सोमवार, 18 मई 2020

किसका खेल


कितना कुछ होता रहता है

और सच तो ये भी है
कितना कुछ नहीं भी होता ...

फिर भी ...

बहुत कुछ जब नहीं हो रहा होता  
कायनात में कुछ न कुछ ज़रूर होता रहता है

जैसे ... 

मैंने डाले नहीं, तुमने सींचे नहीं
प्रेम के बीज हैं अपने आप ही उगते रहते हैं  

उठती हैं, मिटती हैं, फिर उठती हैं
लहरों की चाहत है पाना

प्रेम खेल रहा है मिटने मिटाने का खेल सदियों से

जालसाजी कायनात की ...
कसूर तेरी आँखों का ...
या खेल .... जंगली गुलाब का ...


#जंगली_गुलाब

60 टिप्‍पणियां:

  1. वाह सुंदर अभिव्यक्ति सर।

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  2. मैंने डाले नहीं, तुमने सींचे नहीं
    प्रेम के बीज हैं अपने आप ही उगते रहते हैं
    बहुत खूब, बहुत सुंदर भाव !!!

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  3. ये जंगली गुलाब दिन पर दिन खतरनाक होता जा रहा है कोरोना काल में भी :)

    लाजवाब।

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    1. लाल तो ज़रूर हो रहा है ... हा हा ...
      बहुत आभार आपका ...

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  4. बहुत कुछ जब नहीं हो रहा होता
    कायनात में कुछ न कुछ ज़रूर होता रहता है..
    बहुत खूब... जंगली गुलाब की एक और लाजवाब कड़ी । बहुत सुन्दर ।

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  5. उठती हैं, मिटती हैं, फिर उठती हैं
    लहरों की चाहत है पाना


    ..वाह क्या बात कही आपने।।।एकदम सत्य।

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  6. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १९ मई २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  7. जीवन सतत क्रियाशील है,बिना कुछ किये भी बहुत कुछ घट जाता है.

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  8. मैंने डाले नहीं, तुमने सींचे नहीं
    प्रेम के बीज हैं अपने आप ही उगते रहते हैं
    बहुत खूब, बहुत सुंदर भाव ,बधाई हो ,शुभ प्रभात

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  9. दिगम्बर भाई, वास्तव में प्रेम के बीज उगते तो अपने आप हैं लेकिन जब तक हम उन्हें सींचते नहीं हैं तब तक वे पनपते नही हैं, यह भी एक कडवी सच्चाई हैं।

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  10. वाह ! प्रेम की सुंदर परिभाषा, वाकई प्रेम अपने आप होता है, मोह किया जाता है, संसार में मोह को ही प्रेम मान लिया जाता है और फिर कड़वी सच्चाई से रूबरू होना पड़ता है. मोह की दलदल से जो पार हो गया वही गुलाब का हकदार बनता है अब चाहे वह जंगली हो या देशी ...

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    1. प्रेम और मोह के भाव को कृष्ण ने बाखूबी अपने व्यव्हार में रखा है ... आभार आपका ...

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  11. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (20-05-2020) को "फिर होगा मौसम ख़ुशगवार इंतज़ार करना "     (चर्चा अंक-3707)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --   
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  12. सच है कि ये अनौखे बीजउगाने से नहीं उगते बल्कि अपने आप ही जाने कब किस माटी में नमी पाकर अंकुरित हो जाते हैं . बहुत सुन्दर रचना

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  13. प्रेम खेल रहा है मिटने मिटाने का खेल सदियों से
    सुंदर सृजन

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  14. जालसाजी कायनात की ...
    कसूर तेरी आँखों का ...
    या खेल .... जंगली गुलाब का ...
    बहुत खूब ,बड़ा मुश्किल हैं इस सवाल को समझना ही.....,बस खेल ही समझ ले....,सादर नमन आपको

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  15. जालसाजी कायनात की ...
    कसूर तेरी आँखों का ...
    या खेल .... जंगली गुलाब का ...

    बहुत ही शानदार

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  16. बहुत कुछ जब नहीं हो रहा होता
    कायनात में कुछ न कुछ ज़रूर होता रहता है
    वाह!!!
    प्रेम खेल रहा है मिटने मिटाने का खेल सदियों से....
    प्रेम के बीज स्वयं उगते हैं कहाँ उगना है ये भी स्वयं ही तय करते हैं ।
    बहुत ही सुन्दर सार्थक लाजवाब सृजन...

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  17. प्रेम की सुंदर अभिव्यक्ति
    वाह

    पढ़े--लौट रहे हैं अपने गांव

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  18. अच्छी कविता भाई साहब |स्वस्थ और सुरक्षित रहें |

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  19. सदियों से चल रहे इस खेल को बहुत खूबसूरती से आपने अभिव्यक्त किया है. बधाई.

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  20. आप तो कहर ढा रहे हैं और आपके इन जंगली गुलाबों का तो कहना ही क्या

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    1. जी बस ये खुशबू यूँ ही बनी रहे ... आभार आपका ...

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  21. मैंने डाले नहीं, तुमने सींचे नहीं
    प्रेम के बीज हैं अपने आप ही उगते रहते हैं

    लाजवाब भावाव्यक्ति

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  22. इक और जंगली गुलाब :) और जंगली गुलाब की ही तरह मंद मंद खुशबू से लबरेज़

    मनमोहक रचना

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  23. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति आदरणीय सर.
    सादर

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  24. वाह बहुत ही शानदार सृजन नासवा जी।
    उम्दा/बेहतरीन।

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  25. बहुत शानदार अभिव्यक्ति नासवा जी।
    उमर्दा/बेहतरीन।

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  26. मैंने डाले नहीं, तुमने सींचे नहीं
    प्रेम के बीज हैं अपने आप ही उगते रहते हैं ....जंगली गुलाब अपना खूब असर दिखा रहा है ..hahaha

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है