सोमवार, 4 नवंबर 2013

बाज़ुओं में दम अगर भरपूर है

सिर झुकाते हैं सभी दस्तूर है
बाज़ुओं में दम अगर भरपूर है

चाँद सूरज से था मिलना चाहता 
रात के पहरे में पर मजबूर है

छोड़ आया हूँ वहाँ चिंगारियाँ 
पर हवा बैठी जो थक के चूर है

बर्फ की वादी ने पूछा रात से 
धूप की पदचाप कितनी दूर है

हो सके तो दिल को पत्थर मान लो 
काँच की हर चीज़ चकनाचूर है

वो पसीने से उगाता है फसल 
वो यकीनन ही बड़ा मगरूर है

बेटियाँ देवी भी हैं और बोझ भी 
ये चलन सबसे बड़ा नासूर है

9 टिप्‍पणियां:

  1. बेटियाँ देवीभी हैं और बोझ भी ये चलन सबसे बड़ा नासूर है , बहुत बड़ी बात कही है आपने , बहुत बढ़िया दिगम्बर भाई
    नया प्रकाशन --: दीप दिल से जलाओ तो कोई बात बन

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  2. बर्फ की वादी ने पूछा रात से
    धूप की पदचाप कितनी दूर है
    ...वाह! लाज़वाब प्रस्तुति...दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें!

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  3. वाह!!! बहुत सुंदर !!!!!
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई--

    उजाले पर्व की उजली शुभकामनाएं-----
    आंगन में सुखों के अनन्त दीपक जगमगाते रहें------

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  4. क्या बात है। इस विधा पर आपकी पकङ काबिलेतारीफ है।

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  5. बेहतरीन रचना।दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें

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  6. छोड़ आया हूँ वहाँ चिंगारियाँ
    पर हवा बैठी जो थक के चूर है

    बर्फ की वादी ने पूछा रात से
    धूप की पदचाप कितनी दूर है

    और सबसे कमाल का शेर है -बेटियाँ देवी भी हैं और बोझ भी
    ये चलन सबसे बड़ा नासूर है
    सर एक लिंक यह भी देखिये आपके द्वारा माँ के लिए लिखी गयी कवितायें यहाँ भी लोग पढ़ें

    https://www.facebook.com/KavitaMemMam

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  7. छोड़ आया हूँ वहाँ चिंगारियाँ
    पर हवा बैठी जो थक के चूर है

    अच्छा है जो हवा थक गयी है वरना सिडनी के जंगल में लगी आग की तरह आग लगती तो बुझने का नाम न लेती..बहुत सुंदर रचना..आभार !

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  8. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है