सोमवार, 6 जुलाई 2020

इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या ...

यूँ ही मुझको सता रही हो क्या 
तुम कहीं रूठ क चली हो क्या

उसकी यादें हैं पूछती अक्सर
मुझसे मिलकर उदास भी हो क्या

मुद्दतों से तलाश है जारी
ज़िन्दगी मुझसे अजनबी हो क्या

वक़्त ने पूछ ही लिया मुझसे
बूढ़े बापू की तुम छड़ी हो क्या

तुमको महसूस कर रहा हूँ मैं
माँ कहीं आस पास ही हो क्या

दर्द से पूछने लगी खुशियाँ
एक लम्हा था अब सदी हो क्या

मुझसे औलाद पूछती है अब
इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या
(तरही गज़ल)

50 टिप्‍पणियां:


  1. मुझसे औलाद पूछती है अब
    इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या...बहुत सुंदर निशब्द करती अभिव्यक्ति.

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  2. हाँ संवेदनशील लोग एक रुकी हुई घड़ी ही होते हैं फिर वे चाहे किसी भी पीढ़ी के क्यों न ह़ं ?

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  3. दो पीढ़ी की सोच में अंतर हो ही जाता है

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  4. तुमको महसूस कर रहा हूँ मैं
    माँ कहीं आस पास ही हो क्या

    दर्द से पूछने लगी खुशियाँ
    एक लम्हा था अब सदी हो क्या

    मुझसे औलाद पूछती है अब
    इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या
    क्या बात है ,बहुत ही सुंदर ,भा गई ,शुक्रिया ।

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  5. तुमको महसूस कर रहा हूँ मैं
    माँ कहीं आस पास ही हो क्या


    मुझसे औलाद पूछती है अब
    इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या

    वाह मार्मिक

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  6. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (08-07-2020) को     "सयानी सियासत"     (चर्चा अंक-3756)     पर भी होगी। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  7. मुझसे औलाद पूछती है अब
    इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या..
    वाह!! बहुत खूब !! बेहतरीन व लाजवाब ग़ज़ल ।

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  8. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 8 जुलाई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  9. बहुत उम्दा। कितने सहज शब्दों में गहरी बात -
    मुझसे औलाद पूछती है अब
    इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या

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  10. तुमको महसूस कर रहा हूँ मैं
    माँ कहीं आस पास ही हो क्या
    माँ-बाप ना होकर भी हर पल बच्चों के धड़कनों में होते हैं कुछ उसे महसूस करते हैं कुछ अनसुना कर जाते हैं. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति दिगंबर जी,सादर नमन आपको

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  11. मुझसे औलाद पूछती है अब
    इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या
    बहुत सुंदर रचना, दिगंबर भाई।

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  12. सर आप बहुत अच्छा लिखते हैं।

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  13. दर्द से पूछने लगी खुशियाँ
    एक लम्हा था अब सदी हो क्या

    दर्द है कि खत्म होने को नहीं आता
    खुशियां बाट जोहती ही रहेंगी क्या

    बहुत सुंदर गजल हर शेर अपने आप में मुकम्मल है

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  14. तुमको महसूस कर रहा हूँ मैं
    माँ कहीं आस पास ही हो क्या
    मुझसे औलाद पूछती है अब
    इक पुरानी रुकी घड़ी हो क्या

    बहुत ही सुंदर लिखा है आपने. सभी अशआर ज़िंदगी के किसी केंद्र को छू कर ग़ुजरते हैं.

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  15. वक़्त ने पूछ ही लिया मुझसे
    बूढ़े बापू की तुम छड़ी हो क्या.....अद्भुत अशआरों से लैस जबरदस्त शायरी !! अब एक तकनीकी पक्ष भी सुलझाइये आप - ग़ज़ल और तरही ग़ज़ल में क्या फर्क होता है ? हालाँकि मुझे ये और इससे बाद वाली पोस्ट को पढ़ने में फर्क महसूस हुआ लेकिन मैं शायद उसे व्यवस्थित रूप से परिभाषित नहीं कर सकूंगा !! आपको समझाना ही होगा दोनों का अंतर :)

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    1. बहुत आभार योगी जी ...
      हाँ ... तरही गज़ल वो गज़ल है जिसमें कोई एक मिसरा दिया जाता है ... फिर उस मिसरे की बहर, काफिया, रदीफ़ ले कर गज़ल कही जाती है और दिए हुए मिसरे पर भी शेर कहा जाता है ... जिसको गिरह का शेर कहते हैं ...
      दूसरी गजलों में ये सब आप तय करते हैं की कैसे लिखना है ...

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  16. बहुत शानदार सृजन।
    संवेदनाओं से भरपूर मर्मस्पर्शी।

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  17. वक़्त ने पूछ ही लिया मुझसे
    बूढ़े बापू की तुम छड़ी हो क्या
    वाह!!!!
    वक्त ही सवाल है और वक्त ही जबाब भी
    बहुत ही भावपूर्ण...

    तुमको महसूस कर रहा हूँ मैं
    माँ कहीं आस पास ही हो क्या
    माँ तो सचमुच आसपास ही होती है संतान के.....बस महसूस करना जरूरी है
    बहुत ही लाजवाब गजल हमेशा की तरह।

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