सोमवार, 9 सितंबर 2019

एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ ...


मैं कई गन्जों को कंघे बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ सपने बेचता हूँ

काटता हूँ मूछ पर दाड़ी भी रखता 
और माथे के तिलक तो साथ रखता  
नाम अल्ला का भी शंकर का हूँ लेता
है मेरा धंधा तमन्चे बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ ...

धर्म का व्यापार मुझसे पल रहा है
दौर अफवाहों का मुझसे चल रहा है  
यूँ नहीं तो शह्र सारा जल रहा है
चौंक पे हर बार झगड़े बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ ...

एक ही गोदाम में है माल सारा  
गाड़ियाँ, पत्थर, के झन्डा हो के नारा
हर गली, नुक्कड़ पे सप्लाई मिलेगी    
टोपियों के साथ चमचे बेचता हूँ
एक सौदागर हूँ ...

हर विपक्षी का कहा लिखता रहा हूँ  
जो कहे सरकार मैं जपता रहा हूँ
मैं ही टी.वी., मीडिया, अख़बार नेट मैं
यार हूँ पैसे का ख़बरें बेचता हूँ 
एक सौदागर हूँ ...

50 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (10-09-2019) को     "स्वर-व्यञ्जन ही तो है जीवन"  (चर्चा अंक- 3454)  पर भी होगी।--
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सही कहा दिगम्बर भाई कि सौदागर का कोई धर्म नहीं होता। सौदागर सिर्फ़ सौदागर होता हैं। बहुत सुंदर।
    आपके ब्लॉग पर कई बार अभी भी कॉमेंट बॉक्स खुलता नहीं हैं। अभी खुल गया इसलिए कॉमेंट कर पाई।

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    1. जी ... बहुत आभार ...
      कमेन्ट बॉक्स का कुछ समझ नहीं आता कहाँ गलत हो रहा है

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 10 सितम्बर 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. व्यवसायी केवल स्वयं का लाभ देखता है ..समसामयिकता पर बहुत सुन्दर सृजन ।

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  5. लगता है इस आधुनिक सौदागर का धर्म, कर्म, ईमान सभी पैसा ही है. धन्यवाद इसकी हकीकत से रूबरू कराने के लिए..

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  6. नाम अल्ला का भी शंकर का हूँ लेता
    है मेरा धंधा तमन्चे बेचता हूँ

    बेहतरीन सर्।बेहद उम्दा रचना।दिल को छू गयी।
    शब्दो और भावनाओं को सही उकेरा हैं।

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  7. वाह..सर बहुत सराहनीय..शानदार अभिव्यक्ति👍

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  8. शानदार कटाक्ष है नासा जी, आधुनिक अशांति आतंक और मौत के सौदागरों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है।
    सार्थक यथार्थ रचना ।

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  9. इस धन्धे में लागत कम...और मुनाफ़ा ज़्यादा है...बहुत ख़ूब लिखा है आपने...👌👌👌

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  10. मैं ही टी.वी., मीडिया, अख़बार नेट मैं
    यार हूँ पैसे का ख़बरें बेचता हूँ
    ...उत्कृष्ट सृजन आनंद आ गया नासवा जी।

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  11. शुरू से आखिर तक हर एक शब्द में कहानी पिरोई हुई। फेसबुक पर साझा करने की अनुमति चाहूँगी।

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  12. हर विपक्षी का कहा लिखता रहा हूँ
    जो कहे सरकार मैं जपता रहा हूँ
    मैं ही टी.वी., मीडिया, अख़बार नेट मैं
    यार हूँ पैसे का ख़बरें बेचता हूँ
    एक सौदागर हूँ ...
    वाह वाह!!!!!क्या बात... लाजवाब कटाक्ष, समसामयिक... सटीक....
    बबाल मचाये हुए है ये सौदागर देश में...
    बहुत लाजवाब।

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  13. ऐसे ही सौदागैरों की भरमार है आजकल जो सब जगह सहजता से मिल जाते हैं,
    सटीक सामयिक प्रस्तुति

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  14. वाह!!दिगंबर जी ,क्या बात कही है ,लाजवाब !!
    ऐसे सौदागरों को ढूँढना नहीं पडता ,हर जगह मिल जाते हैं ।

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  15. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (14-09-2019) को " हिन्दीदिवस " (चर्चा अंक- 3458) पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

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  16. हर विपक्षी का कहा लिखता रहा हूँ
    जो कहे सरकार मैं जपता रहा हूँ
    मैं ही टी.वी., मीडिया, अख़बार नेट मैं
    यार हूँ पैसे का ख़बरें बेचता हूँ
    एक सौदागर हूँ ...स्वागत ! एक सुन्दर रचना का

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  17. आम आदमी की यह बात आपने बयाँ कर दी-

    मैं ही टीवी, मीडिया, अख़बार, नेट मैं
    यार हूँ पैसे का ख़बरें बेचता हूँ

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है ...