गुरुवार, 23 जुलाई 2020

हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं ...


उदासी से घिरी तन्हा छते हैं
कई किस्से यहाँ के घूरते हैं

परिंदों के परों पर घूमते हैं
हम अपने घर को अकसर ढूँढ़ते हैं

नहीं है इश्क पतझड़ तो यहाँ क्यों
सभी के दिल हमेशा टूटते हैं

मेरा स्वेटर कहाँ तुम ले गई थीं
तुम्हारी शाल से हम पूछते हैं

नए रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी
कहाँ रिश्ते पुराने छूटते हैं

कभी तो राख़ हो जाएँगी यादें
तुम्हे सिगरेट समझ कर फूंकते हैं

लिखे क्यों जो नहीं फिर भेजने थे
दराज़ों में पड़े ख़त सोचते हैं

लगी है आज भी उन पर लिपिस्टिक
हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं

34 टिप्‍पणियां:

  1. उम्दा लिखावट ऐसी लाइने बहुत कम पढने के लिए मिलती है धन्यवाद् (सिर्फ आधार और पैनकार्ड से लिजिये तुरंत घर बैठे लोन)

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  2. आपकी ग़ज़ल का मुहावरा बहुत चमकदार हो गया है. बोलचाल की भाषा में लिखना ही कविताई का सुंदरतम रूप है.
    'मेरा स्वेटर कहाँ तुम ले गई थीं
    तुम्हारी शाल से हम पूछते हैं'
    वाह!

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  3. नए रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी
    कहाँ रिश्ते पुराने छूटते हैं.. वाह बेहतरीन रचना आदरणीय

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  4. ग़ज़ल का हर शेर लाजवाब...पूरे परिवेश को समेटे अत्यन्त सुन्दर भावाभिव्यक्ति ।

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  5. कमाल की अभिव्यक्ति है आपकी...
    एक नए बिंब .. ऊंघती यादों को आपने शेल्फ पर सजे सामान से जोड़ दिया... कितना खूबसूरत है!

    सादर

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  6. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार (२५-०७-२०२०) को 'सारे प्रश्न छलमय' (चर्चा अंक-३७७३) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

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  7. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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  8. नए रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी
    कहाँ रिश्ते पुराने छूटते हैं

    लिखे क्यों जो नहीं फिर भेजने थे
    दराज़ों में पड़े ख़त सोचते हैं
    .. वाह! बहुत लाजवाब!

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  9. बहुत बेहतरीन रचना है।वैसे तो आप की हर रचना का अलग अंदाज़ होता है । नए रिश्तों में कितनी भी हो गर्मी
    कहाँ रिश्ते पुराने छूटते हैं.....बहुत सुंदर

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  10. इतना खूबसूरत तो कभी सोचा ही नहीं. गज़ब ...
    लगी है आज भी उन पर लिपिस्टिक
    हरे मग शैल्फ़ पर जो ऊंघते हैं

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  11. क्या सोंचते हैं ...

    लिखे क्यों जो नहीं फिर भेजने थे
    दराज़ों में पड़े ख़त सोचते हैं !!

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  12. लिखे क्यों जो नहीं फिर भेजने थे
    दराज़ों में पड़े ख़त सोचते हैं....आनंददायक ! बहुत ही जोरदार ग़ज़ल 

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