सोमवार, 24 दिसंबर 2018

सुन युधिष्ठर फैंक दे अपने ये पासे


प्रेम के सब गीत अब लगते हैं बासे
दूर जब से हो गया हूँ प्रियतमा से

मुड़ के देखा तो है मुमकिन रोक ना लें 
नम सी आँखें और कुछ चेहरे उदासे

नाम क्या दोगे हमारी प्यास का तुम
पी लिया सागर रहे प्यासे के प्यासे

आ रहे हैं खोल के रखना हथेली
टूटते तारे भी दे देते हैं झांसे

उम्र भर थामे रहे सच का ही दामन   
और पीछे रह गए हम अच्छे ख़ासे

फूट जाएगा तो सागर लील लेगा 
दिल का मैं साझा करू अब दर्द कासे 

हर गली मिल जाएँगे कितने ही शकुनी 
सुन युधिष्ठर फैंक दे अपने ये पासे 

सोमवार, 17 दिसंबर 2018

यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा ...


खेत, पीपल, घर, कुआँ, पोखर मिलेगा
क्यों है ये उम्मीद वो मंज़र मिलेगा

तुम गले लगना तो बख्तर-बंद पहने
दोस्तों के पास भी खंज़र मिलेंगा

कूदना तैयार हो जो सौ प्रतीशत
भूल जाना की नया अवसर मिलेगा

इस शहर में ढूंढना मुमकिन नहीं है
चैन से सोने को इक बिस्तर मिलेगा

देर तक चाहे शिखर के बीच रह लो
चैन धरती पर तुम्हे आकर मिलेगा

बैठ कर देखो बुजुर्गों के सिरहाने
उम्र का अनुभव वहीं अकसर मिलेगा

मन से मानोगे तो खुद झुक जाएगा सर 
यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

थमा गई थी वो ख़त हाथ में मेरे फट से ...


कहाँ से आई कहाँ चूम के गई झट से 
शरारती सी थी तितली निकल गई ख़ट से

हसीन शोख़ निगाहों में कुछ इशारा था 
न जाने कौन से पल आँख दब गई पट से

ज़मीं पे आग के झरने दिखाई देते हैं  
गिरी है बूँद सुलगती हुयी तेरी लट से

डरा हुआ सा शहर है, डरे हुए पंछी 
डरा हुआ सा में खुद भी हूँ अपनी आहट से

लगे थे सब तो छुडाने में हाथ पर बिटिया
ज़रूरतों में बुढापे की ले गई हट से

नहीं थे सेर, सवा सेर से, मिले अब तक
उड़े जो हाथ के तोते समझ गए चट से

न जाने कौन थी, रिश्ता था क्या मेरा, फिर भी 
थमा गई थी वो ख़त हाथ में मेरे फट से

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

क्यों है ये संसार अपने दरम्याँ ...


क्यों जुड़े थे तार अपने दरम्याँ
था नहीं जब प्यार अपने दरम्याँ

रात बोझिल, सलवटें, खामोश दिन
बोझ सा इतवार अपने दरम्याँ

प्रेम, नफरत, लम्स, कुछ तो नाम दो
क्या है ये हरबार अपने दरम्याँ

मैं खिलाड़ी, तुम भी शातिर कम नहीं
जीत किसकी हार अपने दरम्याँ

छत है साझा फांसला मीलों का क्यों
क्या है कारोबार अपने दरम्याँ

सिलसिला रीति, रिवाजो-रस्म का 
क्यों है ये संसार अपने दरम्याँ