बुधवार, 8 अप्रैल 2020

हैंग-ओवर उम्मीद का ...


एहसास ... जी हाँ ... क्यों करें किसी दूसरे के एहसास की बातें, जब खुद का होना भी बे-मानी हो कभी कभी ... अकसर ज़िन्दगी गुज़र जाती है खुद को च्यूंटी काटते ... जिन्दा हूँ, तो जिन्दा होने एहसास क्यों नहीं होता  ... 

उँगलियों में चुभे कांटे
इसलिए भी गढ़े रहने देता हूँ 
की हो सके एहसास खुद के होने का

हालाँकि करता हूँ रफू ... जिस्म पे लगे घाव
फिर भी दिन है की रोज टपक जाता है ज़िन्दगी से 

उम्मीद घोल के पीता हूँ हर शाम    
कि बेहतर है सपने टूटने से
उम्मीद के हैंग-ओवर में रहना

सिवाए इसके की खुदा याद आता है
वजह तो कुछ भी नहीं तुम्हें प्रेम करने की 

और वजह जंगली गुलाब के खिलने की ...?
ये कहानी फिर कभी ...

#जंगली_गुलाब

39 टिप्‍पणियां:

  1. उम्मीद घोल के पीता हूँ हर शाम
    कि बेहतर है सपने टूटने से
    उम्मीद के हैंग-ओवर में रहना

    वाह क्या कहने सर..बेहतरीन बहुत सुंदर भाव पिरोया है आपने।
    सादर।

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा गुरुवार(०९-०४-२०२०) को 'क्या वतन से रिश्ता कुछ भी नहीं ?'( चर्चा अंक-३६६६) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

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  3. वाह. ये कहानी फिर सही. बहुत बढ़िया.

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  4. "हालाँकि करता हूँ रफू ... जिस्म पे लगे घाव
    फिर भी दिन है की रोज टपक जाता है ज़िन्दगी से"
    बेहद भावपूर्ण सृजन नासवा जी ।

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  5. बेहतर है जिंदगी के हैंग ओवर में रहना ।
    क्या बात कही आपने !

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  6. उँगलियों में चुभे कांटे
    इसलिए भी गढ़े रहने देता हूँ
    की हो सके एहसास खुद के होने का...
    सर, आपकी अभिव्यक्ति के इस खूबसूरत अंदाज का क्या कहना! बस कत्ल किए जाते हैं और खरोच तक नहीं। यूँ ही, कातिल बने रहें ....अनन्त शुभकामनाएँ ।

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    1. आमद आ गया आपकी टिप्पणी पर ... बहुत आभार आपका ...

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  7. बेवजह कुछ भी नहीं संसार, जीने के लिए वजह जरुरी है
    बहुत अच्छी रचना

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  8. हाँ ,कभी कभी उम्मीद का दामन फटने लगता हैं जगह जगह से , मगर रफू तो करना ही होता ,जिन्दा रहने के अहसास के लिए , सुंदर भावपूर्ण सृजन , सादर नमस्कार

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  9. इस हैंगओवर में कितनों की जींद तबाह हुई है.
    उम्मीदों ने जितने दिल बहला रखें है.. ये हमेशां खुश रहे आबाद रहे.
    लाजवाब रचना.

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  10. उम्मीद पर दुनिया कायम है.. इसलिए इसका दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए, मगर दिन जब लहू बनकर टपकने लगे तो बात कुछ ज्यादा ही गमगीन नहीं हो रही, जिन्दा रहने का अहसास तो जंगली गुलाब सपने में भी दे देता है, फिर इतनी मायूसी का सबब ?

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    1. कभी का ही यूँ ही रहती है ये मायूसी ...
      आपका आभार 🙏🙏

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  11. हालाँकि करता हूँ रफू ... जिस्म पे लगे घाव
    फिर भी दिन है की रोज टपक जाता है ज़िन्दगी से
    सही कहा...एकदम सटीक...
    पर उम्मीद का हैंग ओवर भी अच्छा ऑप्शन है
    और ये जंगली गुलाब!!! अक्सर बहुत ही खूबसूरत खिलता है आपकी रचनाओं में...जो भुलाये नहीं भुलाया जाता मुझ जैसे पाठकों से..
    बड़ी इच्छा होती है इसके रहस्य को जानने की
    पर ये फिर कभी...जाने कब?

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  12. उँगलियों में चुभे कांटे
    इसलिए भी गढ़े रहने देता हूँ
    की हो सके एहसास खुद के होने का- ----------ओह ! पिघलते हुए शब्दों से दर्द के टपकने का एहसास ! सहन शक्ति का अतिक्रमण ! परिस्थिति ऐसी की अनुभूतियाँ भी दम तोड़ दें ! दर्द इतना गहरा कि खुद के होने के एहसास के लिए कांटों का चुभन ! कितनी खूबसूरत पंक्तियाँ हैं ! बहुत सुंदर आदरणीय ।

    हालाँकि करता हूँ रफू ....जिस्म पे लगे घाव
    फिर भी दिन है कि रोज टपक जाती है ज़िंदगी से

    उम्मीद घोल के पीता हूँ हर शाम
    कि बेहतर है सपने टूटने से
    उम्मीद के हैग ओवर में रहना- ------- अहा ! अहा!! कैसे तारीफ करूं ! तारीफ के शब्द रचना के शब्दों के आगे नतमस्तक हैं ! उम्मीद के हैंग ओवर से सपनों के टुटन को बचाने की कोशिश ! किसी रचना के सौन्दर्य उन्नयन में पीड़ा की सकारात्मक भूमिका इससे बेहतर और क्या हो सकती है ! लाजवाब प्रस्तुति आदरणीय ! बहुत खूब ।

    सिवाए इसके की खुदा याद आता है
    वजह तो कुछ भी नहीं तुम्हें प्रेम करने की

    और वजह जंगली गुलाब के खिलने की ....?
    ये कहानी फिर कभी .....
    क्या कहने हैं ! सुंदर !! अति सुंदर !! मुहब्बत खुदा की इबादत से कम होती है क्या !
    जंगली गुलाब ! कभी भावनाओं के सागर का ! कभी भावनाओं के मरूस्थल का ! संवेदनाओं के चहलकदमी करता हुआ जीवंत शब्द ........
    आदरणीय दिगम्बर सर ! बहुत ही खूबसूरत रचना ! जितनी तारीफ की जाय, कम है ! बहुत सुंदर ।

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  13. उम्मीद घोल के पीता हूँ हर शाम
    कि बेहतर है सपने टूटने से
    उम्मीद के हैंग-ओवर में रहना ,लाजवाब ,बधाई हो आपको

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  14. उम्मीद घोल के पीता हूँ हर शाम
    कि बेहतर है सपने टूटने से
    उम्मीद के हैंग-ओवर में रहना
    उम्मीद ही से तो जीने की प्रेरणा मिलती हैं। बहुत सुंदर रचना, दिगंबर भाई।

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  15. हालाँकि करता हूँ रफू ... जिस्म पे लगे घाव
    फिर भी दिन है की रोज टपक जाता है ज़िन्दगी से बेहद खूबसूरत रचना 👌

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  16. हालाँकि करता हूँ रफू ... जिस्म पे लगे घाव
    फिर भी दिन है की रोज टपक जाता है ज़िन्दगी से
    शब्दों को गढ़ना और उनको खूबसूरत बना देना।  अद्भुत कला है आपकी 

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