सोमवार, 24 दिसंबर 2012

एहसास ...


मेरे लिए खुशी का दिन 
और तुम्हारे लिए ... 

सालों बाद जब पहली बार घर की देहरी से बाहर निकला 
समझ नहीं पाया था तुम्हारी उदासी का कारण 

हालांकि तुम रोक लेतीं तो शायद रुक भी जाता 

या शायद नहीं भी रुकता ... 

पर मुझे याद है तुमने रोका नहीं था 
(वैसे व्यक्तिगत अनुभव से देर बाद समझ आया, 
माँ बाप तरक्की में रोड़ा नहीं डालते) 

सच कहूं तो उस दिन के बाद से   
अचानक यादों का सैलाब सा उमड़ आया था जेहन में 
गुज़रे पल अनायास ही दस्तक देने लगे थे  
हर लम्हा फांस बनके अटकने लगा था 
जो अनजाने ही जिया था सबके और तेरे साथ 

भविष्य के सपनों पर कब अतीत की यादें हावी हो गयीं   
पता नहीं चला  

खुशी के साथ चुपके से उदासी कैसे आ जाती है 
तब ही समझ सका था मैं 

जानता हूं वापस लौटना आसान था 
पर खुद-गर्जी ... या कुछ और ...

बहरहाल ... लौट नहीं पाया उस दिन से ... 

आज जब लौटना चाहता हूं 
तो लगता है देर हो गई है ... 

और अब तुम भी तो नहीं हो वहां ... माँ ...   

65 टिप्‍पणियां:

  1. आज जब लौटना चाहता हूं
    तो लगता है देर हो गई है ...

    ओर अब तुम भी तो नहीं हो वहां ... माँ ...
    ....बहुत देर बाद समझ आती है वे बातें जो कभी अपनों ने समझाई होती हैं फिर यूँ ही कब समय निकल गया और फिर कितनी देर हुयी..बार-बार जेहन में आता है ...और फिर वे बातें माँ ने कही तो वह कभी न भूलने वाली होती हैं ....गले में कुछ अटका-अटका सा लगता है ....बीतें यादों से निकली सार्थक प्रस्तुति ..आभार..

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  2. आज जब लौटना चाहता हूं
    तो लगता है देर हो गई है ...

    ओर अब तुम भी तो नहीं हो वहां ... माँ ...
    माँ के पास ना होने का गम ... मन को यूँ ही सालता रहता है
    मन को छूते शब्‍द ...
    सादर

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  3. एक बिछंडने का सा एहसास
    दिल को सताए,
    शायद यही तो प्यार हैं !

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  4. माँ जहाँ भी रहती है , वो ही घर है और बार बार घर आने का एक कारण भी होता है लेकिन वह एक बार जाती है तो वहां के सरे बहाने ख़त्म हो जाते हैं . जाएँ भी तो हर जगह उनके रहने उठाने बैठने की होती है बहुत याद दिलाती है। भाव बहुत गहरे से निकले हैं।

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  5. दुनियां भर का सरमाया
    माँ..इन दो शब्दों में समाया !!!

    खुश रहें!

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  6. पता नहीं क्यों ,पर ऐसे एहसास बहुत देर से ही आते हैं ....

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  7. बहुत गहरे भाव मन को छूते शब्‍द सुंदर रचना...

    पहली बार घर की देहरी से बहर(बाहर)निकला,,,,

    recent post : समाधान समस्याओं का,

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  8. जब तक माँ बाप रहते हैं तब तक ही तो घर लौट जाने की चाह बनी रहती है .... देरी का एहसास भी जाने के बाद ही होता है ... भाव पूर्ण अभिव्यक्ति

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  9. "आज जब लौटना चाहता हूं
    तो लगता है देर हो गई है ...

    ओर अब तुम भी तो नहीं हो वहां ... माँ ..."

    बहुत ही गहरा और दिल को छू जाने वाला लिखा है सर!

    सादर

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  10. अतीत के सुखद प्रसंगों की याद से उभरी आनंद और विषाद की मिश्रित भावना अभिव्यक्त हुई है इस पोस्ट

    में .यादों का गुबार कुछ ऐसा ही होता है खासकर जब वह माँ से जुड़ी हों .गृह आतुरता आई है रचना में

    अतीत के झरोखे से . ये होता तो वह होता .कृपया शुद्ध रूप और ,बहरहाल लिख लें .शुक्रिया आपकी सद्य

    टिप्पणियों का .

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  11. अतीत के सुखद प्रसंगों की याद से उभरी आनंद और विषाद की मिश्रित भावना अभिव्यक्त हुई है इस रचना में इसे ही कहतें हैं गृह आतुरता .कृपया बहरसूरत और और लिखें कविता में .आभार

    आपकी सद्य टिप्पणियों का .

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  12. अतीत के सुखद प्रसंगों की याद से उभरी आनंद और विषाद की मिश्रित भावना अभिव्यक्त हुई है इस रचना में इसे ही कहतें हैं गृह आतुरता .कृपया बहरसूरत और और लिखें कविता में .आभार

    आपकी सद्य टिप्पणियों का .

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  13. भाई साहब टिपण्णी स्पेम में गईं हैं कई .निकालें .

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  14. जानता हूं वापस लौटना आसान था
    पर खुद-गर्जी ... या कुछ ओर ...

    बारहाल ... लौट नहीं पाया उस दिन से ..

    digambar ji vakai ye rachana dil ko chho gayee ....abhar.

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  15. आज जब लौटना चाहता हूं
    तो लगता है देर हो गई है ...

    बहुत ही खुबसुरत भाव है.

    सादर.

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  16. आज जब लौटना चाहता हूं
    तो लगता है देर हो गई है ...

    द्विविधा और एक मुश्किल निर्णय जिसे लेने में जितनी देर होती है उतनी ही कठिनाई बढाती जाती है.

    वैसे भी बेटे और माँ का रिश्ता बहुत भावनात्मक होता ऐसी ही है यह बेहद भावनात्मक प्रस्तुति.

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  17. आज जब लौटना चाहता हूं
    तो लगता है देर हो गई है ...

    ओर अब तुम भी तो नहीं हो वहां ... माँ ...

    ....आँखें नम कर गयी भावपूर्ण अभिव्यक्ति..

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  18. माँ नहीं रहीं तो सचमुच देर हो गई और हकीकत के धरातल पर उतरें तो लौटने का कोई औचित्य भी नहीं - भाव विह्वल करती रचना पढवाने के लिए आभार - सादर

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  19. माँ हमेशा बच्चों के साथ रहती है,वे भले दूर हो जाँय।

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  20. जिंदगी की ज़रूरतें घर , गाँव और देश छुड़ा देती हैं। लेकिन वक्त कभी ठहरता नहीं।

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  21. आपकी कविताओं में माँ के कितने सारे शेड हैं और हर शेड उनकी ऐसी कमी दिखा देता है जो कभी भरी नहीं जा सकती।

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  22. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  23. आज जब लौटना चाहता हूं
    तो लगता है देर हो गई है ...

    पश्चाताप कोई समाधान तो नहीं है नासवा जी,
    हर मनुष्य हालात के आगे मजबूर होता है
    इस दुःख की घडी को भी संपूर्णता में जीकर देखिये !

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  24. गया वक़्त कभी लौटकर नहीं आता... भावपूर्ण रचना

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  25. स्मृतियाँ तो फिर भी वहाँ रहेंगी, संबल वही हैं।

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  26. कई बातें तब तक समझ ही नहीं आती जब तक हम स्वयं उन अनुभवों से या उस उम्र से नहीं गुज़रते .अच्छी रचना.

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  27. गुज़रा वक्त कभी लौटता नहीं ,अपने स्मृति-चिह्न छोड़ जाता है बस!

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  28. आज जब लौटना चाहता हूं
    तो लगता है देर हो गई है ...
    ओर अब तुम भी तो नहीं हो वहां ... माँ ...

    बहुत ही भावपूर्ण...माँ वहाँ से सदा के लिए करीब आ गईं

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  29. बहरहाल ... लौट नहीं पाया उस दिन से ...

    ये वो कच्चे धागे हैं जो वक़्त के साथ मजबूत और मजबूत होते चले जाते हैं

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  30. अपना देश छोड़कर गए प्रत्‍येक व्‍यक्ति को एक दिन यही आभास होगा कि अब देर हो गयी है। उसके पास पछतावे के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं होगा। अच्‍छी अभिव्‍यक्ति है।

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  31. परिंदों को ऊंची उडान के लिये बसेरा छोडना ही पडता है, बहुत गहन अभिव्यक्ति, शुभकामनाएं.\

    रामराम.

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  32. जो वक्त हाथ से निकल गया वो कब वापस आता है एक मलाल रह जाता है बस!
    अपनी मिट्टी से दूर रहते हुए भी माँ की याद और उनका आशीर्वाद हमेशा साथ रहा होगा और रहेगा.

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  33. गया हुआ वक़्त वापस नहीं आता ..बेहतरीन तरीके से व्यक्त हुई है यह रचना

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  34. अगर रोकने पर कोई रुक जाता तो आज अकेले रहने वाले माँ-बाप ...अकेले नहीं होते

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  35. बहुत गहन अभिव्यक्ति
    ...रचना पढवाने के लिए आभार !!

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  36. ओह ,अब लौटना भी नसीब कहाँ?

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  37. अतीत के सुखद प्रसंगों की याद से उभरी आनंद और विषाद की मिश्रित भावना अभिव्यक्त हुई है इस रचना में इसे ही कहतें हैं गृह आतुरता .कृपया बहरसूरत और 'ओर 'को और लिखें कविता में

    .आभार

    आपकी सद्य टिप्पणियों का अतिरिक्त आभार .आपकी टिप्पणियाँ हमारी धरोहर हैं . कृपया ओर को और ज़रूर कर लें कविता में .

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  38. शुक्रिया वीरेंद्र जी ... आपकी प्रखर दृष्टि से हम लाभान्वित होते हैं.

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  39. बहुत देर हो गई है
    और अब तुम भी तो नही हो माँ ।


    बहुत भावभीनी प्रस्तुति ।

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  40. यही एहसास तो हरदम कचोटता है, न बसने देता है न लौटने देता है.

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  41. माँ-बाप के रोकने से कोई रुक तो नहीं जाता...ज़िन्दगी की परिपाटी है जो हम अपने माँ-बाप से पाते हैं...उसे उन्हें तो नहीं पर अपने बच्चों को लौटाते हैं...खुदगर्जी का अपराधबोध उचित नहीं...

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  42. जानता हूं वापस लौटना आसान था
    पर खुद-गर्जी ... या कुछ (ओर) ... या कुछ और ...........

    शुक्रिया आपकी प्रखर टिपण्णी का .

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  43. माँ तो नहीं है पर माँ का आशीर्वाद अपने बच्चों पर
    हमेशा रहता है..
    बेहद भावपूर्ण रचना...

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  44. ’अहसास’ ज़िंदगी है—कुछ अहसास खुशी देते हैं तो कुछ अनंत पीडाओं को
    जन्म देते हैं. जीवन विरोधाभाषाओं से बुना एक इंद्रधनुष है—स्वीकार-भाव ही
    हमें मुक्त करता है. कुछ खालीपन भरते नहीं हैं. आपके अहसासों से आहत हूं.

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  45. खुशी के साथ चुपके से उदासी कैसे आ जाती है
    तब ही समझ सका था मैं
    हृदयस्पर्शी रचना ....

    शुभकामनायें ...

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  46. जानता हूं वापस लौटना आसान था
    पर खुद-गर्जी ... या कुछ ओर ... और ........या कुछ और ,और ,और
    ओर नहीं है यहाँ भाई साहब .शुक्रिया आपकी सद्य टिपण्णी का .

    Virendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ http://veerubhai1947.blogspot.in/ बृहस्पतिवार, 27 दिसम्बर 2012 खबरनामा सेहत का



    Virendra Sharma ‏@Veerubhai1947
    ram ram bhai मुखपृष्ठ http://veerubhai1947.blogspot.in/ बृहस्पतिवार, 27 दिसम्बर 2012 दिमागी तौर पर ठस रह सकती गूगल पीढ़ी

    स्पेम में गईं हैं टिप्पणियाँ भाई साहब .

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  47. आपकी कविता मन के संवेदनशील तारों को झंकृत कर गई। मेरी कामना है कि आप अहर्निश सृजनरत रहें। धन्यवाद।

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  48. हमें तब ज्यादा समझ में आती है जब 'वो ' हमारे पास नहीं होता..माँ भी..

    जवाब देंहटाएं
  49. आपकी सद्य टिप्पणियों का शुक्रिया .आदरणीय भाव रखेंगे सभी महिलामात्र के प्रति यही इस बरस का शुभ सामूहिक संकल्प होना चाहिए .आभार .

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  50. गहरे अहसासों भरी प्रस्तुति।।।
    नववर्ष की हार्दिक बधाई।।।

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  51. आज जब लौटना चाहता हूं
    तो लगता है देर हो गई है

    सार्थक पोस्ट

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  52. नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ... आशा है नया वर्ष न्याय वर्ष नव युग के रूप में जाना जायेगा।

    ब्लॉग: गुलाबी कोंपलें - जाते रहना...

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  53. नूतन वर्षाभिनंदन मंगलकामनाओं के साथ.

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  54. मार्मिक, जीवन क्या है समझ ही नहीं आता ...

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  55. दिन तीन सौ पैसठ साल के,
    यों ऐसे निकल गए,
    मुट्ठी में बंद कुछ रेत-कण,
    ज्यों कहीं फिसल गए।
    कुछ आनंद, उमंग,उल्लास तो
    कुछ आकुल,विकल गए।
    दिन तीन सौ पैसठ साल के,
    यों ऐसे निकल गए।।
    शुभकामनाये और मंगलमय नववर्ष की दुआ !
    इस उम्मीद और आशा के साथ कि

    ऐसा होवे नए साल में,
    मिले न काला कहीं दाल में,
    जंगलराज ख़त्म हो जाए,
    गद्हे न घूमें शेर खाल में।

    दीप प्रज्वलित हो बुद्धि-ज्ञान का,
    प्राबल्य विनाश हो अभिमान का,
    बैठा न हो उलूक डाल-ड़ाल में,
    ऐसा होवे नए साल में।

    Wishing you all a very Happy & Prosperous New Year.

    May the year ahead be filled Good Health, Happiness and Peace !!!

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  56. मंगलमय नव वर्ष हो, फैले धवल उजास ।
    आस पूर्ण होवें सभी, बढ़े आत्म-विश्वास ।

    बढ़े आत्म-विश्वास, रास सन तेरह आये ।
    शुभ शुभ हो हर घड़ी, जिन्दगी नित मुस्काये ।

    रविकर की कामना, चतुर्दिक प्रेम हर्ष हो ।
    सुख-शान्ति सौहार्द, मंगलमय नव वर्ष हो ।।

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  57. आज जब लौटना चाहता हूं
    तो लगता है देर हो गई है ...

    और अब तुम भी तो नहीं हो वहां ... माँ ...

    मन द्रवित कर गयीं ये पंक्तियाँ

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  58. माँ के प्रति आपकी ये अनवरत शब्दांजलि, आदर का भाव अनुकरणीय है, प्रशंसनीय है..

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  59. जानता हूं वापस लौटना आसान था
    पर खुद-गर्जी ... या कुछ और ...


    very thoughtful expression.. beautiful poetry..

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  60. speechless ......beautiful feelings in the poem in simple words.....!!!

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  61. खुबसुरत अभिव्यक्ति पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है