सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

यूँ ही नज़रें गड़ाए रखिएगा

 ज़ख्म अपने छुपाए रखिएगा
महफ़िलों को सजाए रखिएगा
 
दुश्मनी है ये मानता हूँ पर   
सिलसिला तो बनाए रखिएगा
 
कुछ मुसाफिर ज़रूर लौटेंगे
एक दीपक जलाए रखिएगा
 
कल की पीड़ी यहाँ से गुजरेगी
आसमाँ तो उठाए रखिएगा
 
रूठ जाएँ ये उनकी है मर्ज़ी
आप पलकें बिछाए रखिएगा
 
काम जाएँ कब ये क्या जानें
आंसुओं को बचाए रखिएगा
 
शक्ल उनकी दिखेगी बादल में
यूँ ही नज़रें गड़ाए रखिएगा

18 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 12 अक्टूबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. सादर नमस्कार ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-10-2020 ) को "अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस पर एक मां की हुंकार..."(चर्चा अंक 3853) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

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  3. बेहतरीन ... छोटी-छोटी बातों से जिंदगी का फलसफा बयान करती पंक्तियाँ, पीढ़ी होना चाहिए सम्भवतः

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  4. वाह !!
    बेहतरीन अभिव्यक्ति ।

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  5. ज़ख्म अपने छुपाए रखिएगा
    महफ़िलों को सजाए रखिएगा,,,,,,सच है यही ज़िंदगी का फ़लसफ़ा है,बहुत सुंदर रचना हमेशा की तरह,,,,,,।

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  6. दुश्मनी है ये मानता हूँ पर
    सिलसिला तो बनाए रखिएगा....
    क्या बात है, प्रभावशाली शायरी, उन्मुक्त गजल

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  7. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, दिगंबर भाई।

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  8. ज़ख्म अपने छुपाए रखिएगा
    महफ़िलों को सजाए रखिएगा
    वाह!!!
    जिंदगी का फलसफा...
    एक से बढ़कर एक शेर
    लाजवाब।

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  9. कुछ मुसाफिर ज़रूर लौटेंगे
    एक दीपक जलाए रखिएगा

    बहुत सुदंर.

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  10. काम आ जाएँ कब ये क्या जानें
    आंसुओं को बचाए रखिएगा....अप्रतिम !! एक एक शब्द बहुत  ही प्रभावी 

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आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है