मंगलवार, 14 मई 2019

पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है ...

जितनी बार भी देश आता हूँ, पुराने घर की गलियों से गुज़रता हूँ, अजीब सा एहसास होता है जो व्यक्त नहीं हो पाता, हाँ कई बार कागज़ पे जरूर उतर आता है ... अब ऐसा भी नहीं है की यहाँ होता हूँ तो वहां की याद नहीं आती ... अभी भारत में हूँ तो ... अब झेलिये इसको भी ...
   
कुल्लेदार पठानी पगड़ी, एक पजामा रक्खा है
छड़ी टीक की, गांधी चश्मा, कोट पुराना रक्खा है

कुछ बचपन की यादें, कंचे, लट्टू, चूड़ी के टुकड़े
परछत्ती के मर्तबान में ढेर खजाना रक्खा है

टूटे घुटने, चलना मुश्किल, पर वादा है लौटूंगा
मेरी आँखों में देखो तुम स्वप्न सुहाना रक्खा है

जाने किस पल छूट गई थी या मैंने ही छोड़ी थी
बुग्नी जिसमें पाई, पाई, आना, आना रक्खा है

मुद्दत से मैं गया नहीं हूँ उस आँगन की चौखट पर
लस्सी का जग, तवे पे अब तक, एक पराँठा रक्खा है

नींद यकीनन आ जाएगी सर के नीचे रक्खो तो
माँ की खुशबू में लिपटा जो एक सिराना रक्खा है

अक्स मेरा भी दिख जाएगा उस दीवार की फोटो में
गहरी सी आँखों में जिसके एक फ़साना रक्खा है

मिल जाएगी पुश्तैनी घर में मिल कर जो ढूंढेंगे 
पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है 

34 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !बेहतरीन आदरणीय 👌
    हर बंद में मुस्कुराता, मुद्द्तों से छुपा खजाना गढ़ रखा है..
    सादर

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  2. मिल जाएगी पुश्तैनी घर में मिल कर जो ढूंढेंगे
    पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है 👌👌👌
    बहुत ही बढ़िया अभिव्यक्ति, नासवा जी।

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  3. माटी की सोंधी खुशबू से तर-ब-तर...बेहद शानदार गज़ल लिखी है आपने...हर बंध प्रभावशाली है👍👌👌
    जी सर....अक्षर(फॉण्ट) ज्यादा छोटे है पोस्ट के कृपया अगर संभव हो तो ध्यान दीजिएगा।

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    1. जी श्वेता जी ... आभार ध्यान दिलाने के लिए ... बड़ा किया है फॉण्ट को अब ... आभार आपका ...

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  4. बेहतरीन रचना

    font बहुत छोटे हैं पढने में दिक्कत हो रही है

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (15-05-2019) को "आसन है अनमोल" (चर्चा अंक- 3335) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. हजूर वैसे तो आँख फाड़ के पढ़ डाली लाजवाब रचना फिर भी थोड़ा फोंट बढ़ा दें तो और आनन्द आये।

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  7. कुछ बचपन की यादें, कंचे, लट्टू, चूड़ी के टुकड़े
    परछत्ती के मर्तबान में ढेर खजाना रक्खा है....,
    लाजवाब...., बेमिसाल..., अत्यन्त सुन्दर ।

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  8. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 14/05/2019 की बुलेटिन, " भई, ईमेल चेक लियो - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  9. पीढ़ी दर पीढ़ी एक जमाना सँभल गयग....
    वाह!

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  10. अक्स मेरा भी दिख जाएगा उस दीवार की फोटो में
    गहरी सी आँखों में जिसके एक फ़साना रक्खा है...
    वाकई मजा आ गया इन लाइनों में । बहुत-बहुत शुभकामनाएँ आदरणीय नसवा जी।

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  11. हम सभी में अतीत के प्रति कुछ न कुछ आसक्ति रहती है लेकिन माँ का प्यार-दुलार अतीतराग में नहीं समाता. यह तो आँखों को नम कर गया-

    नींद यकीनन आ जाएगी सर के नीचे रक्खो तो
    माँ की खुशबू में लिपटा जो एक सिराना रक्खा है

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  12. भावना से ओतप्रोत सुंदर ग़ज़ल ! जाने क्या क्या रखा है पुश्तैनी घर में....बचपन की वो चीजें जिनकी अहमियत किसी खजाने से कम नहीं थी !!! लेकिन सबसे अनमोल यादें तो दादा, दादी, माँ, पिताजी से जुड़ी हुई ही होती हैं। अधिकांश भारतीय कहीं भी रहें अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं। यही हमारी ताकत है। खींच लाती हैं यादें वतन की ओर....

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    1. सहमत आपकी बात से ... बहुत कुछ होता है जो खींचता है अपनी और ... आभार आपका

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  13. मुद्दत से मैं गया नहीं हूँ उस आँगन की चौखट पर
    लस्सी का जग, तवे पे अब तक, एक पराँठा रक्खा है
    बहुत सुंदर यादों से सजी हुई भावपूर्ण प्रस्तुति

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  14. कुछ बचपन की यादें, कंचे, लट्टू, चूड़ी के टुकड़े
    परछत्ती के मर्तबान में ढेर खजाना रक्खा है
    मिल जाएगी पुश्तैनी घर में मिल कर जो ढूंढेंगे
    क्या कहूं आदरणीय दिगम्बर जी | एक से बढ़कर एक मन को भावुक करने वाले और सजीव चित्र समेटे भावपूर्ण शेर | मिटटी से जुड़े और यादों की गली से गुजरते मन के खूबसूरत एहसासात को बड़ी ही संजीदगी और सुघड़ता से शब्दों में पिरोया है आपने | हिंदी गजल की प्राणवायु दे रहा आपका योगदान अतुलनीय है | सस्नेह और सादर शुभकामनाएं|
    पीढ़ी दर पीढ़ी से संभला एक ज़माना रक्खा है

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  15. वाआअह क्या खूब लिखा....

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  16. नींद यकीनन आ जाएगी सर के नीचे रक्खो तो
    माँ की खुशबू में लिपटा जो एक सिराना रक्खा है

    अक्स मेरा भी दिख जाएगा उस दीवार की फोटो में
    गहरी सी आँखों में जिसके एक फ़साना रक्खा है

    बहुत सुन्दर ..

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  17. वाह !!बहुत खूब दिगंबर जी ,आपने तो हमे भी बचपन का रुख करने को विवश कर दिया ,हर सय आँखो के आगे चलचित्र सा घूमने लगा ,सादर नमस्कार आप को

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  18. बहुत शानदार प्रस्तुति।

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  19. टेक्स्ट का फॉन्ट बहुत छोटा है। हो सके तो टेक्स्ट के फॉन्ट साइज़ को बढ़ा करें।

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है ...