सोमवार, 27 जुलाई 2020

वक़्त की साँकल में अटका इक दुपट्टा रह गया


आँसुओं से तर-ब-तर मासूम कन्धा रह गया
वक़्त की साँकल में अटका इक दुपट्टा रह गया

मिल गया जो उसकी माया, जो हुआ उसका करम
पा लिया तुझको तो सब अपना पराया रह गया

आदतन बोला नहीं मैं, रह गईं खामोश तुम 
झूठ सच के बीच उलझा एक लम्हा रह गया

छू के तुझको कुछ कहा तितली ने जिसके कान में 
इश्क़ में डूबा हुआ वाहिद वो पत्ता रह गया

आपको देखा अचानक बज उठी सीटी मेरी
उम्र तो बढ़ती रही पर दिल में बच्चा रह गया

कर भी देता मैं मुकम्मल शेर तेरे हुस्न पर
क्या कहूँ लट से उलझ कर एक मिसरा रह गया

मैं भी कुछ जल्दी में था, रुकने को तुम राज़ी न थीं
शाम का नीला समुन्दर यूँ ही तन्हा रह गया

बोलना, बातें, बहस, तकरार, झगड़ा, गुफ्तगू  
इश्क़ की इस दिल्लगी में अस्ल मुद्दा रह गया

कुछ कहा नज़रों ने, कुछ होठों ने, सच किसको कहूँ 
यूँ शराफत सादगी में पिस के बंदा रह गया

63 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !! बहुत ही बेहतरीन और लाजवाब !!

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  2. कर भी देता मैं मुकम्मल शेर तेरे हुस्न पर
    क्या कहूँ लट से उलझ कर एक मिसरा रह गया
    वाह

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  3. हर पंक्ति बहुत ही लाजवाब है वक़्त की साँकल में अटका एक दुपट्टा रह गया ।बहुत सुंदर ।

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  4. हर शेर बहुत शानदार .जानदार और लाज़बाब .

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  5. सभी शेर बहुत खूबसूरत. क्या कह दिया ... वाह
    आँसुओं से तर-ब-तर मासूम कन्धा रह गया
    वक़्त की साँकल में अटका इक दुपट्टा रह गया

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  6. आदतन बोला नहीं मैं, रह गईं खामोश तुम
    झूठ सच के बीच उलझा एक लम्हा रह गया
    वाह!!!
    हमेशा की तरह कमाल की गजल एक से बढ़कर एक शेर...
    बहुत ही लाजवाब।

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  7. बोलना, बातें, बहस, तकरार, झगड़ा, गुफ्तगू
    इश्क़ की इस दिल्लगी में अस्ल मुद्दा रह गया.... वाह! लाज़वाब!!!

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  8. आदतन बोला नहीं मैं, रह गईं खामोश तुम
    झूठ सच के बीच उलझा एक लम्हा रह गया
    वाह!!बेहतरीन ग़ज़ल आदरणीय।

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  9. सादर नमस्कार,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा मंगलवार (२८-७-२०२०) को
    "माटी के लाल" (चर्चा अंक 3776)
    पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है

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  10. नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 28 जुलाई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    आपकी रचना की पंक्ति-
    "उम्र तो बढ़ती रही पर दिल में बच्चा रह गया"
    हमारी प्रस्तुति का शीर्षक होगी।


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  11. इस बच्चे का बचपन संभाले रखना बहुत जरुरी है

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  12. वाह ,वाह!!बेहतरीन ,दिगंबर जी !
    आँसुओं से तर-ब-तर मासूम कंघा रह गया
    वक्त की साँकल में अटका एक दुपट्टा रह गया ।
    क्या बात है ..बहुत खूब!

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  13. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (29-07-2020) को     "कोरोना वार्तालाप"   (चर्चा अंक-3777)     पर भी होगी। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  14. आदतन बोला नहीं मैं, रह गईं खामोश तुम
    झूठ सच के बीच उलझा एक लम्हा रह गया
    वाह

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  15. वाह!!
    वक्त की सांकल में अटका दुपट्टा.. गज़ब अभिव्यक्ति होती है आपकी कहीं संवेदनाओं को कुरेदती कहीं उमर्दा और बेहतरीन अस्आर सार्थक सृजन।

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  16. आ दिगंबर नासवा जी, नमस्ते ! एक बेहतरीन गजल की प्रस्तुति के लिए मेरा हार्दिक साधुवाद ! आपकी ही ये पंक्तियाँ लाजवाब हैं :
    कुछ कहा नज़रों ने, कुछ होठों ने, सच किसको कहूँ
    यूँ शराफत सादगी में पिस के बंदा रह गया। --ब्रजेन्द्र नाथ

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  17. आदतन बोला नहीं मैं, रह गईं खामोश तुम
    झूठ सच के बीच उलझा एक लम्हा रह गया... बहुत ही खूबसूरत नज़्म ... नासवा जी

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  18. दिल को छू गयी यह ग़ज़ल । बेहतरीन प्रस्तुति । हार्दिक आभार और शुभकामनाएं ।

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  19. बढ़ती उम्र के बच्चे के कारण ही दुपट्टा याद रह गया.
    बहुत सुन्दर रचना

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  20. आदतन बोला नहीं मैं, रह गईं खामोश तुम
    झूठ सच के बीच उलझा एक लम्हा रह गया
    वाह ! हर मिसरा कमाल का है ! कितना अच्छा लिखते हैं आप ! पढ़ कर उसकी खुमारी का उतरना मुश्किल हो जाता है !

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  21. बोलना, बातें, बहस, तकरार, झगड़ा, गुफ्तगू
    इश्क़ की इस दिल्लगी में अस्ल मुद्दा रह गया

    बहुत सुंदर....

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  22. लाजवाब...लाजवाब...लाजवाब...

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  23. आदतन बोला नहीं मैं, रह गईं खामोश तुम
    झूठ सच के बीच उलझा एक लम्हा रह गया.....बस इतना ही कहूंगा !! शानदार 

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