बुधवार, 24 अप्रैल 2013

वक़्त के आगे भला किसकी चली है ...


घर की देहरी से कहां बाहर गई है 
नीव का पत्थर ही बन के माँ रही है 

बचपने में डांट के रोती थी खुद भी 
अब नहीं वो डांटती मुझको कभी है   

घर न लौटूं तो कभी सोती नहीं थी 
अब वो ऐसी सोई की उठती नहीं है 

दुःख के लम्हे छू नहीं पाए कभी भी  
घर में जब तक साथ वो मेरे रही है  

रोक लेता मैं अगर ये बस में होता 
वक़्त के आगे भला किसकी चली है 

80 टिप्‍पणियां:

  1. वक़्त के आगे भला किसकी चली है ...सच
    मार्मिक कविता

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  2. वक्त के आगे भला किसकी चली है .....सत्य

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  3. सही बात है वक़्त बड़ा बलवान ..
    मार्मिक प्रस्तुति आदरणीय ...

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  4. रोक लेता मैं अगर ये बस में होता
    वक़्त के आगे भला किसकी चली है

    वाकई

    बहुत सुन्दर श्रद्धा सुमन

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  5. दुःख के लम्हे छू नहीं पाए कभी भी
    घर में जब तक साथ वो मेरे रही है
    ये मर्मस्पर्शी है...
    मेरी पसन्द

    आभार्

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  6. बिछोह के बाद, आसरे की याद...

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  7. वक़्त के हाथों हम सभी मजबूर हैं .....ह्रदयस्पर्शी रचना .

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  8. वक़्त के हाथों हम सभी मजबूर हैं .....ह्रदयस्पर्शी रचना .

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  9. वक़्त के हाथों हम सभी मजबूर हैं .....ह्रदयस्पर्शी रचना .

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  10. घर न लौटूं तो कभी सोती नहीं थी
    अब वो ऐसी सोई की उठती नहीं है

    बहुत मार्मिक .... वक़्त के आगे इंसान बेबस ही हो जाता है ...

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  11. बहुत ही हृदय स्पर्शी रचना ,,, मां आखिर माँ होती है ..

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  12. दिल को झकझोर दिया आपके लफ्जों ने... माँ जैसा इस दुनिया में भला कौन हो सकता है...

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  13. वक़्त के आगे कब किसकी चली है ? बहुत बड़ा मरहम होता है ये वक़्त अगर जख्म देता है तो कल मरहम बन कर राहत देता है .

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  14. नितांत मार्मिक और हृदयस्पर्षि रचना, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  15. घर न लौटूं तो कभी सोती नहीं थी
    अब वो ऐसी सोई की उठती नहीं है ………बेहद मर्मस्पर्शी

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  16. माँ की यादे हृदय को और संबल दें..वह आत्मीयता भावों में व्यक्त हो।

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  17. रोक लेता मैं अगर ये बस में होता
    वक़्त के आगे भला किसकी चली है

    यही बेबसी तो खा जाती है भीतर तक..
    :-(

    सादर
    अनु

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  18. aaha ha...kya bat hai !!!!! kooch comment ho hi nhi sakti bhetrin....

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  19. घर न लौटूं तो कभी सोती नहीं थी
    अब वो ऐसी सोई की उठती नहीं है
    दिल को छू गई यह पंक्तियाँ ...सच कहा है
    वक्त के आगे कितना मजबूर है इंसान !

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  20. रोक लेता मैं अगर ये बस में होता
    वक़्त के आगे भला किसकी चली है ..
    सच वक्त के आगे सभी बेवस हो जाते हैं ...
    ..माँ की यादों में डूबी सार्थक प्रस्तुति ...

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  21. रोक लेता मैं अगर ये बस में होता
    वक़्त के आगे भला किसकी चली है

    ....सच कहा है, वरना कौन जाने देता माँ को..बहुत मर्मस्पर्शी रचना..

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  22. हर बार आँखें नम करती हैं आपकी रचनाएँ .....हृदयस्पर्शी

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  23. वक्त के आगे किसी की नहीं चलती है ...............सुन्दर रचना

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  24. घर न लौटूं तो कभी सोती नहीं थी
    अब वो ऐसी सोई की उठती नहीं है -----

    गहन अनुभूति
    सुंदर रचना
    बधाई

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  25. यही तो मुश्किल है कितना भी समर्थ हो कोई वक्त के आगे बेबस हो जाता है.

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  26. दुःख के लम्हे छू नहीं पाए कभी भी
    घर में जब तक साथ वो मेरे रही है
    ----
    आह...

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  27. हृदयस्पर्शी. बहुत अच्छे से आपने व्यक्त किया है.

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  28. मन को छूती भावपूर्ण रचना

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  29. घर न लौटूं तो कभी सोती नहीं थी
    अब वो ऐसी सोई की उठती नहीं है बहुत सच्ची अभिव्यक्ति ...

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  30. बहुत सुन्दर रचना...
    रोक लेता मैं अगर ये बस में होता
    वक़्त के आगे भला किसकी चली है
    पर
    माँ तुम तो अब भी साथ हो इस मन में भले गयी हो तुम कहीं दूर गगन में.....

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  31. हर शेर एक पर एक...संवेदनाओं से भरे...विषय एक आयाम कई....ऐसी गजलें कम कही गयी हैं जिनके सारे शेर स्वतंत्र भी हों और एक दूसरे के अर्थ को विस्तार भी देते हों. मुबारक हो...









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  32. वक्त के आगे किसी की नहीं चलती...समय अपने साथ सब कुछ बहा के ले जाता है बस एक को छोड़कर..और वह है पावन स्मृति...

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  33. वक्त के हाथों हम सभी मजबूर होते है,काश वक्त हमारे हाथों में होता.बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति.

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  34. अभी तक यादे ...आ आ कर सताती हैं

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  35. जिसका स्वमान हनू हो वह हनू -मान होता है .जो मान(अहंकार ,अभिमान का मर्दन कर चुका है सदैव ही आज्ञा कारी है वह हनू -मान है .जो हर काम राम से पूँछ के करे इसीलिए पूंछ लिए है वह हनू -मान है .बढ़िया प्रस्तुति हनुमान जयंती पर . शुक्रिया अनिता जी .हनुमान जयंती मुबारक .
    हकीकत यही है एक दिन हम सभी बिन माँ के हो आ जाते हैं .यही शाश्वत सत्य है .शिरोधार्य है .स्वीकृत है .

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  36. वक्त ही इतना सबल और सक्षम है कि उसको कोइ रोक भी नहीं सकता जाने से भी और मरहम लगाने से भी .....

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  37. दुःख के लम्हे छू नहीं पाए कभी भी
    घर में जब तक साथ वो मेरे रही है
    सच ... माँ के साये में हर पल महफूज़ लगता है
    सादर

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  38. माँ कि जगह कोई नहीं ले सकता ...

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  39. सच कह रहे हो रोक लेते....मगर वक्त!!

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  40. दिल को छू लेनेवाली रचना

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  41. रोक लेता मैं अगर ये बस में होता
    वक़्त के आगे भला किसकी चली है

    वक्त के आगे किसकी चली है.

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  42. अब भी पलता हूँ मैं उसकी याद में ,

    वह युगों से साथ मेरे ही रही है .इसीलिए वह ईश्वर का ही रूप है .

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  43. वाह!

    दर्द चाहे जिसने दिया हो
    दवा तो माँ ही देती है।


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  44. आपकी लेखनी में कुछ यूँ खो जाता हूँ मैं
    माँ याद आती है दिगम्बर हो जाता हूँ मैं।

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  45. दिल को छू लेनेवाली शानदार गजल।

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  46. मार्मिक भावपूर्ण
    माँ तो माँ ही है
    सादर!

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  47. दुःख के लम्हे छू नहीं पाए कभी भी
    घर में जब तक साथ वो मेरे रही है

    भावविह्वल कर गई यह रचना !

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  48. Chali to gaee hai wah lagta hia lekin
    Rooh usaki aas pass rahati yaheen hai.

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  49. दुःख के लम्हे छू नहीं पाए कभी भी
    घर में जब तक साथ वो मेरे रही है

    बहुत ही कोमल भाव.........

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  50. वक़्त का पहिया ऐसे चलता
    जुगनू जैसे जलता बुझता
    इस जुगनू को पकड़ जो पाए
    वक़्त उसी के संग हो जाये

    आपके दिल में बना है आपकी माँ के प्यार का आशियाना !!

    नई पोस्ट
    तेरे मेरे प्यार का अपना आशियाना !!

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  51. time's never enough for the people we love.. we tend to crave more n more

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  52. बहुत ही हृदय स्पर्शी रचना ,

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  53. घर न लौटूं तो कभी सोती नहीं थी
    अब वो ऐसी सोई की उठती नहीं है

    उफ़्फ़…माँ पर एक और खूबसूरत रचना ....

    माँ पर एक पूरी किताब का रिकोर्ड बना डालेंगे आप। ...:))

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  54. ह्रदयस्पर्शी रचना

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  55. अत्यंत भाव प्रबल ....सीधे ह्रदय तक पहुंचती बात ...बहुत सुन्दर रचना ...आँख नाम कर गई ...!!

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  56. माँ के लिए लिखी गई आपकी सभी रचनाएं बेहद भावुक और मार्मिक हैं, शुभकामनाएँ.

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  57. घर न लौटू तो..........
    छू गया दिल को

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  58. यही तो सबसे बड़ी विडम्बना है जीवन की,कि वक्त के आगे किसी की चलती नहीं है।

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  59. सुन्दर रचना

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  60. बहुत सुन्दर रचना .

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है