सोमवार, 17 अगस्त 2020

एक बुग्नी फूल सूखा डायरी ...

धूप कहती है निकल के दें दें
रौशनी हर घर को चल के दें दें  

साहूकारों की निगाहें कह रहीं
दाम पूरे इस फसल के दें दें

तय अँधेरे में तुम्हें करना है अब
जुगनुओं का साथ जल के दें दें

बात वो सच की करेगा सोच लो
आइना उनको बदल के दें दें

फैंसला लहरों को अब करना है ये
साथ किश्ती का उछल के दे ... दें

सच है मंज़िल पर गलत है रास्ता
रास्ता रस्ता बदल के दे ... दें

एक बुग्नी, फूल सूखा, डायरी  
सब खज़ाने हैं ये कल के दे ... दें

18 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत खूब। जरा सा भी ना देना :)

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  2. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (18 -8 -2020 ) को "बस एक मुठ्ठी आसमां "(चर्चा अंक-3797) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

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  3. धूप कहती है निकल के दें … न दें
    रौशनी हर घर को चल के दें … न दें

    साहूकारों की निगाहें कह रहीं
    दाम पूरे इस फसल के दें … न दें,,,,,,,बहुत लाजवाब ग़ज़ल ।

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  4. ज़रा रुक कर सोच लें फिर जिसको जो देना है, दें

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  5. वाह ! बेहतरीन अंदाज ! दें या न दें .. सवाल वाकई गंभीर है, मगर एक ही जवाब है 'हाँ'

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  6. उम्दा ग़ज़ल दिगम्बर सर

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  7. साहूकारों की निगाहें कह रहीं
    दाम पूरे इस फसल के दें … न दें
    वाह!!!
    लाजवाब सृजन कुछ अलग ही अंदाज में।
    दें...न दें, अजीब कशमकश ......
    बहुत ही उत्कृष्ट।

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  8. दें...ना दें
    इतना सुंदर प्रयोग कशमकश का । बहुत बार इस कशमकश में ही समय निकल जाता है। बेजोड़ है हर शेर इस ग़ज़ल का।

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  9. बहुत शानदार असमंजस।
    उम्दा हमेशा की तरह बेहतरीन सृजन।

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  10. तय अँधेरे में तुम्हें करना है अब
    जुगनुओं का साथ जल के दें … न दें


    वाह बहुत दिनों बाद अपने परिचितों में इतनी अच्छी ग़ज़ल किसीने कही हैं।
    शुक्रिया साहब।

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  11. वाह। बहुत उम्दा ग़ज़ल। दाद स्वीकारें।

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  12. दें … न दें------ की उहापोह में डूबे मन से निसृत शानदार अशार |
    एक बुग्नी, फूल सूखा, डायरी
    सब खज़ाने हैं ये कल के दे ... न दें
    वाह और सिर्फ वाह !!!!!शुभकामनाएं और आभार |

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  13. सोच में ही बाधा सी है-

    साहूकारों की निगाहें कह रहीं
    दाम पूरे इस फसल के दें … न दें

    बहुत बढ़िया रचना.

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  14. सच है मंज़िल पर गलत है रास्ता
    रास्ता रस्ता बदल के दे ... न दें....अदभुत और बहुत ही प्रभावी शब्द संयोजन दिगंबर जी !! बहुत साधुवाद इतना बेहतरीन साहित्य पढ़वाने के लिए 

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