गुरुवार, 11 जुलाई 2013

माँ का हिस्सा ...

मैं खाता था रोटी, माँ बनाती थी रोटी    
वो बनाती रही, मैं खाता रहा    
न मैं रुका, न वो 
उम्र भर रोटी बनाने के बावजूद उसके हाथों में दर्द नहीं हुआ   

सुबह से शाम तक इंसान बनाने की कोशिश में  
करती रही वो अनगिनत बातें, अनवरत प्रयास      
बिना कहे, बिना सोचे, बिना किसी दर्द के   

कांच का पत्थर तराशते हाथों से खून आने लगता है   
पर माँ ने कभी रूबरू नहीं होने दिया 
अपने ज़ख्मों से, छिले हुए हाथों से   
हालांकि आसान नहीं था ये सब पर माँ ने बाखूबी इसे अंजाम दिया 

अब जब वो नहीं है मेरे साथ 
पता नहीं खुद को इन्सान कहने के काबिल हूं या नहीं 

हां ... इतना जानता हूं 
वो तमाम बातें जो बिन बोले ही माँ ने बताई 
शुमार हो गई हैं मेरी आदतों में 

सच कहूं तो एक पल मुझे अपने पे भरोसा नहीं 
पर विश्वास है माँ की कोशिश पे 
क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन 

और फिर ... 
मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं 

72 टिप्‍पणियां:


  1. सच कहूं तो एक पल मुझे अपने पे भरोसा नहीं
    पर विश्वास है माँ की कोशिश पे
    क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन

    और फिर ...
    मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं
    Wah!

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  2. माँ ही तो तराशती है ,बनाती है इंसान मिट्टी के पुतले को...सींचती है अपने खून-पसीने से पौधे के बड़े होने तक.
    माँ को समर्पित भावों की एक और मर्मस्पर्शी प्रस्तुति.

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  3. 'वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन'
    So true!!!

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  4. वो तमाम बातें जो बिन बोले ही माँ ने बताई
    शुमार हो गई हैं मेरी आदतों में ....बहुत सही बहुत सुन्दर लिखा है आपने

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  5. कितनी गहराई से आपने 'माँ' तत्व को महसूस किया है..आभार !

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  6. उस मूरत में भी उसी का अश्क..

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  7. उम्र भर रोटी बनाने के बावजूद उसके हाथों में दर्द नहीं हुआ................... बच्चों को करते हुए माँ कभी नहीं थकती है.....
    बहुत ही भावों से भरी रचना.....

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  8. उम्र भर रोटी बनाने के बावजूद उसके हाथों में दर्द नहीं हुआ................... बच्चों को करते हुए माँ कभी नहीं थकती है.....
    बहुत ही भावों से भरी रचना.....

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  9. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक

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  10. ममत्‍व के दर्शन में जुड़ा एक और गहन अध्‍याय, विचारणीय प्रस्‍तुतिकरण।

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  11. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  12. मन को गहराई तक छू गयी .बहुत सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति . आभार आगाज़-ए-जिंदगी की तकमील मौत है .आप भी पूछें कैसे करेंगे अनुच्छेद 370 को रद्द ज़रा ये भी बता दें शाहनवाज़ हुसैन .नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN हर दौर पर उम्र में कैसर हैं मर्द सारे ,

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  13. सच कहूं तो एक पल मुझे अपने पे भरोसा नहीं
    पर विश्वास है माँ की कोशिश पे
    क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन

    ....सच में एक माँ ही है जो कच्ची मिट्टी को मूरत में ढाल सकती है...

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  14. मैं खाता था रोटी, माँ बनाती थी रोटी
    वो बनाती रही, मैं खाता रहा
    न मैं रुका, न वो
    उम्र भर रोटी बनाने के बावजूद उसके हाथों में दर्द नहीं हुआ


    बहुत ही मार्मिक, ये दर्द वही समझ सकते हैं जिनकी मां अब इस संसार में नही रही.

    रामराम.

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  15. अब जब वो नहीं है मेरे साथ
    पता नहीं खुद को इन्सान कहने के काबिल हूं या नहीं --

    क्यों नहीं भाई -- ऐसा क्यों सोचते हैं ? मां की यादें ही मार्गदर्शन करती रहेंगी।

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  16. वाह ....बेहद मन को छूने वाली माँ के स्नेह और उसकी कोशिशों को दर्शाती भाव भीनी रचना

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  17. माँ को समर्पित सुंदर और भावपूर्ण रचना

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  18. माँ की उपस्थिति हर भाव को सुवासित कर जाती है..

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  19. bahut hi sundar mmsparshi rachana .......ak ma hi to hai jo nihswarth sneh ki varsha karti hai ....es Sangrhneey rachana ke liye badhai Naswa sir .

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  20. मार्मिक भाव व्यक्त करती रचना....

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  21. सच कहूं तो एक पल मुझे अपने पे भरोसा नहीं
    पर विश्वास है माँ की कोशिश पे
    क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन
    और फिर ...
    मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं

    वाह !!! बहुत उम्दा लाजबाब भावपूर्ण पंक्तियाँ ,,,बधाई

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  22. आपकी यह बेहतरीन रचना कल दिनांक 12.07.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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  23. 'हां ... इतना जानता हूं
    वो तमाम बातें जो बिन बोले ही माँ ने बताई
    शुमार हो गई हैं मेरी आदतों में'
    - इससे अच्छा और क्या होता !

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  24. मेरी माँ के चेहरे पर जब मैं खुशी पढ़ता हूँ एक अच्छा बेटा होने की तब मुझे लगता है कि तमाम असफलताओं के बावजूद मैंने एक चीज पा ली है। थोड़ा सा इंसान बन पाया हूँ मेरी कोशिशों का रंग उनके चेहरे में नजर आता है।

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  25. शब्दार्थ-तकमील-पूर्णता ,मुक़र्रर-निश्चित ,बावफ़ा-वफादार , तअस्सुब-पक्षपात, तज़किरा-चर्चा ,तक़रीर-भाषण ,तकब्बुर-अभिमान ,तकाजा-मांगना ,मुमताज़-विशिष्ट ,मजरूह-घायल

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  26. इसीलिये तो माँ अतुलनीया होती है ।

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  27. इसीलिये तो माँ अतुलनीया होती है ।

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  28. इसीलिये तो माँ अतुलनीया होती है ।

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  29. शुक्रिया बहुत बहुत .

    ॐ शान्ति

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  30. सच कहूं तो एक पल मुझे अपने पे भरोसा नहीं
    पर विश्वास है माँ की कोशिश पे
    क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन

    वाकई बहुत खूबसूरत एहसास

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  31. सच कहूं तो
    मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं !
    .......मार्मिक भाव व्यक्त करती रचना..!!!

    http://rajkumarchuhan.blogspot.in

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  32. सच,
    माँ से ही हमारा वजूद है...
    और माँ सा ही हमारा मन......

    सादर
    अनु

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  33. आपकी ऐसी कविताओं पर कुछ भी नहीं कह पाता...निशब्द हो जाता हूँ!

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  34. यह नहीं थकने वाली माँ हमेशा जिन्दा रहती है !

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  35. माँ के लिए वही उसका हिस्सा है जो उसके बच्चे खुशीखुसी खा लें ! मार्मिक !

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  36. कविता के समापन तक जाते यादें भावनाओं को चरमोत्कर्ष पर ले गयी है. आपने माँ के ऊपर जितनी कवितायें लिखी हैं, सब सीधे ह्रदय में उतरी हैं. नमन माँ को फिर से .

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  37. बहुत ही खुबसूरत होती है माँ की ममता..

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  38. सच कहूं तो एक पल मुझे अपने पे भरोसा नहीं
    पर विश्वास है माँ की कोशिश पे
    क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन

    बहुत खूब...शानदार कविता

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  39. a beautiful ode to Mother :)

    all that we are and whatever we hope to be.. we owe it to our mothers !!

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  40. माँ का हर अहसास एक दूजे मन से जुड़ा होता है ... माँ को समर्पित अनुपम भाव

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  41. सच कहूं तो एक पल मुझे अपने पे भरोसा नहीं
    पर विश्वास है माँ की कोशिश पे
    क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन
    बहुत सुन्दर भाव की सुन्दर अभिव्यक्ति !
    latest post केदारनाथ में प्रलय (२)

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  42. bahut sundar chitran.. maan ke hathon me kabhi dard nahin hota. lekin agar maan ko rotiyan khilani pade to logon ke hathon me aksar dard hone lagat hai..

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  43. "क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन"

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  44. माँ....... क्या नहीं कर सकती...
    बहुत सुंदर!
    ~सादर!!!

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  45. माँ....... क्या नहीं कर सकती...
    बहुत सुंदर!
    ~सादर!!!

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  46. bachpan me kuch mazburiyon ke kaarn kabhi maa ke paas rehna prta kabhi papa ke paas..pr praayi ko dekhte zyda waqt papa ke paas hi rhi...........pr maa ki rotiyaan..aur batiyaan..hmehssaaa sath rhi........
    aj zindgi ke nye safr me fir ..maa s door ho gyi...(sirf jaghaa se).....
    aaj aapki rchnaaa ne.dil paseez diyaa.....halki si ruaansi ho gyi hun...................hmmm.....meraa maa di hathaa di rotiyaan khaan nu bdaa hi jii krdaa....matlab mera maa ki hath ki roti khaane ko bdaa dil krtaa he..........
    bahut bahut aaaabhaar..itni bhaawpurn rchnaa ke liye.

    shurkiyaa
    मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं

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  47. माँ का सुन्दर चित्रण

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  48. love reading you sir... and salute you for the feeling you have for 'maa'.. regards, parul

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  49. और फिर ...
    मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं

    बहुत सुन्दर दिल में उतर जाने वाली अद्भुत

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  50. पर विश्वास है माँ की कोशिश पे
    क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन nice lines.

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  51. और फिर ...
    मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं।
    बस यही तो एक सच है इतना ही समझ ले इस धरती पर हर कोई तो फिर शायद इस दुनिया में सिर्फ इंसान ही होंगे हैवान नहीं...मत्तव के भाव से सजी सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

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  52. कांच का पत्थर तराशते हाथों से खून आने लगता है
    पर माँ ने कभी रूबरू नहीं होने दिया
    अपने ज़ख्मों से, छिले हुए हाथों से
    हालांकि आसान नहीं था ये सब पर माँ ने बाखूबी इसे अंजाम दिया
    आपकी रचनाये दिल को छू कर निकलती हैं माँ की जगह कोई नहीं ले सकता हम माँ कि आत्मा में बसे थे अब माँ हमारी आत्मा में बसी है बहुत बहुत बधाई इस भावभीनी प्रस्तुति हेतु

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  53. बहुत खूब जब चली जाती है माँ याद आता है हमें हमने कुछ नहीं किया उसके लिए जो कुछ किया आखिर आखिर तक उसने ही किया मानवीय हदों के पार जाके किया बेहद का किया .ॐ शान्ति .

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  54. माँ को इतनी सिद्दत से याद करना, कोई आप से सीखे। अच्‍छी रचना।

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  55. सच कहूं तो एक पल मुझे अपने पे भरोसा नहीं
    पर विश्वास है माँ की कोशिश पे
    क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन
    और फिर ...
    मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं

    वाह !!! बहुत उम्दा लाजबाब

    नई पोस्ट
    तेरी ज़रूरत है !!

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  56. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ....

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  57. बहुत सुन्दर
    माँ ही बच्चों में सुंदर संस्कार भरती है
    सादर!

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  58. एक और बेहतरीन नज़्म ......
    माँ की दुआएं हैं जो आपसे ये लिखवा रही हैं .....

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  59. .शुक्रिया आपकी टिप्पणियों का .

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  60. maa wo hai jo ek bachhe ko har taraha se aakaar deti hai aur use ek sansaar deti hai

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  61. bahut bhavpurn rachna .ma to bas ma hi hoti hai ........bahut umda abhivyakti ukeri hai aapne shabd hi nahi hai ,hardik badhai aapko

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  62. बहुत सुंदर और सार्थक अभिव्यक्ति सशक्त पोस्ट ....
    हार्दिक शुभकामनायें ....

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  63. माँ की ममता को व्यक्त करती बेहद कोमल
    बेहद सुन्दर रचना...
    :-)

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  64. पर विश्वास है माँ की कोशिश पे
    क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन

    और फिर ...
    मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं

    बिलकुल सही कहा । णमाँ की सभी रचनाएंआपकी बेहद खूबसूरत हैं ।

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  65. बेहद सुन्दर प्रस्तुतीकरण ....!!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार (17-07-2013) को में” उफ़ ये बारिश और पुरसूकून जिंदगी ..........बुधवारीय चर्चा १३७५ !! चर्चा मंच पर भी होगी!
    सादर...!

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है