सोमवार, 29 जून 2020

चन्द यादों के कुछ करेले हैं ...


गम के किस्से, ख़ुशी के ठेले हैं
ज़िन्दगी में बहुत झमेले हैं

वक़्त का भी अजीब आलम है
कल थी तन्हाई आज मेले हैं

बस इसी बात से तसल्ली है
चाँद सूरज सभी अकेले हैं

भूल जाते हैं सब बड़े हो कर
किसके हाथों में रोज़ खेले हैं

चुप से बैठे हैं आस्तीनों में
नाग हैं या के उसके चेले हैं

टूट जाते हैं गम की आँधी से
लोग मिट्टी के कच्चे ढेले हैं

कितने मीठे हैं आज ये जाना
चन्द यादों के कुछ करेले हैं

खोल के ज़ख्म सब दिखा देंगे
मत कहो तुमने दर्द झेले हैं

50 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दिनों बाद बेहद शानदार जानदार गज़ल लिखी आपने सर।
    हर बंध लाजवाब है।
    सादर।

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  2. वक़्त का भी अजीब आलम है
    कल थी तन्हाई आज मेले हैं

    बस इसी बात से तसल्ली है
    चाँद सूरज सभी अकेले हैं
    कई दिनों के बाद एक खूबसूरत सी ग़ज़ल का आग़ाज़.. जीवनानुभव पर शाश्वत सृजन ..बहुत सुन्दर ।

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  3. वाह!दिगंबर जी ,क्या बात है !लाजवाब !

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  4. वाह दिगम्बर जी बहुत सुन्दर

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  5. होंगे नहीं तो भी बना देंगे
    जख्म अगर नहीं भी झेले हैं :)

    लाजवाब।

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  6. चन्द यादों के कुछ करेले हैं

    नया बिम्ब
    वाह

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  7. खोल के ज़ख्म सब दिखा देंगे
    मत कहो तुमने दर्द झेले हैं
    बहुत खूब ,शानदार गजल

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  8. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" गुरुवार 30 जून 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  9. टूट जाते हैं गम की आँधी से
    लोग मिट्टी के कच्चे ढेले हैं

    कितने मीठे हैं आज ये जाना
    चन्द यादों के कुछ करेले हैं

    बेमिसाल अशआर

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  10. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 30 जून 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  11. कितने मीठे हैं आज ये जाना
    चन्द यादों के कुछ करेले हैं
    वाह! वाह!! और सिर्फ वाह!!!

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  12. बहुत ही शानदार गजल, दिगंबर भाई।

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  13. कितने मीठे हैं आज ये जाना
    चन्द यादों के कुछ करेले हैं
    बहुत खूब ,जीवन के छोटी छोटी बारीकियों को समेटता शानदर गजल ,सादर नमन आपको

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  14. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (01-07-2020) को  "चिट्टाकारी दिवस बनाम ब्लॉगिंग-डे"    (चर्चा अंक-3749)   पर भी होगी। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  15. वाह ! उम्दा गजल, जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों से बुनी सुंदर रचना

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  16. बस इसी बात से तसल्ली है
    चाँद सूरज सभी अकेले हैं
    वाह!!!
    टूट जाते हैं गम की आँधी से
    लोग मिट्टी के कच्चे ढेले हैं
    क्या बात....
    लाजवाब गजल आपकी एक से बढ़कर एक शेर
    वाह वाह।

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  17. आपकी रचना का बेसब्री से इंतज़ार होता हैं जानती हूँ कुछ बहुत ही रोचक पढ़ने को मिलेगा और आज तक कभी निराश नहीं हुई
    जंगली गुलाबों की प्यारी थी इस कड़वे करेले की लज़्ज़त उतनी ही जायेकेदार है

    कितने मीठे हैं आज ये जाना
    चन्द यादों के कुछ करेले हैं

    बस इसी बात से तसल्ली है
    चाँद सूरज सभी अकेले हैं

    चुप से बैठे हैं आस्तीनों में
    नाग हैं या के उसके चेले हैं

    एक से बढ़ कर एक , सच आज तो ब्लॉग जगत में आना सार्थक हुआ

    बहुत बहुत आभार एशिया लिखने के लिए
    सादर नमस्कार

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    1. आपका आना गज़ल को सार्थक कर गया ... बहुत आभार ...

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  18. बस इसी बात से तसल्ली है
    चाँद सूरज सभी अकेले हैं.....
    कितने मीठे हैं आज ये जाना
    चन्द यादों के कुछ करेले हैं
    शीर्षक में रखा करेला भी मीठा है जब पता चलता है कि वो भी सहेजी हुई यादों का हिस्सा है जिन्हें पाल कर रखना ज़रूरी लगता है. यह आपकी लेखनी से संभव हुआ. बहुत खूब.

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    1. करेले मीठे भी होते हैं ... बहुत आभार आपका सर ...

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  19. भूल जाते हैं सब बड़े हो कर
    किसके हाथों में रोज़ खेले हैं...हृदयस्पर्श सृजन सर.
    याद रहता है परंतु उन हाथों का मरहम नहीं बन सकते.
    सादर प्रमाण

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  20. जीवन का फलसफा छुपा है आप के शब्दों में

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  21. वाह ! आदरणीय बहुत बहुत ही सुन्दर कमाल की अभिव्यक्ति है वाकई यादों के करेलों सा मीठा कुछ नहीं। छोटी सी ग़ज़ल में पुरे जीवन का ताना बाना बुन डाला आपने
    एक एक पंक्ति एक एक शब्द क़ाबिले तारीफ़ सच बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

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  22. बहुत सुंदर प्रस्तुति

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है