सोमवार, 12 मई 2014

सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं ...

मजबूर वो रहा कभी नहीं
गमले में जो उगा कभी नहीं

मुश्किल यहाँ है खोजना उसे
इंसान जो बिका कभी नहीं

है टूटता रहा तो क्या हुआ
पर्वत है जो झुका कभी नहीं

वो बार बार गिर के उठ गया
नज़रों से जो गिरा कभी नहीं

रोशन चिराग होंसलों से था
आंधी से वो बुझा कभी नहीं

चेहरे ने खुल के राज़ कह दिया
सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं 

30 टिप्‍पणियां:

  1. सादा सी, मगर ख़ूबसूरत सी गज़ल!! एक लम्बे समय के बाद आपकी ग़ज़ल पढने को मिली!! मगर एहसास वही हैं!!

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की ८५० वीं बुलेटिन खेल खतम पैसा हजम - 850 वीं ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (13-05-2014) को "मिल-जुलकर हम देश सँवारें" (चर्चा मंच-1611) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. नासवा जी,आप की ग़ज़लों में बहुत दम होता है |हमेशा की तरह लाजवाब और खूबसूरत ग़ज़ल ...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@आप की जब थी जरुरत आपने धोखा दिया

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  5. जितने छोटे उतने गहरे अर्थ -
    सार्थक और समर्थ!

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  6. बहुत ही खूबसूरत और उम्दा ग़ज़ल !!

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  7. कभी नही कहकर भी सब कुछ कह रही है, बेजोड़ रचना …

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  8. वो बार बार गिर के उठ गया
    नज़रों से जो गिरा कभी नहीं
    वाह ! बहुत खूबसूरत।

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  9. मुश्किल यहाँ है खोजना उसे
    इंसान जो बिका कभी नहीं!
    लाजवाब
    बेटी बन गई बहू

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  10. हमेशा की तरह उम्दा गजल.. वाह!

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  11. रोशन चिराग होंसलों से था
    आंधी से वो बुझा कभी नहीं
    रोशन हौसलों का चिराग
    दुनिया की आँधिया सच मे उसे बुझा नही पाती !
    हमेशा की तरह उम्दा , आप गजल मे तो माहिर है ही !

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  12. मुश्किल यहाँ है खोजना उसे
    इंसान जो बिका कभी नहीं

    रोशन चिराग होंसलों से था
    आंधी से वो बुझा कभी नहीं

    बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है… कमाल के शेर कहे हैं… ये दो शेर ख़ास तौर पर पसंद आये...

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  13. सुंदर प्रस्तुति...
    आप ने लिखा...
    मैंने भी पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पड़ें...
    इस लिये आप की ये रचना...
    15/05/2013 को http://www.nayi-purani-halchal.blogspot.com
    पर लिंक गयी है...
    आप भी इस हलचल में अवश्य शामिल होना...

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  14. आपकी पोस्ट तो सब कुछ बयाँ कर रही है। ………………

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  15. रोशन चिराग होंसलों से था
    आंधी से वो बुझा कभी नहीं
    चेहरे ने खुल के राज़ कह दिया
    सिल्वट ने जो कहा कभी नहीं
    ,, सच चेहरा आइना है जिससे कुछ छिपा नहीँ रह सकता
    बहुत सुन्दर

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  16. वाह बहुत ही लाजवाब, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  17. है टूटता रहा तो क्या हुआ
    पर्वत है जो झुका कभी नहीं

    वो बार बार गिर के उठ गया
    नज़रों से जो गिरा कभी नहीं
    हमेशा की तरह लाजवाब .....

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  18. शानदार, जानदार। वक्‍त की सिलवटों को संवेदना से उकेरती पंक्तियां।

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  19. आशा का संचार करती प्रेरणादायक गज़ल

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  20. मुश्किल यहाँ है खोजना उसे
    इंसान जो बिका कभी नहीं

    है टूटता रहा तो क्या हुआ
    पर्वत है जो झुका कभी नहीं

    एक एक अल्फ़ाज़ एक एक अशआर लगे मोती जैसा

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  21. वाह!!! क्या बात है... वक़्त की सिलवटें और उनके राज़...बहुत बढ़िया

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  22. सुन्दर ग़ज़ल प्रस्तुति।

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है