सोमवार, 26 अगस्त 2019

क्या मिला सचमुच शिखर ...


क्या मिला सचमुच शिखर ?

मिल गए ऐश्वर्य कितने अनगिनत
पञ्च-तारा जिंदगी में हो गया विस्मृत विगत
घर गली फिर गाँव फिर छूटा नगर
क्या मिला सचमुच ...

कर्म पथ पर आ नहीं पाई विफलता
मान आदर पदक लाई सब सफलता
मित्र बिछड़े चल न पाए साथ अपने इस डगर
क्या मिला सचमुच ...

एकला चलता रहा शुभ लक्ष्य पाया
चक्र किन्तु नियति ने ऐसा घुमाया
ले गई किस छोर पे जाने उठाकर ये लहर
क्या मिला सचमुच ...

उम्र के इस मोड़ पर ना साथ कोई
सोचता हूँ फसल ये कैसी है बोई
खो गया वो रास्ता, जाता था जो मेरे शहर 
क्या मिला सचमुच ...

सोमवार, 19 अगस्त 2019

जाने क्यों आँखें रहती नम नम ...


गीत प्रेम के गाता है हर दम
जाने क्यों आँखें रहती नम नम

नाच मयूरी हो पागल
अम्बर पे छाए बादल
बरसो मेघा रे पल पल
बारिश की बूँदें करतीं छम छम
जाने क्यों आँखें ...

सबके अपने अपने गम
कुछ के ज्यादा कुछ के कम
सह लेता है जिसमें दम
सुन आँसूं पलकों के पीछे थम 
जाने क्यों आँखें ... 

हिस्से में उतना सुख दुःख
जीवन का जैसा है रुख
फिर भी सब कहते हैं सुख 
उनके हिस्से है आया कम कम
जाने क्यों आँखें ...

सोमवार, 12 अगस्त 2019

रोज़ प्रातः बोलते हैं विश्व का कल्याण हो ...

हम कहाँ कहते हैं केवल स्वयं का ही त्राण हो
रोज़ प्रातः बोलते हैं विश्व का कल्याण हो

है सनातन धर्म जिसकी भावना मरती नहीं
निज की सोचें ये हमारी संस्कृति कहती नहीं
हो गुरु बाणी के या फिर बुद्ध का निर्वाण हो  

राम को ही है चुनौती राम के ही देश में
शत्रु क्या घर में छुपा है मित्रता के वेश में?
राम मंदिर का पुनः उस भूमि पर निर्माण हो

मान खुद का ना रखा तो कौन पूछेगा हमें
हम नहीं जागे तो फिर इतिहास खोजेग हमें
दृष्टि चक्षू पर धनुरधर लक्ष्य पर ही बाण हो

कामना इतनी है बस मुझको प्रभू वरदान दे
सत्य पथ का मैं पथिक बन के चलूँ यह ज्ञान दे  
देश हित कुछ कर सकूँ काया तभी निष्प्राण हो 

सोमवार, 5 अगस्त 2019

घास उगी सूखे आँगन ...


धड़ धड़ धड़ बरसा सावन
भीगे, फिसले कितने तन

घास उगी सूखे आँगन
प्यास बुझी ओ बंजर धरती तृप्त हुई
नीरस जीवन से तुलसी भी मुक्त हुई,
झींगुर की गूँजे गुंजन
घास उगी ...

घास उगी वन औ उपवन
गीले सूखे चहल पहल कुछ तेज हुई
हरा बिछौना कोमल तन की सेज हुई
दृश्य है कितना मन-भावन
घास उगी ...

हरियाया है जीवन-धन
कुछ काँटे भी कुछ फूलों के साथ उगे
आते जाते इसके उसके पाँव चुभे
सिहर गया डर से तन मन   
घास उगी ...