सोमवार, 3 अगस्त 2020

उसी लम्हे की बस तस्वीर है आँखों में अपनी


अधूरी ख्वाहिशें रहती हैं दरवाज़ों में अपनी

तभी तो ज़िन्दगी जीते हैं सब टुकड़ों में अपनी

 

तू यूँ ही बोलना मैं भी फ़कत सुनता रहूँगा

सुनो शक्कर ज़रा कम डालना बातों में अपनी

 

अभी तो रात ने दिन का शटर खोला नहीं है

चलो इक नींद तो लेने दो तुम बाहों में अपनी

 

कभी गुस्सा, झिझकना, रूठना, फिर मान जाना

हमेशा बोलती रहती हो तस्वीरों में अपनी

 

कहीं कमज़ोर ना कर दें बुलंदी के इरादे

समुन्दर रोक के रखना ज़रा पलकों में अपनी

 

ज़रुरत जब हुई महसूस हमको ज़िन्दगी में

दुआएं दोस्तों की गई खातों में अपनी

 

कई अलफ़ाज़ जब मुंह मोड़ लेते हैं बहर से

तुम्हारा नाम लिख देता हूँ बस ग़ज़लों में अपनी

 

सुनो इस पेड़ को मत काटना जीते जी अपने

परिंदे छुप के रहते हैं यहाँ शाखों में अपनी

 

झुकी पलकें दुपट्टा आसमानी चाल अल्हड़

उसी लम्हे की बस तस्वीर है आँखों में अपनी

49 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (04-08-2020) को   "अयोध्या जा पायेंगे तो श्रीरामचरितमानस का पाठ करें"  (चर्चा अंक-3783)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  2. वाह!दिगंबर जी ,क्या बात है !बहुत खूबसूरत सृजन ।..दुआएँ दोस्तों की आ गई खाते में तब अपने ....वाह!!

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  3. बेहद खूबसूरत रचना आदरणीय 👌

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  4. कहीं कमज़ोर ना कर दें बुलंदी के इरादे

    समुन्दर रोक के रखना ज़रा पलकों में अपनी...क्या खूब कहा नासवा जी, बहुत ही खूब

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  5. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 5 अगस्त 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  6. खूबसूरत रचना दिगम्बर जी

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  7. अधूरी ख्वाहिशें रहती हैं दरवाज़ों में अपनी

    तभी तो ज़िन्दगी जीते हैं सब टुकड़ों में अपनी अधूरी ख्वाहिशें रहती हैं दरवाज़ों में अपनी

    तभी तो ज़िन्दगी जीते हैं सब टुकड़ों में अपनी,,,,,,,,,,, बहुत सुंदर ।

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  8. सुनो इस पेड़ को मत काटना जीते जी अपने
    परिंदे छुप के रहते हैं यहाँ शाखों में अपनी
    बहुत खूब ! प्राणी मात्र के लिए सजगता भाव ...मन को सुकून देने के साथ बड़प्पन भी देता है । सदैव की तरह हृदयस्पर्शी सृजन ।

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  9. सुनो इस पेड़ को मत काटना जीते जी अपने

    परिंदे छुप के रहते हैं यहाँ शाखों में अपनीबहुत सुंदर रचना, दिगंबर भाई।

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  10. आदरणीय सर,
    बहुत सुंदर शायरी। हर पंक्ति के भाव सुंदर हैं और स्वयं उठ उठ कर आ रहे हैं।
    हृदय से आभार।

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  11. सुनो इस पेड़ को मत काटना जीते जी अपने

    परिंदे छुप के रहते हैं यहाँ शाखों में अपनी।
    -वैसे तो सम्पूर्ण रचना बहुत हृदयस्पर्शी है ,लेकिन इन दो पंक्तियों ने मुझे खास तौर पर बहुत प्रभावित किया। रचना में और इन पंक्तियों में सचमुच बहुत भावुक सन्देश है।

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  12. सुनो इस पेड़ को मत काटना जीते जी अपने
    परिंदे छुप के रहते हैं यहाँ शाखों में अपनी

    वाह!!!!

    ज़रुरत जब हुई महसूस हमको ज़िन्दगी में
    दुआएं दोस्तों की आ गई खातों में अपनी

    बहुत ही लाजवाब हमेशा की तरह
    वाह वाह... ।

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  13. सुनो इस पेड़ को मत काटना जीते जी अपने

    परिंदे छुप के रहते हैं यहाँ शाखों में अपनी....जबरदस्त !! वैसे परिंदों को  दाना डालकर उन्हें उसे खाते हुए देखना बहुत अच्छा लगता है।  lockdown में यही किया और अब तो आदत हो गयी है 

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  14. बहुत सुंदर गज़ल !

    - रेखा

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  15. तू यूँ ही बोलना मैं भी फ़कत सुनता रहूँगा
    सुनो शक्कर ज़रा कम डालना बातों में अपनी

    व्यवहार की यह खरी-खरी बहुत अच्छी लगी.

    आप बहुत उम्दा कह रहे हैं.

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  16. ज़रूरत जब हुई महसूस हमको
    दुआएँ दोस्तों की आगे खाते में अपनी

    क्या ख़ूब कहा है।

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  17. कहीं कमज़ोर ना कर दें बुलंदी के इरादे
    समुन्दर रोक के रखना ज़रा पलकों में अपनी
    ये शायरी अनमोल है | आदरणीय दिगम्बर जी , बहुत दिनों से सिर्फ पढ़ रही थी लिख नहीं पा रही थी | आज बहुत अच्छा लग रहा है | मेरी हार्दिक शुभकामनाएं सदैव ही आपके लिए |

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    1. बहुत आभार आपका रेणु जी ... आपकी व्याख्या हमेशा विस्तार देती है रचना को ...

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है