सोमवार, 29 अप्रैल 2019

ख़त हवा में अध्-जले जलते रहे ...


मील के पत्थर थे ये जलते रहे
कुछ मुसफ़िर यूँ खड़े जलते रहे

पास आ, खुद को निहारा, हो गया
फुरसतों में आईने जलते रहे

कश लिया, एड़ी से रगड़ा ... पर नहीं
“बट” तुम्हारी याद के जलते रहे

मग तेरा, कौफी तेरी, यादें तेरी
होठ थे जलते रहे, जलते रहे

रोज़ के झगड़े, उधर तुम, मैं इधर 
मौन से कुछ रास्ते जलते रहे

प्रेम टपका, तब हुए ना, टस-से-मस 
नफरतों की धूप मे जलते रहे

गल गया जीवन, बिमारी लग गई
शामियाने शान से जलते रहे

लफ्ज़ ले कर उड़ गईं कुछ तितलियाँ
ख़त हवा में अध्-जले जलते रहे

सोमवार, 22 अप्रैल 2019

मेरी निगाह में रहता है वो ज़माने से ...


कभी वो भूल से आए कभी बहाने से  
मुझे तो फर्क पड़ा बस किसी के आने से

नहीं ये काम करेगा कभी उठाने से
ये सो रहा है अभी तक किसी बहाने से

लिखे थे पर न तुझे भेज ही सका अब-तक
मेरी दराज़ में कुछ ख़त पड़े पुराने से

कभी न प्रेम के बंधन को आज़माना यूँ
के टूट जाते हैं रिश्ते यूँ आज़माने से

तुझे छुआ तो हवा झूम झूम कर महकी   
पलाश खिलने लगे डाल के मुहाने से

निगाह भर के मुझे देख क्या लिया उस दिन  
यहाँ के लोग परेशाँ हैं इस फ़साने से

मुझे वो देख भी लेता तो कुछ नहीं कहता
मेरी निगाह में रहता है वो ज़माने से
(तरही गज़ल) 

सोमवार, 15 अप्रैल 2019

चाँद उतरता है होले से ज़ीने पर ...


हुस्नो-इश्क़, जुदाई, दारू पीने पर
मन करता है लिक्खूं नज़्म पसीने पर 

खिड़की से बाहर देखो ... अब देख भी लो  
क्यों पंगा लेती हो मेरे जीने पर 

सोहबत में बदनाम हुए तो ... क्या है तो 
यादों में रहते हैं यार कमीने पर    

लक्कड़ के लट्टू थे, कन्चे कांच के थे
दाम नहीं कुछ भी अनमोल नगीने पर

राशन, बिजली, पानी, ख्वाहिश, इच्छाएं
चुक जाता है सब कुछ यार महीने पर 

खुशबू, बातें, इश्क़ ... ये कब तक रोकोगे  
लोहे की दीवारें, चिलमन झीने पर

छूने से नज़रों के लहू टपकता है
इश्क़ लिखा है क्या सिन्दूर के सीने पर

और वजह क्या होगी ... तुझसे मिलना है
चाँद उतरता है होले से ज़ीने पर

सोमवार, 8 अप्रैल 2019

किसी के दर्द में तो यूँ ही छलक लेता हूँ ...


हज़ार काम उफ़ ये सोच के थक लेता हूँ
में बिन पिए जनाब रोज़ बहक लेता हूँ  

ये फूल पत्ते बादलों में तेरी सूरत है
वहम न हो मेरा में पलकें झपक लेता हूँ

कभी न पास टिक सकेगी उदासी मेरे
तुझे नज़र से छू के रोज़ महक लेता हूँ

हरी हरी वसुंधरा पे सृजन हो पाए 
में बन के बूँद बादलों से टपक लेता हूँ

तमाम रात तुझे देखना है खिड़की से
में चाँद बन के टहनियों में अटक लेता हूँ

मुझे सिफ़त अता करी है मेरे मौला ने
सुबह से शाम पंछियों सा चहक लेता हूँ

यही असूल मुद्दतों से मेरा है काइम
ख़ुशी के साथ साथ ग़म भी लपक लेता हूँ

तमाम अड़चनों से मिट न सकेगी हस्ती
में ठोकरों से ज़िन्दगी का सबक लेता हूँ

सितम हज़ार सह लिए हैं सभी हँस हँस के
किसी के दर्द में तो यूँ ही छलक लेता हूँ

सोमवार, 1 अप्रैल 2019

शर्ट के टूटे बटन में रह गए ...


प्रेम के कुछ दाग तन में रह गए
इसलिए हम अंजुमन में रह गए

सब तो डूबे चुस्कियों में और हम
नर्म सी तेरी छुवन में रह गए

चल दिए कुछ लोग रिश्ता तोड़ कर
कुछ निभाने की जतन में रह गए

छा गए किरदार कुछ आकाश पर
कुछ सिमट के पैरहन में रह गए

टूट कर सपने नहीं आए कभी 
कुछ गुबारे भी गगन में रह गए

अहमियत रिश्तों की कुछ समझी नहीं
अपने अपने ही बदन में रह गए

उड़ गई आंधी घरोंदे तोड़ कर 
सिरफिरे फिर भी चमन में रह गए

रेशमी धागे, मधुर एहसास, पल
शर्ट के टूटे बटन में रह गए

खिडकियों से आ गई ताज़ा हवा
हम मगर फिर भी घुटन में रह गए