सोमवार, 27 अगस्त 2018

ख़ुदगर्ज़ आवारा इश्क ... क्या सच में

बिगाड़ देता हूँ ज़ुल्फ़ तेरी
नहीं चाहता हवा के सर कोई इलज़ाम 
रखना चाहता हूँ तुझपे 
बस अपना ही इख़्तियार 
क़बूल है क़बूल है
आवारा-पन का जुर्म सो सो बार मुझे

नहीं चाहता
गुज़रे तुझे छू के बादे-सबा
महक उठे कायनात मदहोश खुशब से
साँसों के आगाज़ के साथ रहना चाहता हूँ 
 तेरी खुशब के इर्द-गिर्द उम्र भर

नहीं चाहता
बदले मौसम का मिज़ाज
टूटे कभी बरसात का लंबा सिलसिला 
ख़त्म होने वाली प्यास तलक
पीना है तुझे कतरा-कतरा

नहीं चाहता ख्वाब का टूटना उम्र भर
अभी अभी खिला है जंगली गुलाब का फूल 
देखना है खेल मुहब्बत का 
मुश्किल से अभी प्रेम ने अंगड़ाई ली है ...

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