सोमवार, 6 जनवरी 2020

माँ - एक एहसास


एक और पन्ना कोशिश, माँ को समेटने की से ... आपका प्रेम मिल रहा है इस किताब को, बहुत आभार है आपका ... कल पुस्तक मेले, दिल्ली में आप सब से मिलने की प्रतीक्षा है ... पूरा जनवरी का महीना इस बार भारत की तीखी चुलबुली सर्दी के बीच ...
  
लगा तो लेता तेरी तस्वीर दीवार पर
जो दिल के कोने वाले हिस्से से
कर पाता तुझे बाहर

कैद कर देता लकड़ी के फ्रेम में
न महसूस होती अगर  
तेरे क़दमों की सुगबुगाहट 
घर के उस कोने से
जहाँ मन्दिर की घंटियाँ सी बजती रहती हैं  

भूल जाता माँ तुझे
न देखता छोटी बेटी में तेरी झलक
या सुबह से शाम तेरे होने का एहसास कराता 
अपने अक्स से झाँकता तेरा चेहरा

के भूल तो सकता था रौशनी का एहसास भी 
जो होती न कभी सुबह
या भूल जाता सूरज अपने आने की वजह 

ऐसी ही कितनी बेवजह बातों का जवाब
किसी के पास नहीं होता ...

#कोशिश_माँ_को_समेटने_की 

16 टिप्‍पणियां:

  1. भूल जाता माँ तुझे
    न देखता छोटी बेटी में तेरी झलक
    या सुबह से शाम तेरे होने का एहसास कराता
    अपने अक्स से झाँकता तेरा चेहरा
    बेहद हृदयस्पर्शी रचना 👌👌

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  2. माँ की झलक बेटियों में..., माँँ के कदमों की सुगबुगाहट हर समय अपने आस-पास...,ऐसा भाव और स्नेह भला लकड़ी के फ्रेम में कैसे समा सकता है ? अत्यंत सुन्दर
    सृजन ।

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (07-01-2020) को   "साथी कभी साथ ना छूटे"   (चर्चा अंक-3573)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  4. कैद कर देता लकड़ी के फ्रेम में
    न महसूस होती अगर
    तेरे क़दमों की सुगबुगाहट
    घर के उस कोने से
    जहाँ मन्दिर की घंटियाँ सी बजती रहती हैं

    जब माँ के कदमों की सुगबुगाहट महसूस हो अपनो के चेहरे में माँ का अक्स हो फिर माँ को फ्रेम में लगाकर फूलमाला से सजाना गलत ही है....दिल के कोने में रहती माँ!!!
    वाह!!!!
    बहुत ही लाजवाब उत्कृष्ट रचना

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  5. कैद कर देता लकड़ी के फ्रेम में
    न महसूस होती अगर
    तेरे क़दमों की सुगबुगाहट

    जीवंत अहसास को जीने का रास्ता मिल जाता है. बहुत सुंदर.

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  6. वाह! बहुत सुंदर पंक्तियाँ।

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  7. भूल जाता माँ तुझे
    न देखता छोटी बेटी में तेरी झलक
    या सुबह से शाम तेरे होने का एहसास कराता
    अपने अक्स से झाँकता तेरा चेहरा

    हर तरह तू ही तू माँ ..... दिल की अतल गहराई को छूती पंक्तियाँ

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  8. के भूल तो सकता था रौशनी का एहसास भी
    जो होती न कभी सुबह
    या भूल जाता सूरज अपने आने की वजह

    ऐसी ही कितनी बेवजह बातों का जवाब
    किसी के पास नहीं होता ...सदैव की तरह अद्भुत , सम्मानित और बेहतरीन शब्द !!

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  9. यह किताब मील का पत्थर साबित होगी एक बेटा का अपनी माँ के लिये अतुलनीय भाव और उनकी अभिव्यक्ति के लिये . मैंने देखा कि एक पूरे साल आपने माँ की याद में ही बड़ी मार्मिक कविताएं लिखीं . माँ के लिये ऐसा भाव मैंने कहीं नहीं देखा . मेरा हृदय श्रद्धा से भर उठा था . आप लगभग रोज लिखते हैं . मैं रोज नहीं पढ़ पाती पर जब भी पढ़ती हूँ एकसाथ पढ़ती हूँ . आप सच्चे अर्थों में वाणीपुत्र हैं

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  10. wow nice man, your blog traffic is good and there are lots of visitors, hopefully there will be more visits. thank you

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  11. भूल जाता माँ तुझे
    न देखता छोटी बेटी में तेरी झलक
    या सुबह से शाम तेरे होने का एहसास कराता
    अपने अक्स से झाँकता तेरा चेहरा

    बहुत खूब जनाब,हमेशा की तरह।
    दिल्ली के पास ही होता तो जरूर आ जाता।माफी चाहता हूं

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