रविवार, 20 जुलाई 2014

हवा के हाथ से बदली गिरी है ...

लचकती डाल से इमली गिरी है
कहीं पे आज फिर बिजली गिरी है

वहाँ भवरों की हलचल है अभी तक
जहाँ कच्ची कली जंगली गिरी है

सितारों में तुम्हारा अक्स होगा
खनकती सी हंसी उजली गिरी है

उसे थामा हुआ था इश्क ने ही
किताबों से जो इक तितली गिरी है

शजर उगता वहीं है प्रेम का फिर
जहाँ पे इश्क की गुठली गिरी है

सियासत दान कब गिरते हैं देखो
गिरी है बस तो इक दिल्ली गिरी है

जो राधा हो गया वो जान पाया
कहाँ पे कृष्ण की मुरली गिरी है

लो दस्तक आ गई सावन की फिर से
हवा के हाथ से बदली गिरी है


42 टिप्‍पणियां:

  1. सोचनीय बातें लिखी हैं। गजब कर दिया अापने।

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  2. बहुत अच्छी ग़ज़ल। हार्दिक शुभकामनाएं!

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  3. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - 21 . 7 . 2014 को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  7. वाह। क्या बात है। बहुत सुन्दर

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  8. लचकती डाल से इमली गिरी है
    कहीं पे आज फिर बिजली गिरी है
    यह बिजली और इमली का बिंब अनोखा है. अच्छा लगा.

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  9. लो दस्तक आ गई सावन की फिर से
    हवा के हाथ से बदली गिरी है
    बहुत ही खुबसूरत अभिव्यक्ति
    उम्दा ग़ज़ल
    इनमें से कुछ शब्द चोरी हो गए आपके मैं चोरनी

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  10. 'गिरती हुई' पर बहुत बढ़िया पकड़ रही आपकी-हम तो हैरान हैं !

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  11. लो दस्तक आ गई सावन की फिर से
    हवा के हाथ से बदली गिरी है
    bahut sundar !

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  12. सियासत दान कब गिरते हैं देखो
    गिरी है बस तो इक दिल्ली गिरी है... क्या बात है, बहुत खूब !

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  13. लो दस्तक आ गई सावन की फिर से
    हवा के हाथ से बदली गिरी है
    क्या बात है...खूबसूरत ग़ज़ल

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  14. लो दस्तक आ गई सावन की फिर से
    हवा के हाथ से बदली गिरी है

    बहुत खूबसूरत अल्फाज और बात..

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  15. जो राधा हो गया वो जान पाया
    कहाँ पे कृष्ण की मुरली गिरी है

    बहुत ही बढ़िया!
    सादर!

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  16. हमेशा ही बस वाह निकलता है
    इधर से उधर को जो निकलता है ।

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  17. उसे थामा हुआ था इश्क ने ही
    किताबों से जो इक तितली गिरी है

    शजर उगता वहीं है प्रेम का फिर
    जहाँ पे इश्क की गुठली गिरी है

    सियासत दान कब गिरते हैं देखो
    गिरी है बस तो इक दिल्ली गिरी है
    बहुत ही सार्थक अलफ़ाज़ और उतनी ही उम्दा ग़ज़ल

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  18. खूबसूरत ग़ज़ल. हर शेर में नयापन और ताजगी है.

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  19. सियासत दान कब गिरते हैं देखो
    गिरी है बस तो इक दिल्ली गिरी है

    सोचने लायक! सुन्दर रचना...

    ~सादर

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  20. सियासत दान कब गिरते हैं देखो
    गिरी है बस तो इक दिल्ली गिरी है

    सोचने लायक! सुन्दर रचना...

    ~सादर

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  21. bahut hi khubsurat alfaazo ko jod ke aapne gazal ki shaan badha di... lajawaab !!!

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  22. बेहद उम्दा और बेहतरीन ...आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@मुकेश के जन्मदिन पर.

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  23. शजर उगता वहीं है प्रेम का फिर
    जहाँ पे इश्क की गुठली गिरी है

    बहुत सुंदर बिम्ब भाव और अर्थ हैं पूरी ग़ज़ल नै ज़मीन पे उतरी है।

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