एक.......
    सादर.

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  11. तोड़ दूंगा कांच सारे शहर के
    हाथ में क्यूँ फिर से पत्थर दे दिया………सोचने को विवश करती शानदार गज़ल्।

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  12. चाकुओं से गोद कर इस जिस्म को
    खुदकशी का नाम दे कर दे दिया .waah sir...

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  13. hmm...तोड़ दूंगा कांच सारे शहर के
    हाथ में क्यूँ फिर से पत्थर दे दिया...:)

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  14. वाह बहुत खूब ...बढ़िया शेर हैं ...

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  15. एक बस फरमान साहूकार का
    छीन के घर मुझको छप्पर दे दिया
    ज़िन्दगी के अप विकासी ,प्रति गामी -चित्रों को ,आपने क्यों ग़ज़ल नाम दे दिया ?

    कोई अशआर 'विशेष आर्थिक क्षेत्र 'स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन 'पर व्यंग्य है कोई बलात्कारी व्यवस्था पर ,रेप पर .
    ज़िन्दगी के अप विकासी ,प्रति गामी -चित्रों को ,आपने क्यों ग़ज़ल नाम दे दिया ?

    कोई अशआर 'विशेष आर्थिक क्षेत्र 'स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन 'पर व्यंग्य है कोई बलात्कारी व्यवस्था पर ,रेप पर .

    आज का सारा फरेब और मक्कारी का अनुरूपण आपकी ग़ज़लों में है .

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  16. एक बस फरमान साहूकार का
    छीन के घर मुझको छप्पर दे दिया

    लहलहाती फसल ले ली सूद में
    जोतने को खेत बंजर दे दिया

    सामाजिक विषमताओं का वर्णन करती सुन्दर ग़ज़ल .
    बहुत बढ़िया .

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  17. जीवन के समस्त द्वंद्व इस गज़ल में उतर आये हैं.. खंजर-सिर, धूप-समंदर, घर-छप्पर, फसल-बंजर, कांच-पत्थर... बहुत खूबसूरती से पूरे विरोधाभास को दर्शाया है अपने अशार में!! धन्यवाद!

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  18. बेहतरीन ग़ज़ल... हर शेर मुक्कमल है... अंतिम शेर सबसे प्रभावशाली...

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  19. बेहद खुबसूरत बन गई है यह ग़ज़ल...

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  20. "ले लिए सपने सुनहरी धूप के
    और फिर खारा समुन्दर दे दिया"
    वाह ! बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति !

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  21. ले लिए सपने सुनहरी धूप के
    और फिर खारा समुन्दर दे दिया

    बेहतरीन ग़ज़ल...

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  22. आपकी नजर ने इतनी सारी विसंगतियों को इस सुँदर ग़ज़ल में पिरो दिया है . सुँदर .

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  23. ले लिए सपने सुनहरी धूप के
    और फिर खारा समुन्दर दे दिया

    बेहतरीन शेर....बेहतरीन ग़ज़ल ....

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  24. जीवन के अनेक द्वंदों से गुजरती गजल.
    बहुत खूब.

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  25. बहुत सुन्दर प्रस्तुति............

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  26. नमस्कार नसवा जी !
    बेहद खुबसूरत ग़ज़ल
    मैं ब्लॉग जगत में नया हूँ मेरा मार्ग दर्शन करे
    http://rajkumarchuhan.blogspot.in

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  27. बेहतरीन ग़ज़ल सर... वाह! सभी शेर दिल तक जाते हैं....
    सादर बधाई.

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  28. वाह: बहुत ही शानदार ग़ज़ल... बधाई..

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  29. समाज में व्याप्त असंतोष के
    प्रति आक्रोश गज़ल में उभर
    कर आया है।
    सुन्दर प्रस्तुति।
    धन्यवाद।

    आनन्द विश्वास।

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  30. behtareen prastuti.हिन्दू नव वर्ष की शुभकामनायें .

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  31. ले लिए सपने सुनहरी धूप के
    और फिर खारा समुन्दर दे दिया

    लहलहाती फसल ले ली सूद में
    जोतने को खेत बंजर दे दिया

    क्या बात है सर !! बहुत उम्दा !!प्रेमचंद के किरदार सजीव हो गए आप के अश’आर में

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  32. ग़ज़ल के भाव कटाक्ष हैं परिस्थितियों पर।

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  33. ले लिए सपने सुनहरी धूप के
    और फिर खारा समुन्दर दे दिया

    बहुत खूबसूरत गजल ...

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  34. जाने क्या क्या कह गए खुद ही जनाब
    हम ज़रा बोले तो बाहर कर दिया !!


    बेहतरीन ग़ज़ल...
    हर शेर मुक्कमल !!

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  35. जन जागृति में सहायक एवं क्राँति के लिये उद्देलित करती रचना की प्रस्तुति के लिये बधाई....

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  36. नौच खाया जिस्म सबके सामने
    चीथडा ढंकने को गज भर दे दिया
    इन पंक्तियों का आक्रोश हतप्रभ करता है !

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  37. जितना तकलीफ़देह सच उतनी ही खूबसूरत कविता!

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  38. वाह! बेहतरीन अंदाज़ !
    शुभकामनाएँ!

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  39. प्रस्तुती मस्त |
    चर्चामंच है व्यस्त |
    आप अभ्यस्त ||

    आइये
    शुक्रवारीय चर्चा-मंच
    charchamanch.blogspot.com

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  40. बहुत खूबसूरत हर शेर ..वाह



    जिसे कहते हैं हम
    प्रेम का समुद्र ,
    आदि ना इस किनारे का
    और अंत ना
    उस किनारे का |.......अनु

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  41. SEEDHE - SAADE SHABDON MEIN GAZAL
    KE SABHEE SHERON KEE BHAVBHIVYAKTI
    MAN KO ATYANT CHHOOTEE HAI . BADHAAEE
    AUR SHUBH KAMNA .

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  42. सामायिक अनमोल रत्न ! बहुत सुन्दर !

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  43. लहलहाती फसल ले ली सूद में
    जोतने को खेत बंजर दे दिया

    बहुत बढिया है

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  44. तोड़ दूंगा कांच सारे शहर के
    हाथ में क्यूँ फिर से पत्थर दे दिया
    lajavab sher bahut sunder
    rachana

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  45. digambar ji vakai bahut hi achhi gajal likhi hai apne ...N R H M ghotale me hui dactor ki maut ki yad taja kr di apne....bahut bahut badhai deta hoon ..

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  46. नौच खाया जिस्म सबके सामने
    चीथडा ढंकने को गज भर दे दिया .

    बहुत शानदार.

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  47. लहलहाती फसल ले ली सूद में
    जोतने को खेत बंजर दे दिया very touching......

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  48. सार्थक पोस्ट ..!
    नवसंवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  49. तोड़ दूंगा कांच सारे शहर के
    हाथ में क्यूँ फिर से पत्थर दे दिया

    एक खूबसूरत ग़ज़ल का खूबसूरत शेर।
    बहुत बढि़या।

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  50. क्या बात है नासवा जी
    बेहतरीन ग़ज़ल शेर दिल को छु जाते हैं....

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  51. नव संवत्सर की सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  52. बहुत मस्त गज़ल बन पड़ी है भाई...बधाई !

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  53. विषमताओं को दर्शाते सभी शेर एक से बढ़कर एक...लाजवाब!

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  54. नौच खाया जिस्म सबके सामने
    चीथडा ढंकने को गज भर दे दिया

    ....बहुत ख़ूबसूरत गज़ल...हरेक शेर दिल को छू जाता है...

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  55. सुभानाल्लाह बहुत खुबसूरत ग़ज़ल.......दाद कबूल करें।

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  56. वाह ! ! बहुत खूब ....

    "लहलहाती फसल ले ली सूद में
    जोतने को खेत बंजर दे दिया "

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  57. तोड़ दूंगा कांच सारे शहर के
    हाथ में क्यूँ फिर से पत्थर दे दिया

    हर शेर....सवा शेर..किसे रखें किसे छोड़ें..मतला के बाद सब के सब सामयिक मुद्दों पर केंद्रित...मुबारक हो..

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  58. ले लिए सपने सुनहरी धूप के
    और फिर खारा समुन्दर दे दिया
    vaah kya baat hai sundar....

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  59. एक बस फरमान साहूकार का
    छीन के घर मुझको छप्पर दे दिया ...

    वाह !! ... सभी शेर कमाल के हैं ... ये बहुत पसंद आया ...

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  60. आसान भाषा में तीखे शेर कहना कोई आपसे सीखे. बहुत खूब.

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  61. हाथ में पहले तो खंजर दे दिया
    फिर अचानक सामने सर दे दिया


    -बहुत खूब!!

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  62. हर एक शेर ऐसा है कि तारीफ के लिये शब्द ही नहीं मिल पा रहे हैं.
    चित्र सारे हो गये साकार सब
    बेबसी को आपने स्वर दे दिया.

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  63. एक बस फरमान साहूकार का
    छीन के घर मुझको छप्पर दे दिया
    praasangik bhaarat ke sandarbh me saarvkaalik ,contemporary and universal in the context of India.

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  64. बहुत उम्दा ग़ज़ल, दाद स्वीकारें.

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  65. देर से आने पर क्षमा...इस बेजोड़ ग़ज़ल के हर शेर के लिए ढेरों दाद कबूल करें

    नीरज

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  66. आपकी हर कविता दूसरे पर भारी है .....बहुत सुन्दर भाव संयोजन ...बेहतरीन !!!

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है