सोमवार, 8 जून 2020

सच के झूठ ... क्या सच ...


सच
जबकि होता है सच
लग जाती है
मुद्दत
सच की ज़मीन पाने में

झूठ
जबकि नहीं होता सच
फ़ैल जाता है
आसानी से
सच हो जैसे

हालांकि अंत
जबकि रह जाता है
केवल सच
पर सच को मिलने तक
सच की ज़मीन
झूठ हो जाती है
तमाम उम्र

तो क्या है सच 
ज़िन्दगी ... 
या प्राप्ति 
सच या झूठ की ...

52 टिप्‍पणियां:

  1. गहन सोच ... बहुत सुन्दर रचना ।

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  2. सच को ज़मीन नहीं मिलती, यह दुख देता है। जाने ज़िंदगी क्या है? विचारपूर्ण रचना।

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  3. जमाना
    बदल गया है
    सच झूठ
    और झूठ अब
    सच हो गया है।

    लाजवाब।

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  4. झूठ बोलकर भी वो सच्चे , हम झूठे सच कहकर ....
    बहुत चुभने वाला सच . वाह

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  5. हालांकि अंत
    जबकि रह जाता है
    केवल सच
    पर सच को मिलने तक
    सच की ज़मीन
    झूठ हो जाती है


    हम्म्म. बहुत गहरी बात
    सच की ज़मीं झूठ हो जाती है

    सत्य वचन

    बहुत ही सार्थक रचना। ..

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  6. सत्य की विजय अंतिम है,इससे पहले झूठ के दाँव चलते रहते हैं.जिसमें धैर्य और सामर्थ्य हो वही सत्य का पल्ला पकड़े ,नहीं तो दुनियादारी है ही .

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  7. झूठ कई बार सच प्रतित होता है लइकन कभी न कभी सच्चाई सामने आ ही जाती है।

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  8. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (10-06-2020) को  "वक़्त बदलेगा"  (चर्चा अंक-3728)    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  9. सच की परिभाषा तो यही है कि जो सदा एक सा है, झूठ की यही कि वह बदलता रहता है, अब यह सोचना है कि जिंदगी में क्या अटल है और क्या बदल रहा है

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  10. झूठ जल्दी ही फैलता है और सच धीरे धीरे चलता है

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  11. सच के व्यापार में मुनाफा नही होता फिर भी सौदा फायदेमंद का है ,बेहतरीन सोच उम्दा

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  12. पर सच को मिलने तक
    सच की ज़मीन
    झूठ हो जाती है
    बहुत सुन्दर रचना ।

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  13. बेहतरीन प्रस्तुति

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  14. झूठ
    जबकि नहीं होता सच
    फ़ैल जाता है
    आसानी से
    सच हो जैसे... निशब्द.
    सादर

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  15. पर सच को मिलने तक
    सच की ज़मीन
    झूठ हो जाती है
    तमाम उम्र
    छोटी पर बहुत उम्दा भाव लिए बेहतरीन सृजन।

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  16. सच और झूठ में उलझी जिंदगी अब तो समझ ही नही आता सच को माना जाए या झूठ को

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  17. झूठ पनीला होता है जो आसानी से कहीं से भी निकल कर फैल जाता है लेकिन सच कठोर धरातल होता है जो जीवन राह पर चलना सिखाता है
    बहुत अच्छी विचार चिंतन प्रस्तुति

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    1. आपका कहना सही है ...
      बहुत आभार आपका कविता जी ...

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  18. लाख बर्क गिरे लेकिन सच की चमक तो सर्वोपरि है. सच कहा आपने।

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    1. सही कहा अहि आपने निहार जी ... सत्य चाहे देर से हो पर उसके आगे फिर कुछ नहीं है ...
      आभार आपका ...

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  19. बढ़िया सवाल वाली रचना. ज़िंदगी भी रहती है और सच भी. झूठ को तो बस टूटन होती रहती है.

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    उत्तर
    1. जी सच का रहना तो जरूरी है ... नहीं तो धूप कैसे निकलेगी ...
      आभार आपका ...

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  20. हालांकि अंत
    जबकि रह जाता है
    केवल सच
    पर सच को मिलने तक
    सच की ज़मीन
    झूठ हो जाती है
    तमाम उम्र
    कितने प्रमाणों की जरुरत होती है सच को सच साबित करने के लिए...प्रमाण इकट्ठा करने के लिए कहीं न कहीं फिर झूठ का सहारा...
    तो यथार्थ है कि सच की जमीन झूठ हो जाती है...

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  21. हालांकि अंत
    जबकि रह जाता है
    केवल सच
    पर सच को मिलने तक
    सच की ज़मीन
    झूठ हो जाती है
    तमाम उम्र....एकदम सही और सटीक 

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