मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

जिंदगी से रौशनी उस दिन निकल गई ...


धूप मेरे हाथ से जब से फिसल गई 
जिंदगी से रौशनी उस दिन निकल गई  

नाव साहिल तक वही लौटी है आज तक 
रुख हवा का देख जो रस्ता बदल गई 

मुद्दतों के बाद जो बेटा मिला उन्हें     
देखते ही देखते सेहत संभल गई 

दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता 
फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई 

वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया 
चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई 

लिख तो लेता मैं भी कितने शैर क्या कहूं 
काफिया अटका बहर भटकी गज़ल गई 

लोग हैं मसरूफ अंदाजा नहीं रहा   
चुटकले मस्ती ठिठोली फिर हजल गई    

73 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन दर्शन भरा है इस गज़ल में.. बहुत सुद्नर.. हर शेर जानदार हैं खास तौर पर बच्चो के तबियत मचलने वाला शेर दिल को छू गया...

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  2. धूप मेरे हाथ से जब से फिसल गई
    जिंदगी से रौशनी उस दिन निकल गई

    सुन्दर भावो को प्रस्तुत करती शानदार गज़ल

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  3. दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबियत मचल गई
    वाह!
    बेहद सुन्दर ग़ज़ल!
    सादर!

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  4. लिख तो लेता मैं भी कितने शेर क्या कहूं
    काफिया अटका बहर भटकी गज़ल गई
    अपने साथ तो हमेशा यही होता है :)
    पर आपकी गज़ल शानदार है.

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  5. गज़ब का मतला कह डाला हा भाई दिगंबर नासवा जी. यह अपने आप में पूरी ग़ज़ल है. हमेशा की तरह लाजवाब ग़ज़ल....मुबारक हो...

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  6. दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबियत मचल गई

    जिंदगी हर सुख की कीमत मांगती है...यहाँ कुछ भी ऐसे ही नहीं मिलता जो मिलता है उसकी लोगों के लिये कोई कीमत नहीं, बहुत सुंदर गजल!

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  7. वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया
    चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई

    बहुत बढ़िया ,हर शेर लाजवाब है

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  8. नाव साहिल तक वही लौटी है आज तक
    रुख हवा का देख जो रसता बदल गई
    लिख तो लेता मैं भी कितने शेर क्या कहूं
    काफिया अटका बहर भटकी गज़ल गई
    नासवा साहब रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं .साहिल तक नाव वाही लौटी जो रुख हवाओं का भांप गई बहत करीबी बात ज़िन्दगी के .

    टंकड़ की अ - शुद्धि(यदि है तो ) रस्ता कर लें 'रसता' को ,और भाईसाहब शैर कर लें ,'शेर' छप गया है .आदाब .आपकी टिपण्णी स्पैम बोक्स से निकालता रहता हूँ एक आदि और भी साथ में निकल आती है .

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  9. खुबसूरत शेर है सारे .....शायद ये टाइपिंग की गलतियाँ हैं ।

    रसता - रास्ता / रस्ता
    तबियत - तबीयत

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  10. जीवन के रंगों से सजी पंक्तियाँ।

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  11. लिख तो लेता मैं भी कितने शेर क्या कहूं
    काफिया अटका बहर भटकी गज़ल गई
    वाह ... बहुत खूब।

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  12. वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया
    चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई
    बात का खूबसूरत अंदाज़. बहुत सुंदर ग़ज़ल.

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  13. बहुत सुन्दर गजल!....बहुत सुन्दर मनोभाव!

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  14. धूप मेरे हाथ से जब से फिसल गई
    जिंदगी से रौशनी उस दिन निकल गई
    ...bahut sunder gajal .badhai

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  15. दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई ... बच्चे क्या बड़े भी कुछ ऐसे ही होते हैं ... :)

    धूप मेरे हाथ से जब से फिसल गई
    जिंदगी से रौशनी उस दिन निकल गई ... उम्दा ग़ज़ल ...

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  16. मुद्दतों के बाद जो बेटा मिला उन्हें
    देखते ही देखते सेहत संभल गई
    बहुत खूबसूरत अंदाज़... सुन्दर गजल नासवा जी

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  17. वाह! कहीं ऐसा तो नहीं कि आप जो बोलते हैं वही शेर हो जाता हो!!

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  18. नाव साहिल तक वही लौटी है आज तक
    रुख हवा का देख जो रस्ता बदल गई

    मुद्दतों के बाद जो बेटा मिला उन्हें
    देखते ही देखते सेहत संभल गई

    दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई

    बहुत सुन्दर शेर ...शब्द नहीं मेरे पास .....

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  19. वाह बहुत खूब ......


    ले रहे थे लोग जायजा हवाओं का
    दिशाएँ अलग थी मगर तासीर नहीं बदली ||..अनु

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  20. वाह वाह...........

    बहुत बढ़िया गज़ल........
    हर रंग का शेर....

    दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई

    वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया
    चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई

    लाजवाब!!!
    अनु

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  21. वाह वाह...........

    बहुत बढ़िया गज़ल........
    हर रंग का शेर....

    दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई

    वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया
    चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई

    लाजवाब!!!
    अनु

    जवाब देंहटाएं
  22. वाह वाह...........

    बहुत बढ़िया गज़ल........
    हर रंग का शेर....

    दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई

    वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया
    चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई

    लाजवाब!!!
    अनु

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  23. वाह वाह...........

    बहुत बढ़िया गज़ल........
    हर रंग का शेर....

    दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई

    वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया
    चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई

    लाजवाब!!!
    अनु

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  24. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बुधवारीय चर्चा-मंच
    पर है |

    charchamanch.blogspot.com

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  25. नाव साहिल तक वही लौटी है आज तक
    रुख हवा का देख जो रस्ता बदल गई

    वाह ! क्या बात कही है। बेहतरीन ग़ज़ल नासवा जी ।

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  26. ग़ज़ल का हर शेर लाजवाब है!
    बहुत उम्दा प्रस्तुति!

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  27. बढ़िया गज़ल...लाजवाब शेर!!

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  28. इस सुनहरी धूप में कुछ देर बैठा कीजिए ....

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  29. लिख तो लेता मैं भी कितने शैर क्या कहूं
    काफिया अटका बहर भटकी गज़ल गई.

    फिर खूबसूरत अंदाज़ में बेहतरीन गज़ल.

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  30. मुद्दतों के बाद जो बेटा मिला उन्हें
    देखते ही देखते सेहत संभल गई

    Bahut Sunder...

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  31. जबरदस्त अभिवयक्ति.....वाह!

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  32. पहला शेर ही इतना लाजवाब है कि क्या कहें...
    हर शेर मुकम्मल....
    बढ़िया गजल..॥

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  33. नाव साहिल तक वही लौटी है आज तक
    रुख हवा का देख जो रस्ता बदल गई

    लाजवाब गजल ॥बहुत खूब

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  34. हमेशा की तरह बेहतरीन प्रस्तुति....

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  35. बहुत बढ़िया
    हर शेर लाजवाब है

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  36. मुद्दतों में पढ़ा आपका मुद्दतों तक याद रहा :)
    क्या लिखते हैं भाई! सही शब्द नहीं मिलते प्रशंसा के...
    घिसे पिटे शब्दों का इस्तेमाल करने का मन नहीं होता

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  37. har sher behad satik aur real si hai...bahut pasand aayi!!!

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  38. उम्मीद की रौशनी का दामन थामे रहना चाहिए...वर्ना जिंदगी हाथ से पिसल सकती है...बहुत ही उम्दा ग़ज़ल...

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  39. आपकी सुन्दर प्रस्तुति पढकर मन प्रसन्न हो गया है.
    उम्दा भाव पिरोयें हैं आपने.

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  40. मुद्दतों के बाद जो बेटा मिला उन्हें
    देखते ही देखते सेहत संभल गई

    जि़ंदगी के कई रूप, कई रंग।
    बेहतरीन ग़ज़ल।

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  41. लिख तो लेता मैं भी कितने शैर क्या कहूं
    काफिया अटका बहर भटकी गज़ल गई !
    ग़ज़ल कहाँ भटकी , बल्कि और निखर गयी !

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  42. नासवा जी
    अच्छी ग़ज़ल कही..... इन शेरों को कई बार पढने का जी चाहा.....!

    दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई

    वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया
    चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई
    वाह वाह उम्दा.....

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  43. दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबियत मचल गई
    ...सच दाम तो माँ बाप को पता होता है और वह अपना पर्स देखते है पर बच्चे ..कुछ ना पूछो ...
    बहुत बढ़िया अपनी सी कविता ...

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  44. नाव साहिल तक वही लौटी है आज तक
    रुख हवा का देख जो रस्ता बदल गई......sahi kahe....

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  45. फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई

    प्यारी रचना के लिए आभार नासवा जी !

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  46. वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया
    चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति // बेहतरीन गजल //

    MY RECENT POST ....काव्यान्जलि ....:ऐसे रात गुजारी हमने.....

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  47. हर शेर मर्म को छू अपने रंग में रंग जाती है...

    बेहतरीन ग़ज़ल...वाह !!!!

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  48. लिख तो लेता मैं भी कितने शैर क्या कहूं
    काफिया अटका बहर भटकी गज़ल गई

    theek kaha bhai!!

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  49. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से शुभकामनाएँ।

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  50. नाव साहिल तक वही लौटी है आज तक
    रुख हवा का देख जो रस्ता बदल गई

    ...गहन जीवन दर्शन को संजोये बेहतरीन गज़ल...

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  51. शानदार प्रस्तुति ,
    वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया
    चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई
    ,एक और ग़ज़ल का इंतज़ार , . ..कृपया यहाँ भी पधारें -
    शनिवार, 5 मई 2012
    चिकित्सा में विकल्प की आधारभूत आवश्यकता : भाग - १
    चिकित्सा में विकल्प की आधारभूत आवश्यकता : भाग - १

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  52. नाव साहिल तक वही लौटी है आज तक
    रुख हवा का देख जो रस्ता बदल गई
    ........बेहतरीन !

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  53. दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई

    बहुत खूबसूरत गज़ल का बड़ा ही प्यारा शेर..
    वाह !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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  54. दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई
    अनुभव का एक दायरा फलसफा -ए - ज़िन्दगी लिए रहतीं हैं आपकी ग़ज़लें .

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  55. दाम होते हैं किसी बच्चे को क्या पता
    फिर खिलौना देख के तबीयत मचल गई
    अनुभव का एक दायरा फलसफा -ए - ज़िन्दगी लिए रहतीं हैं आपकी ग़ज़लें .

    जवाब देंहटाएं
  56. मुद्दतों के बाद जो बेटा मिला उन्हें
    देखते ही देखते सेहत संभल गई
    बहुआयामी गज़ल .. बहुत सुन्दर

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  57. धूप मेरे हाथ से जब से फिसल गई
    जिंदगी से रौशनी उस दिन निकल गई

    sach kaha....dhoop ko pakad k kaida bhi karna chaaho to vo kaha rukegi..

    sunder prastuti.

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  58. वो मेरे पहलू में आए दिन निकल गया
    चाँद पहले फिर अचानक रात ढल गई

    और फिर मुई सुबह हुयी ? क्यों शायर साहिब ?? :)

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है