सोमवार, 12 मार्च 2018

सफ़र जो आसान नहीं ...


बेतहाशा फिसलन की राह पर
काम नहीं आता मुट्ठियों से घास पकड़ना  
सुकून देता है उम्मीद के पत्थर से टकराना
या रौशनी का लिबास ओढ़े अंजान टहनी का सहारा 
थाम लेती है जो वक़्त के हाथ 

चुभने के कितने समय बाद तक
वक़्त का महीन तिनका 
घूमता रहता है दर्द का तूफानी दरिया बन कर
पाँव में चुभा छोटा सा लम्हा
शरीर छलनी होने पे ही निकल पाता है

अभी सुख की खुमारी उतरी भी नहीं होती 
आ जाती है दुःख की नई लहर
आखरी पाएदान पे जो खड़ी होती है सुख के  

हर आग की जलन एक सी 
किसी ठहरे हुवे सवाल की तरह
लम्हों की राख रह जाती है जगह जगह इतिहास समेटे
हाथ लगते ही ख्वाब टूट जाता है
सवाल खड़ा रहता है

उम्मीद का उजाला
आँखों का काजल बन के नहीं आता
धूप जरूरी है रात के बाद
किसी भी जंगली गुलाब के खिलने को

किसी साए के सहारे भी तो जिंदगी नहीं चलती

14 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
    ३० मार्च २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  2. उम्मीद का उजाला
    आँखों का काजल बन के नहीं आता
    धूप जरूरी है रात के बाद
    किसी भी जंगली गुलाब के खिलने को

    बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति

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  3. वाह!दिगंबर जी ,लाजवाब !
    उम्मीद का उजाला आँख का काजल बनकर नहीं आता
    धूप जरूरी है रात के बाद ,जंगली गुलाब को खिलने के लिए .....वाह!!

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  4. वाह सुंदर बिंब और व्यंजना से सजा सुंदर सृजन।

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  5. उम्मीद का उजाला
    आँखों का काजल बन के नहीं आता
    धूप जरूरी है रात के बाद
    किसी भी जंगली गुलाब के खिलने को
    जी दिगम्बर जी , उम्मीद का आधार ठोस हो तभी उसमें आनन्द है | सुंदर रचना आपके चिर परिचित शैली से अलग | सादर

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  6. लाज़बाब... ,मार्मिक सृजन हमेशा की तरह ,सादर नमन आपको

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