सोमवार, 27 अगस्त 2018

ख़ुदगर्ज़ आवारा इश्क ... क्या सच में

बिगाड़ देता हूँ ज़ुल्फ़ तेरी
नहीं चाहता हवा के सर कोई इलज़ाम 
रखना चाहता हूँ तुझपे 
बस अपना ही इख़्तियार 
क़बूल है क़बूल है
आवारा-पन का जुर्म सो सो बार मुझे

नहीं चाहता
गुज़रे तुझे छू के बादे-सबा
महक उठे कायनात मदहोश खुशब से
साँसों के आगाज़ के साथ रहना चाहता हूँ 
 तेरी खुशब के इर्द-गिर्द उम्र भर

नहीं चाहता
बदले मौसम का मिज़ाज
टूटे कभी बरसात का लंबा सिलसिला 
ख़त्म होने वाली प्यास तलक
पीना है तुझे कतरा-कतरा

नहीं चाहता ख्वाब का टूटना उम्र भर
अभी अभी खिला है जंगली गुलाब का फूल 
देखना है खेल मुहब्बत का 
मुश्किल से अभी प्रेम ने अंगड़ाई ली है ...

सोमवार, 20 अगस्त 2018

बातें ... खुद से ...


तुम नहीं होती तो कितना कुछ सोच जाता हूँ ... विपरीत बातें भी लगता है एक सी हैं ... ये सच्ची हैं या झूठी ...

चार पैग व्हिस्की के बाद सोचता हूँ 
नशा तो चाय भी दे देती 
बस तुम्हारे नाम से जो पी लेता ...

हिम्मत कर के कई बार झांकता हूँ तुम्हारी आँखों में, फिर सोचते हूँ ... सोचता क्या कह ही देता हूँ ... 

कुछ तो है जो दिखता है तुम्हारी नीली आँख में
वो बेरुखी नहीं तो प्रेम का नाम दे देना ...

फुटपाथ से गुज़रते हुए तुम्हे कुछ बोला था उस दिन, हालांकि तुम ने सुना नहीं पर कर लेतीं तो सच साबित हो जाती मेरी बात ...

दिखाना प्रेम के नाम पर
किसी ज्योतिषी को अपना हाथ
मेरा नाम का पहला अक्षर यूँ ही बता देगा ...

कितना कुछ होता रहता है, कितना कुछ नहीं भी होता ... हाँ ... बहुत कुछ जब नहीं होता, ये तो होता ही रहता है कायनात में ... 

मैंने डाले नहीं, तुमने सींचे नहीं
प्रेम के बीज अपने आप ही उग आते हैं ...

उठती हैं, मिटती हैं, फिर उठती हैं
लहरों की चाहत है पाना
प्रेम खेल रहा है मिटने मिटाने का खेल सदियों से ...

अकसर अध्-खुली नींद में रोज़ बुदबुदाता हूँ ... एक तुम हो जो सुनती नहीं ... ये चाँद, ये सूरज, ये हवा भी तो नहीं सुनती ...  

धुंधले होते तारों के साथ
उठ जाती हो रोज पहलू से मेरे  
जमाने भर को रोशनी देना तुम्हारा काम नहीं ...

सोमवार, 13 अगस्त 2018

भीड़ जयचंदों की क्यों फिर देश से जाती नहीं है ...


सभी भारत वासियों को स्वतंत्रता दिवस, १५ अगस्त की हार्दिक बधाई और ढेरों शुभकामनाएँ ... एक छोटा सा आग्रह इस गीत के माध्यम से:  

हो गए टुकड़े अनेकों चेतना जागी नहीं है
क्या तपोवन में कहीं सिंह गर्जना बाकी नहीं है

था अतिथि देव भव का भाव अपना दिव्य चिंतन
पर सदा लुटते रहे इस बात पर हो घोर मंथन  
चिर विजय की कामना क्यों मन को महकाती नहीं है

संस्कृति के नाम पर कब तक हमें छलते रहेंगे
हम अहिंसा के पुजारी हैं तो क्या पिटते रहेंगे
क्या भरत भूमि अमर वीरों की परिपाटी नहीं है

खंड में बंटती रही माँ भारती लड़ते रहे हम
प्रांत भाषा वर्ण के झगड़ों में बस उलझे रहे हम
राष्ट्र की परिकल्पना क्यों सोच में आती नहीं है

सैनिकों के शौर्य को जब कायरों से तोलते हैं
नाम पर अभिव्यक्ति की हम शत्रु की जय बोलते हैं 
भीड़ जयचंदों की क्यों फिर देश से जाती नहीं है

सोमवार, 6 अगस्त 2018

एहसास ... जिन्दा होने का ...


एहसास ... जी हाँ ... क्यों करें किसी दूसरे के एहसास की बातें, जब की खुद का होना भी बे-मानी हो जाता है कभी कभी ... अकसर ज़िन्दगी गुज़र जाती है खुद को चूंटी काटते काटते ... जिन्दा हूँ तो उसका एहसास क्यों नहीं ... 


उँगलियों में चुभे कांटे
इसलिए भी गढ़े रहने देता हूँ 
कि हो सके एहसास खुद के होने का

हालांकि करता हूँ रफू जिस्म पे लगे घाव
फिर भी दिन है 
कि रोज टपक जाता है ज़िंदगी से 

उम्मीद घोल के पीता हूँ हर शाम    
कि बेहतर है सपने टूटने से
उम्मीद के हैंग-ओवर में रहना उम्र भर  

सिवाए इसके की खुदा याद आता है
वजह तो कुछ भी नहीं तुम्हें प्रेम करने की 

और वजह जंगली गुलाब के खिलने की ...?
ये कहानी फिर कभी ...