सोमवार, 19 अगस्त 2019

जाने क्यों आँखें रहती नम नम ...


गीत प्रेम के गाता है हर दम
जाने क्यों आँखें रहती नम नम

नाच मयूरी हो पागल
अम्बर पे छाए बादल
बरसो मेघा रे पल पल
बारिश की बूँदें करतीं छम छम
जाने क्यों आँखें ...

सबके अपने अपने गम
कुछ के ज्यादा कुछ के कम
सह लेता है जिसमें दम
सुन आँसूं पलकों के पीछे थम 
जाने क्यों आँखें ... 

हिस्से में उतना सुख दुःख
जीवन का जैसा है रुख
फिर भी सब कहते हैं सुख 
उनके हिस्से है आया कम कम
जाने क्यों आँखें ...

59 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (20-08-2019) को "सुख की भोर" (चर्चा अंक- 3433) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. मनोहर अभिव्यक्ति, बधाई

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  3. सबके अपने अपने गम
    कुछ के ज्यादा कुछ के कम
    बहुत सुन्दर कविता... ग़जल की तरह कविता के भाव भी निर्झर की तरह बहते हैं आपकी लेखनी से ।

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  4. हिस्से में उतना सुख दुःख
    जीवन का जैसा है रुख
    फिर भी सब कहते हैं सुख
    उनके हिस्से है आया कम कम
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, दिगम्बर भाई।

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  5.  जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 19 अगस्त 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. सबके हिस्से के अपने-अपने सुख-दुःख हैं...लेकिन मन मयूर तो छोटी-छोटी खुशियों पर नाच लेता है...बेहतरीन रचना...👌👌👌

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  7. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 19/08/2019 की बुलेटिन, "इनाम में घोड़ा लेंगे या सेव - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  8. बहुत सार्थक और सारगर्भित रचना। बहुत सुंदर

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  9. बहुत ही खूबसूरत हमेशा की तरह

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  10. सबके अपने अपने गम
    कुछ के ज्यादा कुछ के कम..... जीवन का पूरा निचोड़
    वाह बहुत खूबसूरत गीत.

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  11. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 20 अगस्त 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  12. सबके अपने अपने गम
    कुछ के ज्यादा कुछ के कम
    सह लेता है जिसमें दम
    सुन आँसूं पलकों के पीछे थम
    जाने क्यों आँखें ...
    बहुत ही सुन्दर...लाजवाब सृजन
    वाह!!!

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  13. सबके अपने अपने गम
    कुछ के ज्यादा कुछ के कम
    सह लेता है जिसमें दम
    सुन आँसूं पलकों के पीछे थम
    जाने क्यों आँखें ... वाहहहह बेहतरीन प्रस्तुति

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  14. गीत प्रेम के गाता है हर दम
    जाने क्यों आँखें रहती नम नम,...आ जा मेरे भाई मेरे पास...कुछ देर गम बाँट ले अपना..फिर खुशी खुशी लौट जाना... !

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    1. मन तो बहुत करता है समीर भाई की डूब जाओ ... छोड़ दो सब कुछ पर फिर ...
      बहुत समय हो गया मुलाक़ात हुए ... सबब बनाओ मिलने का अब ...

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  15. वाह!!दिगंबर जी ,खूबसूरत भावाभिव्यक्ति !सही कहा आपने ,सभी को अपने हिस्से का सुख दूसरों से कम ही लगता है ...मानव प्रकृति ..।

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  16. वाह.. बहुत खूबसूरत कविता.. भावनाओं को उकेरती।
    बहुत बढ़िया

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  17. बहुत सुंदर सृजन आंखें क्यों है नमः-नम।
    जिंदगी के प्रति हर व्यक्ति की सटीक यही दृष्टि कि उसके हिस्से खुशियां है कम ज्यादा है ग़म।
    अनुपम।

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  18. जिसके अंतर में प्रेम का दरिया बहता हो उसकी आँखें नम नहीं होंगी तो भला किसकी होंगी..सुख-दुःख तो आँख मिचौली खेलते हैं, एक छुपता है तो दूसरा उसे ढूँढ़ता है, यदि दोनों साथ-साथ आ जाएँ तो खेल ही खत्म हो जाये...

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    1. आपका कहना उचित है ... दोनों साथ नहीं आते जीवन में ...
      बहुत आभार आपका ...

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  19. अपना दुःख सभी को पहाड़ सा लगता है लेकिन जो संवेदनशील होते हैं वे सबका दुःख अपना ही समझते हैं
    बहुत अच्छी रचना

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  20. सबके अपने अपने गम
    कुछ के ज्यादा कुछ के कम
    सह लेता है जिसमें दम
    सुन आँसूं पलकों के पीछे थम
    जाने क्यों आँखें ...सदैव की तरह बहुत ही शानदार !

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  21. हिस्से में उतना सुख दुःख
    जीवन का जैसा है रुख
    फिर भी सब कहते हैं सुख
    बहुत कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ कह दिया इन शब्दों में ...लाजबाज

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  22. सबके अपने अपने गम
    कुछ के ज्यादा कुछ के कम... बहुत सुन्दर बात कही, जीवन का दर्शन बस चंद शब्दों मे ! हमेशा की तरह एक और सुन्दर और सार्थक रचना

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  23. अपने अपने गम
    कुछ के ज्यादा कुछ के कम
    सह लेता है जिसमें दम
    सुन आँसूं पलकों के पीछे थम


    bahut hi khoobsurti se gham byan kr diyaa....ye baat bahut psnd aayi

    bdhaayi rchnaa ke liye

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