सोमवार, 11 सितंबर 2017

राधा के साथ मुरली-मनोहर चले गए ...

भुगतान हो गया तो निकल कर चले गए
नारे लगाने वाले अधिकतर चले गए

माँ बाप को निकाल के घर, खेत बेच कर
बेटे हिसाब कर के बराबर चले गए

सूखी सी पत्तियाँ तो कभी धूल के गुबार
खुशबू तुम्हारी आई तो पतझड़ चले गए

खिड़की से इक उदास नज़र ढूंढती रही
पगडंडियों से लौट के सब घर चले गए 

बच्चे थे तुम थीं और गुटर-गूं थी प्रेम की 
छज्जे से उड़ के सारे कबूतर चले गए

तुम क्या गए के प्रीत की सरगम चली गई 
राधा के साथ मुरली-मनोहर चले गए

4 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय दिगम्बर जी -- वाह और सिर्फ वाह !!!!!!!!!!! हर शेर मन भिगोने वाला है |

    'बच्चे थे तुम थीं और गुटर-गूं थी प्रेम की
    छज्जे से उड़ के सारे कबूतर चले गए

    तुम क्या गए के प्रीत की सरगम चली गई
    राधा के साथ मुरली-मनोहर चले गए-- ''
    ---------कया बात है !!!!!!!!!!
    बहुत -- बहुत ही अच्छी रचना ----- सादर शुभकामना --

    जवाब देंहटाएं
  2. आदरणीय दिगम्बर जी ये कुछ टिप्पणियाँ मेरे गूगल प्लस पर सुरक्षित थी | जिन्हें फिर से रचना पर डाल दिया |

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. जी ... गूगल प्लस की सभी टिप्पणियाँ अब ख़त्म हो गयी हैं ... ब्लॉग से भी निकल गयीं हैं ...

      हटाएं

आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है