मंगलवार, 6 मई 2014

दो जमा दो पाँच जब होने लगे ...

दो जमा दो पाँच जब होने लगे
अंक अपने मायने खोने लगे

कौन रखवाली करेगा घर कि जब
बेच के घोड़े सभी सोने लगे

मुश्किलों का क्या करोगे सामना
चोट से पहले ही जो रोने लगे

फैलती है सत्य की खुशबू सदा
झूठ का फिर बोझ क्यों ढोने लगे

खुद की गर्दन सामने आ जायेगी
खून से ख़ंजर अगर धोने लगे

ये फसल भी तुम ही काटोगे कभी
दुश्मनी के बीज जो बोने लगे 

26 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दिनों बाद आप ग़ज़ल के मूड में आये हैं शायर साहब!! बेहत्रीन अशआर से सजी ख़ूबसूरत ग़ज़ल...
    मतला कमाल का है और यह शे'र
    कौन रखवाली करेगा घर कि जब
    बेच के घोड़े सभी सोने लगे!!
    एक कड़वा सच!!

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  2. विषय की मौलिकता में मुहावरों का कौशल देखते ही बन रहा है !

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  3. हर एक अशआर दमदार है ! उम्दा ग़ज़ल !
    New post ऐ जिंदगी !

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  4. नमन है आपकी लेखनी को. इस ग़ज़ल के बारे में कुछ नहीं लिख पाऊंगा. यह ग़ज़ल नहीं ज्ञान का गीत है. सबके गाने के लिए.

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  5. वाह....बेहतरीन पंक्तियाँ हैं

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  6. सुन्दर रचना !
    मेरे ब्लॉग के पोस्ट के लिए manojbijnori12.blogspot.com यहाँ आये और अपने कमेंट्स भेजकर कर और फोलोवर बनकर अपने सुझाव दे !

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  7. ☆★☆★☆



    दो जमा दो पाँच जब होने लगे
    अंक अपने मायने खोने लगे

    कौन रखवाली करेगा घर कि जब
    बेच के घोड़े सभी सोने लगे

    वाह ! वाऽह…!


    बढ़िया ग़ज़ल कही है आदरणीय दिगंबर नासवा जी
    मुबारकबाद !

    शुभकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार


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  8. ो जमा दो पाँच जब होने लगे ...

    कौन रखवाली करेगा घर कि जब
    बेच के घोड़े सभी सोने लगे

    मुश्किलों का क्या करोगे सामना
    चोट से पहले ही जो रोने लगे

    http://swapnmere.blogspot.in/2014/05/blog-post.html

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  9. बेहतरीन...... हर शेर एक अलग भाव को समेटे है..... बहुत खूब

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  10. सत्य की खुशबू फ़ैल रही है..

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  11. वाह-वाह क्या बात है। बहुत ही उम्दा रचना। बधाई।

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  12. बहुत ही सशक्त रचना.

    रामराम.

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  13. ईश्वर ही मालिक है इन हालात में तो। . बेहद सुन्दर रचना ।

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  14. बहुत ही सुन्दर और सशक्त रचना.

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  15. बहुत खूब ! हकीकत की पैनी धार पर हर अहसास को रखते परखते हुए लाजवाब रचना ! शुभकामनायें !

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  16. ये फसल भी तुम ही काटोगे कभी
    दुश्मनी के बीज जो बोने लगे

    हमेशा की तरह बेहतरीन गजल।

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  17. सच्‍चे सामाजिक सन्‍दर्भों के प्रति जमने को प्रेरित करती पंक्तियां।

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  18. बेहतरीन,
    दो और दो पांच इस दौर की सच्चाई बन गयी है
    ये वाली पंक्ति भी बहुत अची लगी
    .

    फैलती है सत्य की खुशबू सदा
    झूठ का फिर बोझ क्यों ढोने लगे

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  19. जीवन को सत्य का आइना दिखाती गज़ल .

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  20. फैलती है सत्य की खुशबू सदा
    झूठ का फिर बोझ क्यों ढोने लगे

    खुद की गर्दन सामने आ जायेगी
    खून से ख़ंजर अगर धोने लगे

    खूबसूरत अलफ़ाज़

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  21. दो जमा दो पाँच जब होने लगे
    अंक अपने मायने खोने लगे
    कौन रखवाली करेगा घर कि जब
    बेच के घोड़े सभी सोने लगे

    सत्य ...!!

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