सोमवार, 11 नवंबर 2019

कोशिश ... माँ को समेटने की

आने वाली किताब “कोशिश ... माँ को समेटने की” में सिमटा एक पन्ना ...

तमाम कोशिशों के बावजूद 
उस दीवार पे
तेरी तस्वीर नहीं लगा पाया

तूने तो देखा था

चुपचाप खड़ी जो हो गई थीं मेरे साथ
फोटो-फ्रेम से बाहर निकल के

एक कील भी नहीं ठोक पाया था   
सूनी सपाट दीवार पे

हालांकि हाथ चलने से मना नहीं कर रहे थे 
शायद दिमाग भी साथ दे रहा था
पर मन ...
वो तो उतारू था विद्रोह पे 

ओर मैं ....

मैं भी समझ नहीं पाया
कैसे चलती फिरती मुस्कुराहट को कैद कर दूं
फ्रेम की चारदिवारी में  

तुम से बेहतर मन का द्वन्द कौन समझ सकता है माँ ... 
(दिसंबर २८, २०१२)

#कोशिश_माँ_को_समेटने_की

40 टिप्‍पणियां:

  1. मैं भी समझ नहीं पाया
    कैसे चलती फिरती मुस्कुराहट को कैद कर दूं
    फ्रेम की चारदिवारी में
    तुमसे बेहतर मन का द्वन्द कौन समझ सकता है माँ...
    माँ से इतना मर्मस्पर्शी संवाद.. समेट लिया है भावों में आपने माँ को । संग्रहणीय रचना ।

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 11 नवम्बर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. तमाम कोशिशों के बावजूद
    उस दीवार पे
    तेरी तस्वीर नहीं लगा पाया
    बेहद हृदयस्पर्शी रचना

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (12-11-2019) को    "आज नहाओ मित्र"   (चर्चा अंक- 3517)  पर भी होगी। 
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाई।  
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. दिगम्बर भाई,
    मैं भी समझ नहीं पाया कैसे चलती फिरती मुस्कुराहट को कैद कर दूं फ्रेम की चारदिवारी में तुम से बेहतर मन का द्वन्द कौन समझ सकता है माँ ...
    माँ के प्रति अपने प्यार को बहुत ही सुंदर शब्दों में व्यक्त किया हैं आपने।

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  6. निशब्द! कुछ ही शब्दों में इतनी अथाह बात कहना , बेहतरीन/बेमिसाल।
    मन को छू गई हर पंक्ति।

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  7. बहुत सुंदर भावपूर्ण पक्तियां।
    ओकी किताब के लिए शुभकामनाएं, हमे भी link दीजियेगा आर्डर करने का।
    आभार

    कैसे चलती फिरती मुस्कुराहट को कैद कर दूं
    फ्रेम की चारदिवारी में

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  8. कैसे चलती फिरती मुस्कुराहट को कैद कर दूं
    फ्रेम की चारदिवारी में
    दुनिया का सबसे मुश्किल काम हैं ये ,हृदयस्पर्शी रचना ,शायद इसे रचना कहना भी उचित ना हो ये तो मन के अछूते भाव हैं ,सादर नमस्कार आपको

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  9. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 12 नवंबर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद! ,

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  10. शब्द कहाँ से लाये कोई उस रचना की सराहना में जिसमे माँ को समेटने की कोशिश हो वो माँ जो अब तक समेटे है हमारे सारे दुःख सुख। .अपने दुःख में भी हमारे सुख की कामना समेटे  
    कहाँ से प्रयोग करे ऐसे अलंका उस रचना के लिए जिसमे माँ को समेटने की कोशिश हो 
    हम्म ...मन को छू गई हर पंक्ति

    बहुत बहुत आभार 

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  11. माँ हरदम साथ है तो उसे फोटो के रूप मे दीवार पर क्यों टाँगा जाए.
    बहुत सुंदर भाव.

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  12. माँ को समेटने की कोशिश बेहतरीन लिखा है, पढ़कर आननद आ गया।

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  13. आदरणीय आपकी रचना"यादों की चासनी" पर टिप्पणी करने में असफल हो रही हूँ। आपकी श्रेष्ठ के लिए आप यहीं पर बधाई स्वीकार करें। बहुत ही बेहतरीन रचना है आपकी।

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  14. शब्दों ने दिल जीत लिया और विषय बहुत ही अच्छा चुना है आपने

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  15. कवि की माँ होना शायद दुनिया का सबसे बड़ा सौभाग्य है |माँ है तो संवाद है| नहीं है तो हर पल मन का वार्तालाप होता है माँ से | वो भी सबके होते माँ के ही अवलंबन का मोह कितना अच्छा लहता है --
    तुम से बेहतर मन का द्वन्द कौन समझ सकता है माँ .
    सचमुच माँ एक ही होती है जिसे जितना समेटना चाहे कोई समेट नहीं पाता | इतनी विराट हस्ती जो होती है माँ की | बहुत मार्मिक जीवंत चित्र उकेरती रचना के लिए हार्दिक आभार और शुभकामनायें दिगम्बर जी | माँ की यादों को सहेजने की आपकी ये कोशिश सफल हो मेरी यही दुआ है | सादर --

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    1. ये कोशिश ख़ुद को ही समेटने की है ... माँ के विशाल आभा को समेटना मुमकिन कहाँ ...
      बहुत आभार आपका ...

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  16. मां तो परिवार की आत्मा होती है ,और मां के बारे में लिखना, जितना लिखे उतना ही कम पड़ जाती है. अति सुंदर रचनाएं हैं आपका सर

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    1. बहुत आभार माया जी ...
      पने सच कहा है ... माँ को समेटना आसन नहीं है शब्दों में ... उसे बस जिया जा सकता है ...

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है