सोमवार, 19 मई 2014

पर सजा का हाथ में फरमान है ...

काठ के पुतलों में कितनी जान है
देख कर हर आइना हैरान है

कब तलक बाकी रहेगी क्या पता
रेत पर लिक्खी हुयी पहचान है

हर सितम पे होंसला बढ़ता गया
वक़्त का मुझपे बड़ा एहसान है

मैं चिरागों की तरह जलता रहा
क्या हुआ जो ये गली सुनसान है

उम्र भर रिश्ता निभाना है कठिन
छोड़ कर जाना बहुत आसान है

जुर्म का तो कुछ खुलासा है नहीं
पर सजा का हाथ में फरमान है 

36 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर लेखन , दिगंबर भाई ऐसा लिखा है जैसे मेरी बात आपने कह दी हो , बढ़िया रचना व लेखन , भाई जी धन्यवाद !
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  2. क्या बात है। लाजवाब लिखा है आपने।

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  3. आपकी लिखी रचना मंगलवार 20 मई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  4. ा मुझपे बड़ा एहसान है

    मैं चिरागों की तरह जलता रहा
    क्या हुआ जो ये गली सुनसान है

    सुंदर रचना...
    कुलदीप ठाकुर[मन का मंथन]

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  5. हर सितम पे होंसला बढ़ता गया
    वक़्त का मुझपे बड़ा एहसान है
    क्या बात है .......बहुत ही उम्दा

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  6. वाह...
    लाजवाब ग़ज़ल !!


    सादर
    अनु

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  7. हर सितम पे होंसला बढ़ता गया
    वक़्त का मुझपे बड़ा एहसान है
    बहुत ही सुन्दर !

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  8. आपने पूरे एक वर्ष माँ की याद में बडी भावपूर्ण कविताएं लिखीं थीं । अब ये सारपूर्ण गज़लें आ रही हैं एक के बाद एक । छोटी सी पंक्तियों में निहित व्यंग्यार्थ रचना को गंभीर बनाता है ।

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  9. वाह ! खूबसूरत ग़ज़लें आप की पहचान है !

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  10. तबीयत से कही गयी दिल की बात....

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  11. बहोत खूबसूरत...... नस्वाजी ....हर शेर पहले से बेहतर...!!!

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  12. गहरी बातें गजल के माध्‍यम से। बेहतर और बेहतर।

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  13. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (20-05-2014) को "जिम्मेदारी निभाना होगा" (चर्चा मंच-1618) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  14. जुर्म का तो कुछ खुलासा है नहीं
    पर सजा का हाथ में फरमान है .....बहुत खूब...

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  15. जुर्म का तो कुछ खुलासा है नहीं
    पर सजा का हाथ में फरमान है .....बहुत खूब...

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  16. कब तलक बाकी रहेगी क्या पता
    रेत पर लिक्खी हुयी पहचान है
    ...लाज़वाब...सभी अशआर बहुत उम्दा...

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  17. कब तलक बाकी रहेगी क्या पता
    रेत पर लिक्खी हुयी पहचान है
    ...लाज़वाब...सभी अशआर बहुत उम्दा...

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  18. हर सितम पे होंसला बढ़ता गया
    वक़्त का मुझपे बड़ा एहसान है

    Behtreen Panktiyan....

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  19. हर सितम पे होंसला बढ़ता गया
    वक़्त का मुझपे बड़ा एहसान है

    बेहद खूबसूरत , नासवा जी बधाई !

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  20. जुर्म का तो कुछ खुलासा है नहीं
    पर सजा का हाथ में फरमान है

    बहुत उम्दा..वैसे तो हर शेर लाजवाब है

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  21. बहुत ही सुन्दर असरार,बेहतरीन प्रस्तुति।

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  22. कब तलक बाकी रहेगी क्या पता
    रेत पर लिक्खी हुयी पहचान है


    क्या बात है ..वाह! स्वस्थ रहें ...

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  23. बहुत सुंदर ! नाउम्मीदी हर तरफ पर हौसला बरकरार है.

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  24. एक से बढ़ कर एक शेर ..... सितम के बढ़ने से हौसला बढ़ने की बात बहुत पसंद आई .

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  25. मैं चिरागों की तरह जलता रहा
    क्या हुआ जो ये गली सुनसान है
    .. waah! behtreen gazal digambar ji !

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  26. मैं चिरागों की तरह जलता रहा
    क्या हुआ जो ये गली सुनसान है

    उम्र भर रिश्ता निभाना है कठिन
    छोड़ कर जाना बहुत आसान है
    खूबसूरत अलफ़ाज़

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  27. उम्र भर रिश्ता निभाना है कठिन
    छोड़ कर जाना बहुत आसान है

    जुर्म का तो कुछ खुलासा है नहीं
    पर सजा का हाथ में फरमान है ...बहुत सुंदर ग़ज़ल !

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  28. हर सितम पे होंसला बढ़ता गया
    वक़्त का मुझपे बड़ा एहसान है...बहुत खुबसुरत

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  29. कब तलक बाकी रहेगी क्या पता
    रेत पर लिक्खी हुयी पहचान है

    हर सितम पे होंसला बढ़ता गया
    वक़्त का मुझपे बड़ा एहसान है

    bahut badhiyaan!!!

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