सोमवार, 15 जुलाई 2019

मेघ हैं आकाश में कितने घने ...

मेघ हैं आकाश में कितने घने
लौट कर आए हैं घर में सब जने  

चिर प्रतीक्षा बारिशों की हो रही   
बूँद अब तक बादलों में सो रही
हैं हवा में कागजों की कत-रने
मेघ हैं आकाश में ...

कुछ कमी सी है सुबह से धूप में
आसमां पीला हुआ है धूल में  
रेड़ियाँ लौटी घरों को अन-मने
मेघ हैं आकाश में ...

नगर पथ पल भर में सूना हो गया
वायु का आवेग दूना हो गया
रह गए बस पेड़ के सूखे तने
मेघ हैं आकाश में ...

दिन में जैसे रात का आभास है
पहली बारिश का नया एहसास है
मुक्त हो चातक लगे हैं चीखने
मेघ हैं आकाश में ...

चाय भी तैयार है गरमा-गरम
उफ़ जलेबी हाय क्या नरमा-नरम
मिर्च आलू के पकोड़े भी बने
हैं आकाश में ...

46 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (16-07-2019) को "बड़े होने का बहाना हर किसी के पास है" (चर्चा अंक- 3398) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. नमस्कार !
    आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" 16 जुलाई 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. बहुत अच्छी कविता ... आकाश में पकौड़े ... शानदार प्रयोग ...

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  4. इस कविता को यदि सेंट्रल अलाइन कर दें...तो लोग हरिवंश राय बच्चन के एकांत संगीत से लिया समझ लेंगे...लाज़वाब...👌👌👌

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  5. बेहतरीन,
    आपका तो अंदाज़ ही अलग हैं।बेहद खूबसूरती से कहा हैं हर लब्ज़,मज़ा आ गया।

    चाय भी तैयार है गरमा-गरम
    उफ़ जलेबी हाय क्या नरमा-नरम
    मिर्च आलू के पकोड़े भी बने
    हैं आकाश में .

    ये खान पान और लोगो को भी बुला कर करे तो ज्यादा आनंद देगा।हाहाहा
    सादर

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    1. बिलकुल ज़फर जी ... सब मिल के आनद लें तो मजा दुगना हो जाता है ... आभार आपका ...

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  6. पहली बारिश का मजा ही कुछ और हैं। बहुत सुंदर रचना।

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  7. किसी ऋतु परिवर्तन को त्योहार की तरह मनाने का बेहतरीन नमूना हैं आपकी ये पंक्तियाँ-

    चाय भी तैयार है गरमा-गरम
    उफ़ जलेबी हाय क्या नरमा-नरम
    मिर्च आलू के पकोड़े भी बने

    क्या बात है. शब्द इस तरह भी भिगोते जाते हैं.

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  8. आंधी, पीला आसमां..काले मेघा और पहली पहली बारिश..इतने सारे बिम्ब प्रतिबम्ब एक साथ..और साथ में चाय भी आपने तो वर्षा का उत्सव ही मना लिया..

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  9. वाह बहुत खूब लिखा है आपने हर शब्‍द जीवंत कर दिया ।

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  10. वाह !बेहतरीन सृजन सर
    सादर

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  11. वाह !!दिगंबर जी ,क्या बात है !!पहली बारिश की मीठी खुशबू ,बडी मनभावन होती है ।साथ मेंं मिर्च ओर आलू के पकौड़ों ..भाई वाह ,मजा आ गया !

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  12. नगर पथ पल भर में सूना हो गया
    वायु का आवेग दूना हो गया
    रह गए बस पेड़ के सूखे तने
    मेघ हैं आकाश में ...क्या खूूूब लिखा है नासवा जी

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  13. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना गुरुवार १८ जुलाई २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  14. चाय भी तैयार है गरमा-गरम
    उफ़ जलेबी हाय क्या नरमा-नरम
    मिर्च आलू के पकोड़े भी बने
    हैं आकाश में ...
    पहली बारिश और मौसम के मिजाज का खूबसूरत बिम्ब....
    वाह!!!
    हमेशा की तरह लाजवाब रचना...

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  15. मेघ, बरसात ... से जुड़े नए आयाम वाले बिम्ब महाशय ... मन भींगाता, मुँह का स्वाद बढ़ाती रचना ... बस एक बात (अन्यथा ना लें तो) ... जलेबी गर्म-गर्म तो कुरमुरी ही खाने में अच्छी लगती है.... नरमा-नरम तो ठंडा होने पर हो जाती है ... शायद ...☺

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    1. जी सुबोध जी ... आपका कहना ठीक है ... पर क्योंकि चाय में गरमा गरम प्रयोग कर लिया तो इतनी छूट ले ली ... क्योंकि कई लोग नरम जलेबी भी ले लेते हैं ...

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  16. आपका लिखने का अंदाज बिल्कुल अलग और मनहर है नासा जी बहुत सुंदर सृजन।

    दिन में जैसे रात का आभास है
    पहली बारिश का नया एहसास है
    मुक्त हो चातक लगे हैं चीखने
    मेघ हैं आकाश में ...

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  17. एक मस्त सी रचना.... बारिश के मौसम की अपनी ही अलग खुशबू होती है और अपना अलग स्वाद भी !

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  18. चाय भी तैयार है गरमा-गरम
    उफ़ जलेबी हाय क्या नरमा-नरम
    मिर्च आलू के पकोड़े भी बने
    हैं आकाश में ...हाहाहा ....पहली बारिश का असली आनंद तो इन्हीं शब्दों में है

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है ...